अर्थव्यवस्था
जीएसटी की द्वितीय वर्षगाँठ- क्या हुआ गलत और कैसे करें सुधार

आशुचित्र- जीएसटी को बेहतर बनाया जा सकता है लेकिन एक झटके में नहीं। दो वर्ष के अंतराल में जीएसटी की बेहतर संरचना से इसे गुड एंड सिम्पल टैक्स बनाया जा सकता है।

स्वतंत्रता से भारत का सबसे बड़ा कर सुधार था वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लेकिन दो वर्षों बाद भी यह प्रगतिशील ही है। इसके लॉन्च के दो वर्षों बाद यदि एक वाक्य में कहा जाए कि इसके साथ क्या परेशानी है तो वह होगा- कई दरें हैं, अनुपालन तंत्र बहुत पेंचीदा है, कर चोरी करने वाले कई लोग हैं और कुल कर संग्रह अपेक्षा से कम है।

अप्रैल 2019 में 1.13 लाख करोड़ रुपये के बाद थोड़ा गिरकर मई 2019 का कर संग्रह मुश्किल से 1 लाख करोड़ रुपये का आँकड़ा पार कर पाया था। राज्यों के राजस्व में कमी का मुआवज़ा देने से बचने के लिए कर संग्रह कम से कम 1.14 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए लेकिन ऐसा परिदृश्य देखने को नहीं मिल रहा है।

जीएसटी में सुधार करना बहुत मुश्किल है क्योंकि इसे लागू करने के लिए सहमति बनाने में ही इतनी परेशानी हुई थी। 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नए कर के लिए राज़ी करना, जिसमें केंद्र और राज्य अपनी वित्तीय संप्रभुता खोते हैं, ही कठिन कार्य था जिसका परिणाम हैं उच्च दरें और जटिल संरचना।

राज्यों ने इसलिए स्वीकारा क्योंकि उन्हें 14 प्रतिशत की राजस्व वृद्धि दर का वादा किया गया था। और इसी कारण अभी भी दरें आवश्यकता से अधिक हैं। इसका विकल्प है कर चोरों पर सख्ती लेकिन यह भी आसान नहीं है। पहली बात यह कि कर के लिए वृहद स्वीकार्यता बलपूर्वक प्रयासों से नहीं मिलेगी। और दूसरी बात यह कि जब राज्यों को राशि निश्चित है तो वे राजस्व बढ़ाने के लिए प्रयास नहीं करेंगे। वे इस बात से खुश हैं कि जीएसटी की विफलताओं का दोष केंद्र पर जाए और उन्हें लाभ मिलता रहे।

इतनी सारी दरें और विशेष छूटें होने का एक और कारण है नरेंद्र मोदी सरकार की राजनीतिक चतुराई। विश्व भर में कई सत्ताधारी जीएसटी लागू करने के बाद चुनाव हारे हैं। यहाँ तक कि मलेशिया की पिछली सरकार महाठीर मोहम्मद से हारी जिन्होंने वादा किया था कि वे जीएसटी को हटाएँगे।

यदि अलोकप्रिय जीएसटी के बावजूद मोदी सरकार जीती है तो वह इसलिए कि इसने जीएसटी की संरचना से समझौता किया है- कुछ निपुण प्रयास इधर-उधर करके उन्होंने छोटे व्यापारियों, रेस्तरां मालिकों, संपत्ति दलालों या आभूषण व्यापारियों को शांत रखा है। इसलिए हमारे पास कई दरें हैं- 1 प्रतिशत, 3 प्रतिशत, 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत, 28 प्रतिशत और लग्ज़री वस्तुओं पर अतिरिक्त कर, इसके अलावा कुछ वस्तुओं पर इनपुट क्रेडिट कर, आदि।

दरें तब तक तर्कसंगत नहीं हो सकतीं जब तक राजस्व पर दबाव रहेगा। और राजस्व पर तब तक दबाव रहेगा जब तक कि अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित नहीं किया जाता।

एक दूसरा विकल्प है, जो कई अर्थशास्त्री सुझाते हैं- वह है कि तर्कसंगत रूप से दरों को कम किया जाए और थोड़ा पीछे रहने देने के बाद माँग का पुनर्जीवित होना जो उच्च राजस्व प्रदान करेगा। लेकिन इसका नुकसान होगा कि कुछ समय के लिए वित्तीय कमी होगी क्योंकि तब भी राज्यों को मुआवज़ा दिया जाना होगा। यदि कर दरें कम की जाती हैं तो राज्यों को 14 प्रतिशत की वृद्धि दर देना तब ही संभव होगा जब वित्तीय घाटे को छोड़ा और बढ़ने दिया जाए तब तक के लिए जब तक वृद्धि और कर राजस्व पुनः नहीं बढ़ते।

यह खतरा उठाए जाने योग्य है। आगे की राह कुछ इस प्रकार हो सकती है-

पहला, केवल तीन दरें हो- 5, 15 और 25 प्रतिशत। इसके अलावा लग्ज़री वस्तुओं के लिए अतिरिक्त उप-कर का प्रावधान हो।

दूसरा, छोड़े समय के लिए राजस्व को गिरने दिया जाए और एक वर्ष के लिए वित्तीय घाटे के लक्ष्य में थोड़ी ढील दी जाए, जब तक कि माँग और कर राजस्व पुनः न बढ़ जाएँ।

तीसरा, कुछ चरणों में कंपोज़िशन स्कीम और बिना इनपुट क्रेडिट कर के जीएसटी को बंद किया जाए। छोटे व्यापारों को कर-मुक्त या कम शुल्क के समर्थन से अनुपालन के दायरे में लाया जाए और रिटर्न फाइलिंग को सुनिश्चित किया जाए। इस प्रकार कम परेशानियाँ होंगी और छोटे व्यापारों को अधिक नुकसान पहुँचाए बिना जीएसटी का विस्तार किया जा सकेगा।

चौथा, गैर-वेतन वर्गों के लिए आयकर की सीमा को 5 लाख रुपये प्रति वर्ष तक बढ़ाया जाए, विशेषकर उन लोगों के लिए जो छोटा या स्वयं का व्यापार चलाते हों जिससे जीएसटी का बढ़ा संग्रह, उच्च व्यापार और प्रतिवेदित आय से अमेल न हो।

जीएसटी को बेहतर बनाया जा सकता है लेकिन एक झटके में नहीं। दो वर्ष के अंतराल में जीएसटी की बेहतर संरचना से इसे गुड एंड सिम्पल टैक्स बनाया जा सकता है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।