अर्थव्यवस्था
किसानों की आय 2023 तक दोगुनी करने का लक्ष्य अभी तक एक सपना ही

2016 में नरेंद्र मोदी सरकार ने 2023 तक यानी सात वर्षों में किसानों की आय दोगुनी करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया। लेकिन इससे पहले 22 वर्षों में (1993-95 से 2015-16) किसानों की आय वास्तविक अर्थों में दोगुनी की जा सकी थी। ऐसे में एक-तिहाई समय में किसानों की आय दोगुनी करने के लिए 10 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि की आवश्यकता है, जबकि पिछले दो दशकों में कृषि की वृद्धि दर 3 प्रतिशत रही है।

इसके प्रति संदेह होना स्वाभाविक है। चार वर्ष गुज़र गए और हम अभी भी 3 प्रतिशत की वृद्धि दर पर ही अटके हुए हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि 2023 तक किसानों की आय दोगुनी करने का स्वप्न पूरा नहीं हो पाएगा। हम भाग्यशाली होंगे यदि हम इस लक्ष्य को 2033 तक भी पूरा कर पाए तो।

2023 तक लक्ष्य को पूरा करने के लिए 15 प्रतिशत की कृषि वृद्धि दर आवश्यक है, यानी वर्तमान से पाँच गुना। जो 2016 में संदेहास्पद था, वह अब 2020 में असंभव है। लेकिन सरकार फिर भी अपने इस लक्ष्य पर अड़ी हुई है, ऐसा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट वक्तव्य से लगा। उन्होंने लक्ष्य प्राप्ति के लिए 16 बिंदुओं का एक एजेंडा सामने रखा। इन कार्य बिंदुओं को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।

पहला, समन्वयी संघवाद। केंद्र राज्य सरकारों को 1. भूमि पट्टे, 2. कृषि उत्पाद और मवेशी विपणन, व 3. कृषि ठेकेदारी पर मॉडल अधिनियम लाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसके अलावा केंद्र देश भर के जल अभाव से ग्रसित 100 जिलों पर ध्यान केंद्रित करके उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास करेगा। यहाँ केंद्र-राज्य का समन्वय कुंजी है।

दूसरा, लागत कम करके आय प्रजनन के लिए विकल्पों की तलाश। इस संबंध में सीतारमण ने घोषणा की कि लाखों किसानों के ग्रिड से जुड़े पंपों को सौर ऊर्जा से संचालित किया जाएगा। साथ ही सुझाव दिया कि वे बंजर भूमि पर सौर उर्जा परियोजनाओं को स्थान दें और ग्रिड को बेचकर अतिरिक्त आय कमाएँ।

डीज़ल या पेट्रोल की बजाय सौर ऊर्जा से चलने वाले पंपों के कारण किसानों की लागत भी कम होगी। इसके अलावा सरकार नीली अर्थव्यवस्था (मछली उत्पादन में बढ़त, समुद्री मछली संसाधनों का विकास, आदि) विकसित करने के साथ 2025 तक दुग्ध उत्पादन दोगुना करके 10.8 करोड़ टन करना चाहती है।

तीसरा पहलू उत्पाद का बाज़ार और कटाई पश्चात प्रणाली पर ध्यान का है। इसके लिए वित्त मंत्री ने गोदामों की क्षमता का आँकलन व तालुक स्तर तक इसके विस्तार की बात कही। साथ ही कोल्ड सप्लाई चेन की स्थापना की बात कही गई जिसके तहत जल्दी खराब हो जाने वाली खाद्य सामग्रियों के लिए रेफ्रिजरेटेड कोच वाली किसान रेल और उत्पादों के त्वरित परिवहन के लिए कृषि उड़ान योजना हो। उद्यान उत्पादों के लिए ‘एक जिला, एक उत्पाद’ योजना है।

रेफ्रिजरेटेड कोच वाली रेल

ये सभी तत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कृषि नीति के अनुरूप हैं। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में कुछ दिशाप्रवर्तक प्रयास किए थे- नई कृषि योजनाएँ, कृषि उत्पाद के लिए राष्ट्रीय ई-मार्केट, ऊर्वरकों के उपयुक्त उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड, आदि।

