अर्थव्यवस्था
खाद्य तेलों का मूल्य क्यों बढ़ा और कैसे इसके बढ़ते उपयोग से खड़ा हुआ स्वास्थ्य संकट

कभी अगर कोई विदेशी अगर वर्ष भर के भारतीय समाचार-पत्र पढ़ ले, तो वह बेचारा बहुत-से प्रश्नों से घिर जाएगा। उसके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रहेगी क्योंकि उसे दो बिलकुल विपरीत प्रश्नों का सामना करना पड़ेगा।

भारत के समाचार-पत्रों में इस वर्ष उसे तथाकथित “किसान आंदोलन” के बारे में पढ़ने को मिलेगा। वह इस बात पर भी चकित हो सकता है कि कैसे किसान थे जो भारत के गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में अराजकता फैलाकर, पुलिसकर्मियों को ही पीट रहे थे!

हो सकता है ऐसे लोगों को गुंडा इत्यादि कहने के बदले किसान कहने में भी उसे हिचकिचाहट होने लगे। वैसे देखा जाए तो इस बात पर दुखी ज्यादा और अचंभित कम होना चाहिए। हाँ, किसानों और कृषि से जुड़े दूसरे मुद्दों पर आश्चर्यचकित हुआ जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर भारत में हाल में सरसों के तेल की बढ़ती कीमतें (गाड़ियों में डाले जाने वाले तेल के अलावा) चिंता का विषय रही हैं। इस मसले पर गौर करें तो पिछले वर्ष सरकार ने सरसों के तेल में किसी और खाद्य तेल के मिलावट पर प्रतिबंध लगाया था।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने यह प्रतिबंध थोड़े समय बाद हटा लिया था। इस वर्ष 8 जून से यह प्रतिबंध फिर से लागू हो गया है। ऐसा माना जाता है कि भारत में सरसों तेल का बाजार करीब 40,000 करोड़ रुपये का है।

सरकार नीतियों के ज़रिए खाद्य तेलों के मामले में भारत को “आत्मनिर्भर” बनाने के प्रयास में है। कृषि मंत्रालय द्वारा फरवरी में जारी पूर्वानुमानों के अनुसार 2020-21 में सरसों की रिकॉर्ड पैदावार 104.3 लाख टन की हो सकती है जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 14 प्रतिशत अधिक होगी।

इसकी तुलना में केंद्रीय तेल उद्योग एवं व्यापार संगठन (सीओओआईटी) के पूर्वानुमानों के अनुसार सरसों का उत्पादन 89.5 लाख टन का होगा जो पिछले वर्ष से करीब 19 प्रतिशत अधिक होगा। यह अंतर इसलिए है क्योंकि दोनों संस्थाएँ उत्पादन को अलग-अलग स्तर पर रखती हैं।

मंत्रालय के अनुसार पिछले वर्ष (2019-20 में) सरसों का उत्पादन 91.2 लाख टन था, जबकि सीओओआईटी के हिसाब से यह केवल 75 लाख टन के आस पास रहा था। इस वर्ष किसानों के फायदे में ये बात भी गई है कि फसलों की करीब 77 प्रतिशत कटाई 19 मार्च तक पूरी हो चुकी थी।

पिछले पाँच वर्षों में बुवाई का औसत देखें तो वह भी 59 लाख हेक्टयेर होता था, जबकि इस वर्ष 68.5 लाख हेक्टेयर में सरसों की बुवाई हुई है। अधिक उत्पादन के बाद भी कीमतें बढ़ी रही हैं जो फिर से किसानों के पक्ष में जाती हैं।

राजस्थान जो कि सरसों के उत्पादन वाले सबसे बड़े राज्यों में से एक है, वहाँ मार्च में 5,121 रुपये प्रति क्विंटल की दर मिली, जो कि एमएसपी (4650 रुपये प्रति क्विंटल) से भी लगभग 10 प्रतिशत अधिक थी। सरकारी आँकड़ों के अनुसार सरसों तेल का खुदरा मूल्य भी बढ़कर 152 रुपये प्रति लीटर हो गया था।

यह (सरकारी हिसाब से) पिछले छह महीनों में 19 प्रतिशत बढ़ा है। (अगर अभी के वास्तविक बाज़ार मूल्यों को देखें तो कीमतें 190 रुपये प्रति लीटर तक भी जा रही हैं। जो कि सरकारी आँकड़ों से कहीं ज्यादा है।) ऐसे में यह प्रश्न भी उठने लगा है कि सरकार क्या करे?

