अर्थव्यवस्था
कपास को पंजाब में निजी व्यापारियों ने एमएसपी से अधिक मूल्य पर खरीदा, जानें कारण

एक ओर जहाँ पंजाब के कुछ किसान नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि सुधारों का विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पंजाब के कई कपास किसान ऐसे भी हैं जो इन्हीं प्रगतिशील नीतियों से लाभ कमा रहे हैं। ऐसा इसलिए हो पा रहा है क्योंकि ये कानून किसानों को अनुमति देते हैं कि वे कहीं भी, किसी को भी अपना उत्पाद आपसी सहमति पर निर्धारित मूल्य पर बेच सकें।

पंजाब के कपास किसानों को कपास के लिए इस मौसम (जुलाई 2020-जून 2021) हेतु केंद्र सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5,515 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक दर निजी व्यापारी दे रहे हैं। ट्रिब्युन इंग्लिश दैनिक के अनुसार निजी खिलाड़ी कपास को 5,900 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीद रहे हैं।

पंजाब के कपास किसानों को अधिक मूल्य क्यों मिल रहा है, इसके दो कारण हैं।

हला, राज्य के आधिपत्य वाले भारतीय कपास निगम (सीसीआई) ने पंजाब में इस मौसम में होने वाला उत्पाद का 50 प्रतिशत से अधिक 5 लाख से अधिक गट्ठरों (170 किलोग्राम का एक गट्ठर) के रूप में खरीद लिया है।

भारतीय कपास व्यापार का शीर्ष निकाय, भारतीय कपास संघ (सीएआई) के अनुसार देश भर में होने वाले कपास के 356 लाख गट्ठर में से 10.5 लाख का उत्पादन पंजाब में होने की अपेक्षा थी। ऐसे में अब निजी व्यापारी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जुट गए हैं, विशेषकर उत्तरी क्षेत्र की कपड़ा मिलों से संबंधित उद्यमी। ”

ओटी हुई कपास की प्रति कैन्डी (356 किलोग्राम) दर उत्तर भारत समेत कुछ राज्यों में 41,000 रुपये से बढ़कर 43,500 रुपये हो गई है। इसलिए निजी व्यापारी मूल्य समानता के कारण सीधे किसानों से ही खरीद रहे हैं।”, सीएआई अध्यक्ष अनिल घनवत ने बताया।

पटियावा, बठिंडा, लुधियाना और फाज़िल्का जैसे क्षेत्रों के धुनियों और मिलों का प्रतिनिधित्व करने वाले निजी व्यापारीयों ने रिपोर्ट के अनुसार 30 लाख कपास के गट्ठर खरीदे हैं। फाज़िल्का जिले में कृषि उपज बाज़ार समिति (एपीएमसी) की मंडियों में कपास की कीमत एमएसपी से 200 रुपये अधिक रही, वहीं बठिंडा में यह एमएसपी के आसपास बरकरार थी।

बठिंडा का सीसीआई गोदाम

 दूसरा कारण है कि पिछले वर्ष के जून की तुलना में सूत के दाम 50 प्रतिशत अधिक हो गए हैं। कपड़ा उद्योग के सामान्य उत्पादन दर पर लौटने के साथ ही कताई मिलों में सूत का भंडार समाप्त हो गया है।

कताई मिलें अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के साथ-साथ बांग्लादेश, वियतनाम और चीन जैसे देशों में निर्यात भी करती हैं इसलिए कपास का मूल्य बढ़ गया है। “कपास के मूल्य बढ़ने का एक कारण यह भी है कि बिनौलों की दर बेहतर हुई है। ओटी हुई कपास के साथ बिनौलों के दाम भी बढ़े हैं इसलिए धुनिया वर्ग के लोग बेहतर कीमत दे रहे हैं।”, कपास और सूत का काम करने वाले राजकोट आधारित व्यायपारी आनंद पोपट ने कहा।

भारत के सॉल्वेन्ट एक्स्ट्रैक्टर्स संघ के अनुसार बिनौलों का दाम 22,000 रुपये प्रति टन है जबकि दिसंबर के आखिरी सप्ताह में यह 20,500 रुपये था। निजी व्यापार आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास कर रहा है, यह देखते हुए 1 अक्टूबर से अब तक पंजाब, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे कई कपास उगाने वाले राज्यों से 83 लाख गट्ठर खरीद चुके सीसीआई ने अपनी खरीद धीमी कर दी है।

“सीसीआई अब प्रतिदिन 2 लाख गट्ठर की जगह 1 लाख गट्ठर ही खरीद रहा है।”, सीएआई के घनवत ने बताया। पोपट ने बताया, “सीसीआई गुजरात में अधिक कपास नहीं खरीद सकी क्योंकि अक्टूबर से ही राज्य में कीमत एमएसपी से ऊपर चढ़ी हुई है।”

सीसीआई का गुजरात के बहादुरपुर में स्थित गोदाम

द ट्रिब्युन ने बठिंडा के एक कपड़ा कंपनी के मालिक का उल्लेख किया है जिसमें वे कह रहे हैं कि सीसीआई द्वारा अधिकांश उत्पाद खरीदे जाने के कारण, वे लोग कपास खरीदने में परेशानियों का सामना कर रहे हैं। कपड़ा उद्योग, विशेषकर कताई मिलें क्षमता का 90 प्रतिशत काम कर रही हैं।

कपड़ा बनाने वाली कंपनियों के बीच सूत खरीदने की मारा-मारी के कारण मूल्य बढ़ा है और सूत की कमी देखने को मिली है। कताई मिलों का मानना है कि यह अभाव महीने भर में ठीक हो जाएगा और उसके बाद मूल्य भी स्थिर हो जाएगा। हालाँकि कुछ किसान मूल्य के और भी बढ़ने की अपेक्षा में अपना उत्पाद रोके हुए हैं।

यह मूल्य वृद्धि कुछ समय या थोड़ी ही रहेगी इसका प्रमुख कारण है कि पिछले भंडार में बचा हुआ कपास। अगले मौसम तक भी यह भंडार बरकरार रहेगा और सीएआई का अनुमान है कि भंडार में 100 लाख से अधिक गट्ठर होंगे। पिछले मौसम में 50 लाख गट्ठर के निर्यात और इस वर्ष 54-60 लाख गट्ठरों के निर्यात के अनुमान के बावजूद भंडार उच्च स्तर पर बना हुआ है।

यह गतिविधि हमें तब देखने को मिल रही है जब पिछले कई सप्ताहों से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के नेतृत्व वाली पीठ ने कृषि कानूनों को स्थगित भी कर दिया है लेकिन किसान पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।