2015 के बजट में लघु सिंचाई को 5,300 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे और 2016 में कृषि के लिए बजट आवंटन 84 प्रतिशत से बढ़ाकर 47,912 करोड़ रुपये कर दिया गया। फसल बीमा योजना लाई गई, खेती ठेकेदारी के लिए आदर्श कानून बनाया गया, न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाकर फसल की लागत का डेढ़ गुना कर दिया गया और भी बहुत कुछ। कृषि ऋण के लक्ष्य को 2014-15 के 8 लाख करोड़ रुपये दोगुना करके इस बजट में 15 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया।

लेकिन ये सभी प्रयास अच्छे फल नहीं दे पाए। कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर वही है जो आज से छह वर्ष पहले थी। स्पष्ट रूप से मोदी सरकार वही प्रयास दोहराकर दूसरे परिणामों की अपेक्षा नहीं कर सकती। यदि हम किसानों की आय दोगुनी करने के विषय में गंभीर हैं तो प्रयासों में परिवर्तन करने होंगे।

नीति सही है लेकिन योजनाओं ने अधिक कुछ प्राप्त नहीं किया जा सका है। इस दोष के बड़े भागीदार राज्य हैं जो किसी सुधार को लागू करने में अनिच्छुक रहते हैं। इस चुनौती से निपटने के तीन तरीके हैं।

पहला यह कि केंद्र अपना पूरा दायित्व राज्यों को देकर कृषि और इससे संबंधित गतिविधियों पर खर्च होने वाले 4 लाख करोड़ रुपये भी राज्यों को ही सौंप दे। दूसरा यह कि कृषि क्षेत्र का केंद्रीयकरण और राष्ट्रीयकरण कर इसे केंद्र के विषयों वाली सूची में डाल दिया जाए।

ये दोनों उपाय समाधान से अधिक समस्याएँ खड़ी कर देंगे। इस बात को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि अधिक राशि होने से राज्य कृषि क्षेत्र के साथ कुछ अच्छा करने लगेंगे। इसी प्रकार केंद्रीयकरण ऐसी चीज़ है जिससे हर क्षेत्र में बचना चाहिए, विशेषकर कृषि में क्योंकि चुनौतियाँ क्षेत्रवार होती हैं। केंद्र बड़े सुधारों को ठीक तरह से लागू कर सकता है लेकिन इस प्रक्रिया में स्थानीय समस्याएँ और बड़ी हो जाएँगी।

तीसरा तरीका एक सांस्थानिक तंत्र है जहाँ केंद्र और राज्य साथ मिलकर तय समय सीमाओं के अनुसार कार्य करें। वस्तु एवं सेवा कर परिषद की तरह एक निकाय स्थापित किया जा सकता है जिसमें केंद्र व राज्य के कृषि और जल मंत्री हों एवं नीति आयोग या केंद्र द्वारा नियुक्त अन्य कृषि विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करें। मुख्य सुधारों को लागू करने के लिए केंद्र को राज्यों को वित्तीय लाभों से प्रेरित करना होगा।

दूसरा क्षेत्र जहाँ ध्यान दिया जाना चाहिए, वह यह है कि इंफ्रास्ट्रक्चर एवं जल संसाधनों के सदुपयोग को लेकर उचित नीतियाँ बननी चाहिए। हज़ारों करोड़ों रुपये की अनेक सिंचाई योजनाएँ शुरू करने के बावजूद अधिक फल देखने को नहीं मिले हैं।

99 सिंचाई योजनाएँ पूरी होने की कगार पर हैं लेकिन 2018 के अंत तक किसानों को केवल छह परियोजनाओं से ही पानी मिल सका था (इसके बाद का डाटा मंत्रालय की वेबसइट पर अद्यतित नहीं किया गया है)।

समझदारी भरी नीतियों की बात करें तो मृदा स्वास्थ्य कार्ड की क्या उपलब्धि है? ऊर्वरकों के लिए दी जाने वाली सब्सिडियाँ दर्शाती हैं कि यह विफल हुई है। इसका एक बड़ा कारण है फसल विविधता की कमी जिसका दोष सरकार को जाता है क्योंकि लगातार बढ़ने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य से सिर्फ कुछ ही फसलों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कुछ राज्यों ने धान, गन्ने और गेहुँ के अलावा अन्य फसलों को प्रोत्साहित किया है लेकिन ज़मीन पर प्रभाव छोड़ने के लिए यह कम रहा है।

