अर्थव्यवस्था
उपभोक्ता माँग बढ़ाकर ही सुधरेगी अर्थव्यवस्था, मिलेगा रोजगार

भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वित्तीय वर्ष 2020-21 की चौथी तिमाही में 1.6 प्रतिशत की दर से बढ़ा लेकिन पूरे वर्ष में -7.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सकल मूल्य संवर्धन (जीवीए) 6.2 प्रतिशत की दर से गिरा जो कि 6.5 प्रतिशत की अनुमानित गिरावट से बेहतर है।

वित्तीय घाटा जीडीपी का 9.3 प्रतिशत हुआ जबकि संशोधित अनुमान 9.5 प्रतिशत का लगाया गया था। चौथी तिमाही का जीडीपी डाटा दर्शाता है कि कृषि क्षेत्र में 3.1 प्रतिशत, विनिर्माण क्षेत्र में 6.9 प्रतिशत और वित्त एवं अचल संपत्ति क्षेत्र में 5.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

निर्माण क्षेत्र में तो 14.5 प्रतिशत की गिरावट हुई। व्यापार, होटल, परिवहन और दूरसंचार क्षेत्रों में 2.3 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। हालाँकि चौथी तिमाही के ट्रेंड 2021-22 की पहली तिमाही में जारी नहीं रहेंगे क्योंकि दूसरी लहर के कारण स्थानीय समस्याएँ हुईं और उत्पादकता घटी।

अपेक्षा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था 2021-22 में 9.5 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी लेकिन इसका आधार कमतर स्तर पर है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) ने भी अपना अनुमान 9.9 प्रतिशत से घटाकर 12.6 प्रतिशत कर दिया है क्योंकि आर्थिक इकाइयों के धीमा रहने की अपेक्षा है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) के अनुसार बेरोजगारी दर दोहरे अंकों में पहुँच गए है- 11 प्रतिशत जो मई 2020 से अधिकतम है। स्थानीय लॉकडाउन के कारण अप्रैल में 70 लाख लोगों का रोजगार गया जिसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव असंगठित क्षेत्र के कामगारों पर हुआ।

असंगठित क्षेत्र में 41.1 करोड़ लोग काम करते हैं और आर्थिक गतिविधियों के रुक जाने से देखा गया कि प्रवासी श्रमिक अपने ग्रामों का ओर पुनः लौटने लगे थे। 23 मई वाले सप्ताह में तो बेरोजगारी दर सीएमआईई के अनुसार 14.7 प्रतिशत पहुँच गई थी।

गहराई में स्थित ट्रेंड

कोविड-19 वैश्विक महामारी ने अर्थव्यवस्था को ऐसे प्रभावित किया है जिसे उबरने में शुरुआती अनुमानों से अधिक समय लगेगा। घरेलू ऋणऔर जीडीपी का अनुपात जुन 2020 में 35.4 प्रतिशत से सितंबर 2020 तक बढ़कर 37.1 प्रतिशत हो गया था जो अब तक और बढ़ गया होगा।

घरेलू बचत जहाँ जून 2020 में जीडीपी क 28.1 प्रतिशत थी, वह तीसरी तिमाही में गिरकर 22.1 प्रतिशत पर आ गई। घरेलू बचत में गिरावट और आय में कमी का प्रभाव घरेलू उपभोग पर पड़ेगा जो जीडीपी में 60 प्रतिशत की भागीदारी रखता है।

कुछ अनुमानों के अनुसार कोविड उपचार पर लोगों ने अपनी जेब से कुल 750-1,000 अरब रुपये खर्च किए हैं जिसमें समाज के निम्न वर्ग की सारी बचत चली गई और कुछ मामलों में तो अपने परिजनों के प्राण बचाने के लिए उन्हें कुछ संपत्ति भी बेचनी पड़ी।

यूएस आधारित प्यू शोध केंद्र (पीडब्ल्यूसी) के अनुसार प्रतिदिन 10.01 से 20 डॉलर कमाने वाले मध्यम-वर्गीय लोगों की जनसंख्या में 3.2 करोड़ की कमी आएगी। महामारी के एक वर्ष में मध्यम-वर्ग की श्रेणी में आने वाले मात्र 6.6 करोड़ लोग ही बचे हैं जो कि 9.9 करोड़ के आँकड़े से एक-तिहाई की गिरावट है।

तथ्य है कि 2011-19 के दशक में 5.7 करोड़ लोग मध्यम-वर्ग की श्रेणी में आ गए थे। उसी तरह से 7.4 करोड़ लोग पुनः गरीबी की श्रेणी में चले गए हैं जो प्रतिदिन 2 डॉलर से कम कमाते हैं। इससे महामारी के कारण आई मंदी से मात्र एक वर्ष में निर्धनों की संख्या 6 करोड़ से बढ़कर 13.4 करोड़ हो गई है।

बेंगलुरु के अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन में इससे भी बदतर आँकड़े सामने आए हैं। अनुमान है कि महामारी के दौरान 375 रुपये का जो राष्ट्रीय न्यूनतम दैनिक भत्ता माना जाता है, 23 करोड़ अतिरिक्त लोग उससे कम कमा रहे हैं।

