अर्थव्यवस्था
विवादास्पद जीडीपी आँकड़े: यूपीए और एनडीए दोनों जीडीपी वृद्धि की बजाय रोजगार पर केंद्रित करें ध्यान

प्रसंग
  • रोजगार का हिसाब लगाना जीडीपी रुझानों का हिसाब लगाने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वृद्धि और रोजगार के बीच संबंध समय कमजोर है, बल्कि शायद टूट चुका है।
  • बात जब रोजगार की आती है, तब न ही यूपीए और न ही एनडीए, किसी ने भी संतोषजनक कार्य नहीं किया है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के वर्षों के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आँकड़ों की पिछली नई श्रृंखला पर भाजपा और कांग्रेस के दावे कि मेरी-वृद्धि-आपसे-बेहतर-है, पूरी तरह से खोखले हैं। जबकि कांग्रेस निश्चित रूप से इस तथ्य से मुँह नहीं मोड़ सकती कि यूपीए वर्षों (2004-14) के लिए नए जीडीपी आँकड़े नरेंद्र मोदी के अंतर्गत राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन-2 (एनडीए-2) के पिछले चार वर्षों के आँकड़ों की अपेक्षा कम औसत वृद्धि दर्शाते हैं, वहीं नए आँकड़ों के लिए भाजपा के पास भी अपनी पीठ थपथपाने के कोई कारण नहीं है। कार्यप्रणाली में बदलाव से प्रेरित पुराने वृद्धि आँकड़े आधारभूत वास्तविकताओं को नहीं बदलते हैं जैसे – डबल बैलेंस शीट की समस्या, ख़राब निर्यात वृद्धि या कमजोर पूँजी निवेश इत्यादि।

अगस्त में, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) द्वारा 2005-12 की अवधि के लिए जारी की गई पिछली श्रृंखला के “प्रयोगात्मक परिणामों” से पता चला है कि यूपीए के चार वर्षों में जीडीपी वृद्धि दर 9 प्रतिशत थी। यहाँ तक कि 2006-07 में वृद्धि दर दो अंकों में भी पहुंची थी।

कार्यप्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर विशेषज्ञों की विवेचना के बाद निकल कर आई नवीनतम आधिकारिक पिछली श्रृंखला में, यूपीए की अवधि की वृद्धि 7.75 प्रतिशत से अगस्त की शुरुआत में 6.82 प्रतिशत परिगणित हुई, जबकि एनडीए के चार वर्षों में 7.35 प्रतिशत दर्शायी गई है। नई जीडीपी श्रृंखला में 2010-11 को आधार वर्ष चुना गया था।

सीधे शब्दों में कहें तो, कांग्रेस हो-हल्ला इसलिए मचा रही है क्योंकि दूसरी और संशोधित श्रृंखला दर्शाती है कि यूपीए के किसी भी वर्ष में यह वृद्धि 9 प्रतिशत से ऊपर नहीं गई थी। 2010-11 में यूपीए की वृद्धि सरकार द्वारा उत्पाद और सेवाकर में कटौतियों के कारण सबसे ज्यादा, 8.5%, थी। सरकार का यह कदम बाद में उच्च मुद्रास्फीति और वृद्धि में अवत्वरण का कारण बना क्योंकि राजकोषीय और चालू खाता घाटे नियंत्रण से बाहर हो गए थे।

जैसे यूपीए का आर्थिक कुप्रबंधन उच्च मुद्रास्फीति और गिरते हुए राजकोषीय घाटे का कारण बना, वैसे ही जीडीपी वृद्धि में एनडीए के योगदान को एक बड़ी सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता है, क्योंकि डबल बैलेंस शीट की समस्या बनी हुई है और बैंकों से लेकर एनबीएफसी और टेलीकॉम और विमानन तक कई क्षेत्र गंभीर मुसीबत में हैं। एनडीए की वास्तविक सफलता मुद्रास्फीति और राजकोषीय समेकन के मोर्चे पर रही है लेकिन यह काफी हद तक तेल की कम कीमतों का परिणाम है। लेकिन तेल के करों से मिले लाभ को मुफ्त सेवाओं में बांटने के बजाय राजकोष को दुरुस्त करने के लिए एनडीए सरकार की तारीफ होनी चाहिए।

मुश्किल सुधारों को लागू करना एनडीए की वास्तविक सफलता रही है, जिसमें प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से सब्सिडी प्रणाली, वस्तु एवं सेवाकर लागू करने और ख़राब लोन के मुद्दे से निपटने के लिए दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) का कानून बनाने के सुधार शामिल हैं। यूपीए, जो 2008 तक व्यापार और विकास में वैश्विक उछाल से लाभान्वित हुई, ने लगभग कोई सुधार नहीं किया था।

