अर्थव्यवस्था
वित्तीय समावेशन के तीन स्तंभ- जन धन, आधार, मोबाइल

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के स्वर्गीय कम्प्यूटर वैज्ञानिक रॉय अमारा ने अपने नाम पर पड़े एक भविष्यवादी नियम में घोषणा की थी, “लघु अवधि में हम किसी तकनीक के प्रभाव को अधिक आँकते हैं और दीर्घ अवधि में उसे कम आँकते हैं।” भारत का सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर- कई तरीकों से एक ऑनलाइन नौकरशाही- इस सिद्धांत को गलत सिद्ध करता है।

लघु अवधि में इस प्रयास को कमतर आँका गया लेकिन इसके आरंभ से एक दशक के भीतर इसने ज़मीनी स्तर पर तकनीक को क्रियाशील किया है और देश की बड़ी घरेलू संभावनाओं का लाभ उठाया है। भारत अब विकासशील विश्व से अपने अनुभव साझा करने के लिए तैयार है।

हर भारतीय निवासी के लिए 12 अंकों के अद्वितीय पहचान कोड पर आधारित इस प्रणाली ने वित्तीय समावेशन, सार्वजनिक दस्तावेज़ों एवं सेवाओं तक पहुँच, कर अनुपालन, खुदरा भुगतान और सरकारी सब्सिडी के प्रबंधन को बेहतर बनाया है। इसकी कुंजी रही आधार कार्ड- राष्ट्रीय पहचान-पत्र।

आधार को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने 2009 में शुरू किया था। इस कार्यक्रम को चलाने के लिए देश में विकसित बड़ी तकनीकी कंपनी इन्फोसिस के वरिष्ठ अधिकारी नंदन निलेकनी को जोड़ा गया। यह एक महत्वाकांक्षी योजना थी जिसमें विशाल भारतीय भूभाग के विविध और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले 130 करोड़ से अधिक भारतीयों तक पहुँचकर उन्हें इलेक्ट्रॉनिक रूप से व्यवस्थित करना था।

गोपनीयता के मुद्दे पर प्रश्न खड़े किए गए लेकिन सितंबर 2018 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे स्वेच्छा से उपयोग के लिए हरी झंडी दिखा दी। जनवरी 2021 में उससे बड़ी न्यायाधीशों की पीठ ने इस निर्णय पर मोहर लगा दी। आज अधिकांश भारतीयों ने इस बायोमेट्रिक डाटा प्रणाली से जुड़ना चुना है- आधार पर आधिकारिक रूप से 126 करोड़ लोग पंजीकृत हैं।

आधार के लिए किसी बच्चे के लिए जा रहे फिंगर-प्रिंट

 

यह शुरू मनमोहन सिंह सरकार के समय हुआ था लेकिन आधार भारत के सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की रीढ़ की हड्डी 2014 में बना जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे अपनी सरकार के जन धन प्रयास- बैंक से न जुड़े हुए भारत के करोड़ों घरों के लिए एक वित्तीय समावेशन कार्यक्रम- से जोड़ दिया।

इन नए खातों को आधार और मोबाइल नंबर से भी जोड़ा गया जिससे जन धन-आधार-मोबाइल यानी जैम की तिगड़ी बनी। आज भारत में 80 प्रतिशत से अधिक नागरिकों के पास बैंक खाते हैं जो कि इस कार्यक्रम के शुरू होने से पहले इसका आधा था।

ये डिजिटल नेटवर्क ही आज भारत के सामाजिक सुरक्षा और नकद हस्तांतरण कार्यक्रमों की धुरी है जो पहले कभी भ्रष्टाचार और अविश्वसनीयता का शिकार हुआ करते थे। आज सरकार 317 कार्यक्रमों का सीधा लाभ देने के लिए जैम का उपयोग कर रही है।

गत वित्तीय वर्ष में 2.6 अरब भुगतान हुए जिसमें 46 अरब डॉलर की राशि लाभार्थियों को पहुँचाई गई। 2013 से अब तक कुल 1.95 खरब डॉलर राशि खातों में जमा की जा चुकी है।