कोविड 2.0 से लड़ने के तरीके

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीई) ने स्वास्थ्य क्षेत्र को ऋण देने के लिए बैंकों को 50,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त तरलता दी है। ऐसे ही छोटे वित्त बैंकों को 10,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त तरलता दी गई है जिससे वे छोटे व्यापारों की सहायता कर सकें।

इसके अलावा एक अतिरिक्त रिज़ॉल्यूशन संरचना 2.0 जारी की गई है जो दबाव में आए ऋणों की संरचना में परिवर्तन करने की अनुमति देता है। सरकार ने आपातकाल क्रेडिट लाइन गारंटी योजना का विस्तार करके ईसीएलजीएस 4.0 बनाया है जो नागरिक उड्डयन, स्वास्थ्य क्षेत्र और स्वास्थ्य संस्थानों पर ऑक्सीजन संयंत्र लगाने को भी अपने दायरे में लेता है।

केंद्र ने फँसे हुए ऋण की 500 करोड़ रुपये की अधिकतम सीमा को भी हटा दिया है। वे फँसे हुए ऋण का 40 प्रतिशत या 200 करोड़ रुपये, दोनों में से जो भी कम हो, उतना ऋण के रूप में ले सकते हैं। ईसीएलजीएस 1.0 के तहत दिए गए ऋण 10 प्रतिशत के अतिरिक्त सहयोग के लिए भी योग्य होंगे।

इससे 29 फरवरी 2020 तक सरकार जितने फँसे हुए ऋण के लिए गारंटीड सहयोग करती थी, उससे 30 प्रतिशत अधिक अब कर रही है। लेकिन बैंकों के माध्यम से सरकार द्वारा गारंटीड ऋण की ऊपरी सीमा 30 खरब रुपये ही रहेगी।

बैंकों का कहना है कि उन्होंने इस योजना के तहत भी तक 25.4 खरब रुपये के ऋण आवंटित दिए हैं, यानी उनके पास 45,000 करोड़ रुपये के और ऋण देने का सामर्थ्य है। 24 खरब रुपये के ऋण बाँटे भी जा चुके हैं।

विस्तृत इसीएलजीएस 4.0 योदना 30 सितंबर 2021 तक या 30 खरब रुपये की आवंटित राशि के पूरा होने तक चलेगी, दोनों में से जो भी पहले पूरा होता है। ऋण बाँटने की प्रक्रिया 31 दिसंबर 2021 तक जारी रखी जा सकती है।

सामान्य घटनाक्रम से अलग हटकर सार्वजनिक बैंकों ने ऋण पुनः संरचना योजना को लागू करने के लिए मिलकर एक प्रक्रिया प्रवाह का प्रारूप बनाया है। इसे भारतीय बैंक संघ (आईबीए) के अधीन किया जा रहा है ताकि एकरूपता रहे। ऐसे मानक पारदर्शी तरीके से ऋण की वसूली भी अच्छे से लागू हो सकेगी।

आगे की राह

प्रायः देखा जाता है कि अधिकांश राहत प्रयास अवधि-केंद्रित होते हैं जबकि कोविड-19 की बार-बार आने वाली लहरों का प्रभाव काफी गहरा होता है जो उपभोक्ता माँग को कम करता है। व्यापार और विनिर्माण इकाइयाँ निवेश नहीं करना चाहती हैं।

अनिश्चितता के कारण न इकाइयाँ अपनी क्षमता विस्तृत करना चाहती हैं और न ही नई परियोजनाएँ शुरू करना चाहती हैं। आय में कमी और अनियोजित व अप्रत्याशित स्वास्थ्य खर्च के कारण गैर-आवश्यक वस्तुओं की खरीद में भारी गिरावट हुई है।

2020-21 में भारत का निजी अंतिम उपभोग खर्च (पीएफसीई) 2019-20 की तुलना में 6 प्रतिशत गिरकर 1,157 खरब रुपये रहा था। पिछले कुछ वर्षो में पीएफसीई की वृद्धि दर कम हुई है लेकिन फिर भी यह दोहरे अंकों में थी लेकिन कोविड-19 के कारण अब गिरावट पर है।

टीकाकरण अभियान को तेज़ करने के लिए हितधारकों को मिलकर काम करना होगा और विश्वास वापस लाने के लिए सुरक्षित कार्यस्थलों को विकसित करना होगा। कॉर्पोरेट क्षेत्र और व्यापारों को अपने लोगों का टीकाकरण करवाना चाहिए।

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सरकार को सही क्षेत्रों पर निवेश आकर्षित करना चाहिए और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यदि सभी हितधारक साथ मिलकर समन्वय में काम करें तो आर्थिक गतिविधियाँ पुनः कोविड-पूर्व स्तर पर पहुँच सकती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा कर दी है कि कोविड टीकाकरण का दायित्व पुनः केंद्र सरकार का होगा जिसमें निजी क्षेत्र भी सक्रिय रहेगा। टीकाकरण होने के बाद आर्थिक गतिविधियाँ शुरू होंगी और रोजगार के अवसर खुलेंगे। अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में उपभोक्ता माँग को बढ़ाना आवश्यक होगा।