उत्पादकों (किसानों) के लिए अधिक लाभ सुनिश्चित करे, या उपभोक्ता के लिए सस्ते उत्पाद मुहैया करवाए? यही प्रश्न भारतीय कृषि संबंधी समाचार देखने वालों को चौंका देगा। पिछले वर्ष जहाँ किसानों के लिए एमएसपी सुनिश्चित करने का हल्ला था, अब ये शोर सस्ते सरसों के तेल के लिए हो रहा है।

अगर उत्पादक किसान को अधिक मूल्य मिले तो उत्पाद की कीमतें कम कैसे रह सकती हैं? अगर मिश्रण की बात करें तो बाज़ार के जानकार बताते हैं कि खाद्य सरसों तेल में 20 प्रतिशत पाम तेल मिलाया जाता था। यह तेल मुख्यतः इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात किया जाता है।

अगर इस पाम तेल के मूल्य देखें तो भी कीमतों का बढ़ना दिख जाएगा। पिछले अप्रैल में जो मूल्य 672 रुपये के लगभग था, वह इस वर्ष 15 अप्रैल को 1,158 रुपये पर पहुँच गया था। आयात को कम रखने के लिए कृषि मंत्रालय ने एक पंच-वर्षीय योजना का प्रस्ताव रखा था।

पिछले कुछ दिनों के पाम तेल मूल्य

इसके तहत 19,000 करोड़ रुपये के खर्च से पाम और सोयाबीन के तेल का आयात कम करने और उत्पादन बढ़ाने की योजना थी, लेकिन बजट में ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई है। अब अगर तेल की खपत की तरफ चलें तो और हमें और भी चौंकाने वाले तथ्य दिखते हैं।

कर्रेंट साइंस जर्नल में (मार्च 2012) डीएम हेगड़े का एक अध्ययन छपा था। इसके अनुसार भारत में खाद्य तेलों की प्रति व्यक्ति खपत 1950 से 2011 के बीच करीब पाँच गुना बढ़ गई है। पोषण की आवश्यकताओं के हिसाब से शरीर की उर्जा का करीब 15-30 प्रतिशत तेल से आता है।

भारतीयों के लिए यह प्रतिदिन करीब 29 ग्राम तेल से (वर्ष में 10.585 किलोग्राम) पूरा हो जाएगा। यह खपत भारतीयों के लिए 2010-11 में ही करीब डेढ़ गुना (14.2 किग्रा प्रति व्यक्ति) पर थी। यानी मोटापे और हृदय रोगों की संभावना इससे तेज़ी से बढ़ रही है।

इसी अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि 2050 तक भारत को 178.4 लाख टन खाद्य तेल की आवश्यकता होगी। अगर अभी के आँकड़ों के हिसाब से अनुमान लगाया जाए तो इस अध्ययन के 10 वर्ष बाद हम कह सकते हैं कि 200 लाख टन की खपत पर पहुँचने में भारत को कोई देर नहीं लगने वाली है।

अब वापस उत्पादन पर चलते हैं। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना सहित कई दूसरी योजनाओं में तेल के उत्पादन को बढ़ाने का प्रयास किया गया है। तेल पैदा करने वाले बीजों के लिए तकनीकी मिशन और दूसरे नीतिगत बदलावों की वजह से भारत में 1986 में जहाँ केवल 90 लाख टन का उत्पादन होता था, वहीं 2018-19 में ऐसी फसलों का उत्पादन 320 लाख टन रहा।

लेकिन इससे भी माँग पूरी नहीं हो सकती है। ऐसा माना जाता है कि बेहतर बीजों के प्रयोग से उत्पादन बढ़ेगा। सोयाबीन के लिए पूसा 12 और जेएस 20-34, सरसों के लिए पूसा डबल ज़ीरो 30 और 31 जारी किए गए। स्थानानुसार छत्तीसगढ़ मूंगफली 1 जैसे बीज भी जारी किये गए।

इन सबके लिए किसानों को कितनी जानकारी दी गई, और नए बेहतर बीज लगाने के लिए प्रेरित किया गया, यह एक दूसरी बात है। इस पूरे प्रकरण में जो स्पष्ट है, वह यह है कि अगर प्रति व्यक्ति उपयोग 11 किग्रा प्रति वर्ष की ओर बढ़ाने का प्रयास नहीं किया गया तो हम कई गंभीर समस्याओं को पैदा कर रहे हैं।

एक तो उत्पादन हर हाल में माँग से कम रहेगा तो खाद्य तेलों की कीमतें लगातार बढ़ती ही रहेंगी। दूसरा कि इस अत्यधिक (करीब दोगुने) उपयोग से होने वाले रोगों से हमें दो-चार होना पड़ेगा। हृदय रोगों के उपचार का खर्च और घर के एक भी सदस्य के बीमार होने से होने वाली समस्याओं से हम सभी परिचित हैं।

प्रश्न यह है कि हम समाधानों के बारे में सोचेंगे, बात करेंगे या सिर्फ शोर करेंगे? क्या एक बार किसानों को अधिक मूल्य दिए जाने और अधिक मूल्य मिलते ही फिर उपभोक्ता को सस्ती दरों पर उत्पाद उपलब्ध करवाने के हल्ले में ही हमारा समय बीतने वाला है? सोचिए, अवश्य सोचिए, क्योंकि फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी तो नहीं लगता न!