भारत के सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की चार बड़ी सफलताएँ- यूनाइटेड पेमेन्ट्स इन्टरफेस (यूपीआई), भारत क्यूआर, भारत बिल भुगतान प्रणाली (बीबीपीएस) और रुपे कार्ड रहे हैं। ये सभी डिजिटल नेटवर्क के सभी या बैंकिंग, सुरक्षित पहचान और मोबिलिटी जैसे भागों के साथ काम करते हैं।

यूपीआई के माध्यम से मोबाइल ऐप तथा ई-कॉमर्स मंचों द्वारा एक-दूसरो को एवं ग्राहक से व्यापारी को भुगतान किया जा सकता है जिसमें पैसे हस्तांतरण के लिए पहचान जैम उपलब्ध करवाता है। एक महीने में इसपर 2 अरब भुगतान होते हैं और शुरू होने के मात्र चार वर्षों में यह छोटी से बड़ी हर दुकान पर देखा जा सकता है।

भारत क्यूआर के माध्यम से ग्राफिक कोड को स्कैन करके बिना मोबाइल नंबर साझा किए भुगतान किया जा सकता है। इससे प्रति माह 25 करोड़ भुगतान होते हैं। 2018 में शुरू होने वाले बीबीपीएस से ऑनलाइन या यूपीआई ऐप के माध्यम से सेवा शुल्क, विद्यालय शुल्क, बीमा प्रीमियम, ऋण की किश्त, यानी कोई भी बिल भरा जा सकता है।

2012 में शुरू किए गए रुपे कार्ड का उद्देश्य वीज़ा एवं मास्टरकार्ड को टक्कर देना था। अभी तक 60 करोड़ कार्ड जारी किए जा चुके हैं, मुख्यतः जन धन खातों के लिए। खरीद बिंदु भुगतान में रुपे की बाज़ार में 30 प्रतिशत भागीदारी है जबकि ऑनलाइन भुगतान में 25 प्रतिशत।

भारत रुपे कार्ड को स्थानीय भुगतान प्रणाली के अनुकूल बनाने के लिए ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, भूटान, माल्दीव्स, म्यांमार, सऊदी अरब, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे नौ देशों के साथ काम कर रहा है।

वास्तव में भारत जैसी रसद और जनसांख्यिकी चुनौतियों का सामना करने वाले अन्य देश भी ऐसा डिजिटल नेटवर्क अपनाना चाहते होंगे। 2018 में बिल गेट्स ने आधार का समर्थन करते हुए इस योजना को स्वीकारने के लिए मोदी की सराहना की थी।

मार्च 2019 में अपनी रिपोर्ट “डिजिटल इंडिया” में मैककिन्सी वैश्विक संस्थान ने कहा था कि “भारत के द्रुत डिजिटलीकरण में सार्वजनिक क्षेत्र ने बड़ी भूमिका निभाई है। आधार को सरकार के बढ़ावे ने बड़ा योगदान दिया।” भारत के सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्यात करोड़ों के जीवन स्तर को बेहतर करके भारत के प्रभाव को बढ़ाएगा।

कोविड-19 संकट के बीच भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा है और इसके अनुकूल ढला है। जैम-संबंधित टीकाकरण निगरानी ऐप कोविन और संपर्क ट्रेस करने वाली आरोग्य सेतु ऐप कोरोनावायरस के विरुद्ध भारत के युद्ध में अभिन्न अंग हैं।

इलेक्ट्रॉनिक वैकेसीन इंटेलीजेंस नेटवर्क 27,000 टीका भंडारण केंद्रों को जोड़कर 50,000 शीत शृंखला धारकों के सहयोग से बना एक स्मार्टफोन-आधारित आपूर्ति शृंखला मंच है जो प्रति वर्ष 2.7 करोड़ नवजात शिशुओं की आवश्यकता का प्रबंधन करता है।

सामाजिक-आर्थिक अंतर को मिटाने के लिए डिजिटल खाई को भरना सर्वश्रेष्ठ तरीका है। भारत इसमें अग्रणी नेतृत्व कर सकता है।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति और सम-सामयिक विषयों पर लिखते हैं। वे @c_aashish द्वारा ट्वीट करते हैं।