अर्थव्यवस्था
आरबीआई की अतिरिक्त पूंजी- बिमल जालान के नेतृत्व में समिति करेगी समीक्षा

कल (26 दिसंबर को) रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) ने एक विशेषज्ञ समिति के गठन की घोषणा की जिससे केंद्रीय बैंक के वर्तमान आर्थिक पूंजी ढाँचे की समीक्षा की जा सके। केंद्र सरकार की सहमति से गठित यह समिति भंडार की उपयुक्त मात्रा निर्धारित करेगी।

अतिरिक्त पूंजी की बात पर तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल और सरकार के मध्य हुए विवाद के बाद 19 नवंबर को हुई बैठक में आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड ने एक पैनल बनाने का निर्णय लिया था। पूर्व आरबीआई गवर्नर बिमल जालान छः सदस्यों की इस समिति के प्रमुख होंगे और आरबीआई के पूर्व उप-गवर्नर राकेश मोहन इसके उपाध्यक्ष होंगे। आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग, आरबीआई केंद्रीय बोर्ड के सदस्य भारत दोशी, सुधीर मानकंड और उप-गवर्नर एनएस विश्वनाथन होंगे। यह पैनल बैठक के बाद 90 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।

विशेषज्ञ समिति का अधिदेश स्थिति की समीक्षा, कई प्रावधानों की प्रासंगिकता व आरबीआई के भंडार और बफर्स के विषयों में होगा। पैनल आर्थिक विपत्ति के लिए वैश्विक स्तर के केंद्रीय बैंकों द्वारा अपनाए जा रहे व्यवहार की भी समीक्षा करेगा।

वित्त मंत्रालय कहता आ रहा है कि आरबीआई ने प्रभुत्व के कारण आवश्यकता से अधिक पूंजी अपने पास एकत्रित करके रखी है। वित्त मंत्रालय का तर्क है कि यह पूंजी पब्लिक सेक्टर बैंकों को लाभ पहुँचाने जैसे निर्माणकारी कार्यों के लिए प्रयुक्त की जा सकती है और कई विशेषज्ञों का भी यह मानना है।

इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली नामक जर्नल में “पागलपन या विवेक- आरबीआई के लिए कितनी पूंजी उपयुक्त है?” शीर्षक से एक पेेपर प्रकाशित हुआ था जिसमें कहा गया था कि आरबीआई के पास 5 लाख करोड़ से 7.9 लाख करोड़ तक का पूंजी भंडार है।

उर्जित पटेल जो हाल ही में आरबीआई से सेवानिवृत्त हुए हैं और उप-गवर्नर विरल आचार्य ने अतिरिक्त निधि के हस्तांतरण पर विरोध जताया था। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस माह में दावा किया कि आरबीआई से सरकार को पूंजी के हस्तांतरण से केंद्रीय बैंक की रेटिंग में गिरावट होगी।

पूर्व में आरबीआई ने आर्थिक पूंजी ढाँचे की समीक्षा के लिए तीन पैनलों का गठन किया था लेकिन उनमें सरकार का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। इन पैनलों की अध्यक्षता वाईएच मालेगाम, उषा थोरट और वी सुब्पमण्यम कर रहे थे। ये सभी पदाधिकारी केंद्रीय बैंक से संबंधित हैं और दो उप-गवर्नर भी रह चुके हैं।

2013 में सौंपी गई मालेगाम समिति की रिपोर्ट में माना गया था कि आरबीआई के पास आवश्यकता से अधिक पूंजी है। इसमें अतिरिक्त पूंजी को 2014 से तीन वर्षों के भीतर सरकार को सौंपने का सुझाव दिया गया था।