सरकार ने जल अभाव से ग्रसित 100 जिलों पर ध्यान देने का निर्णय लिया है लेकिन इसका परिणाम प्रयास के अनुपात में कम ही रहेगा। इसकी बजाय सरकार को जल के दुरुपयोग की चुनौती से निपटना चाहिए। खेतों में पानी भरकर रखने से किसानों को रोकना होगा और मलजल के पुनः उपयोग के लिए कोई नीति लानी होगी। इज़रायल 80 प्रतिशत जल का पुनः उपयोग करता है और दूसरे स्थान पर स्पेन मात्र 25 प्रतिशत जल का ही पुनः उपयोग कर पाता है।

कैसे? समुद्री जल के अलवणीकरण से। समुद्री तट पर तीन प्रमुख मेट्रो शहर होने के बावजूद हम ऐसा नहीं कर पाए हैं जबकि यह तरीका प्रमाणित भी है। इन संयंत्रों को चलाने के लिए परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता होगी और सरकार इस क्षेत्र में भी अधिक निवेश नहीं कर पाई हैं। इज़रायल की ड्रिप सिंचाई से बहुत कुछ है सीखने के लिए।

मोदी सरकार इसे ‘हर बूंद में अधिक फसल’ से क्रियान्वित करना चाह रही है और सरकार के प्रयासों के कारण लघु-सिंचाई योजना के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र पिछले पाँच वर्षों में लगभग तिगुना हो गया है- 4 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 11 लाख हेक्टेयर के पार चला गया है। सरकार को इसमें और तेज़ी लाने की ज़रूरत है।

तीसरा ध्यान दिया जाने वाला क्षेत्र उत्पादकता बढ़ाना हो सकता है। इसे कैसे प्राप्त किया जाए? बेहतर नस्लों की तकनीक में निवेश करके, सिर्फ मवेशियों नहीं बल्कि बीजों, उनकी किस्मों, कृषि पद्धति में निवेश करके उत्पादकता बढ़ा सकती है जो अतिरिक्त आय बनेगी। निर्यात का उदारीकरण किया जाना चाहिए अन्यथा अत्यधिक आपूर्ति के कारण कीमतें गिरेंगी।

कृषि के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का मात्र 0.7 प्रतिशत ही हम शोध और विकास पर खर्च करते हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हम आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहे हैं।

चीन (57 प्रतिशत), ब्राज़िल (75 प्रतिशत) और यूएस (95 प्रतिशत) की तुलना में भारत का खेत मशीनीकरण (40-45 प्रतिशत) काफी पीछे है। शुल्क किराया केंद्रो (सीएचसी) के माध्यम से खेती मशीनों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया गया लेकिन ये केंद्र क्रियाशील नहीं हैं। अगर सीएचसी मॉडल को तालुक स्तर तक ले जाया जाए तो कृषि उत्पादकता को बल मिल सकता है।

चौथा क्षेत्र जिसे बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है, वह है भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई)। यह कृषि बजट की आधी राशि (2 लाख करोड़ रुपये) का उपयोग करता है (इसका बड़ा भाग खाद्य सब्सिडी में जाता है जिसे भी सुधार की आवश्यकता है)।

जनवरी 2015 में सौंपी गई शांता कुमार कमिटी की रिपोर्ट कई सुधारों के सुझाव देती है, विशेषकर खरीद और नुकसान के विषय में। लेकिन यह रिपोर्ट पिछले पाँच वर्षों से धूल खा रही है।

मोदी सरकार ने समस्याओं को चिह्नित कर लिया है लेकिन योजनाओं की नीतिगत संरचना में कई कमियाँ रह जाती हैं। जो योजनाएँ सहीं है, वे लागू हो पाने के लिए संघर्षरत हैं। कई योजनाओं को बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए। जैसे लघु-सिंचाई योजना काफी प्रभावी सिद्ध हुई है तो इसका विस्तार होना चाहिए।

लेकिन जब तक सभी राज्यों को एक मंच पर लाने का तंत्र स्थापित नहीं होगा, तब तक अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। सरकार 100 छोटी-छोटी चीज़ें करने का प्रयास कर रही है लेकिन कुंजी है कि 10 बड़ी चीज़ें की जाएँ। अन्य 90 अपने आप अनुसरण करेंगी।

यदि ऐसे ही चलता रहा तो वृद्धि दर 3 प्रतिशत पर अटक जाएगी और किसानों की आय 2033 तक ही दोगुनी हो पाएँगी।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।