दूसरे शब्दों में कहें, तो एनडीए के अंतर्गत विकास में अपेक्षाकृत धीमी शुरुआत कठोर सुधारों का परिणाम है, जबकि यूपीए के उत्तरार्द्ध कार्यकाल में इसकी वृद्धि में अवत्वरण पूरी तरह से 2008-09 में एक प्रोत्साहन पैकेज के कारण हुए राजकोषीय अतिव्यय को ठीक करने में इसकी असफलता का परिणाम था।

यह संभव है कि एक बार सुधार पूरी तरह स्थापित होने के बाद वृद्धि में एक वर्ष या उससे ज्यादा समय लगे, लेकिन हमें इसके होने का इंतजार करना होगा।

हालाँकि, न ही एनडीए और न ही यूपीए, भाजपा या कांग्रेस, अपना सीना ठोकने के लिए पुरानी या नई पिछली श्रृंखला के आँकड़ों का इस्तेमाल करने की हिम्मत नहीं जुटा सकतीं हैं। कारण: सिर्फ वृद्धि अच्छे आर्थिक प्रबंधन की गवाही नहीं देती है क्योंकि यह पूरी तरफ से किस्मत और वैश्विक कारकों के कारण भी हो सकता है जिसमें किसी का बस नहीं चलता।

अच्छे अर्थशास्त्र से आदर्श रूप से और अधिक रोजगार के परिणाम प्राप्त होने चाहिए लेकिन यूपीए या एनडीए किसी के भी कार्यकाल में ऐसा नहीं हुआ है। कम से कम, इसे साबित करने के लिए कि यह हो रहा है, कोई भी विस्तृत आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। साक्ष्य बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रोजगार लोच पिछले दो दशकों में लगातार गिरी है और अब यह 0.2 से नीचे है या शायद 0.1 पर है। 0.1 पर, रोजगार में 1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करने के लिए आपको 10 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि की आवश्यकता होती है।

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया, 2018 पर एक रिपोर्ट यह कहती है कि, “जैसे-जैसे जीडीपी वृद्धि दर बढ़ी है, वैसे-वैसे वृद्धि और रोजगार सृजन के बीच सम्बन्ध कमजोर हुआ है। 1970 और 1980 के दशक में, जब सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर लगभग 3-4 प्रतिशत थी, तब रोज़गार वृद्धि लगभग 2 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी। 1990 के दशक से, और विशेष रूप से 2000 के दशक में, जीडीपी की वृद्धि 7 प्रतिशत तक पहुँची है लेकिन रोजगार वृद्धि में कमी आई है जो कि 1 प्रतिशत या इससे भी कम है। रोजगार वृद्धि से जीडीपी वृद्धि का अनुपात वर्तमान समय में 0.1 से कम है।”

यहाँ तक कि अगर आप जीडीपी वृद्धि पर अगस्त के आँकड़े देखते हैं तो साफ है कि यूपीए के तहत केवल एक बार दो अंकों की जीडीपी वृद्धि दर्ज की गई थी।

पी. चिदंबरम, जो अगस्त की पिछली श्रृंखला जारी होने पर बहुत खुश थे, ने तब दावा किया था कि यूपीए की अवधि दशकीय वृद्धि की सर्वश्रेष्ठ अवधि थी जो भारत ने कभी नहीं देखी थी। जब नई पद्धति में पिछली श्रृंखला को गिरावट बताकर चिह्नित किया गया है तो उनको लकवा मार गया है। जब से नीति आयोग द्वारा नए जीडीपी आँकड़ों को जारी किया गया था, जिसकी केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा गणना की गई थी, चिदंबरम ने अपने ट्वीटों में संगठन और डेटा दोनों को अपमानित किया था। “नीति आयोग के संशोधित जीडीपी आँकड़े एक मजाक हैं। वे एक बुरा मजाक हैं। दरअसल, वे एक बुरे मजाक से भी बदतर हैं। ये आँकड़े पक्षपात का नतीजा हैं। नीति आयोग ने पक्षपातपूर्ण कार्य किया है इसलिए अब इस बेकार निकाय को बंद कर देना चाहिए।”

एक पूर्व वित्त मंत्री के रूप में चिदंबरम को पता होना चाहिए कि पिछली जीडीपी की गणना करने के लिए एक नई पद्धति का उपयोग करना कम प्रशंसनीय आँकड़े दे सकता है। जब पिछली अगस्त श्रृंखला को जारी किया गया था, तब यूपीए के समय वृद्धि दर्ज हुई थी, लेकिन 1994-95 और 2003-04 के बीच का डेटा जीडीपी में पिछली श्रृंखला से गिरावट दिखाता है।

चिदंबरम सन्देशवाहक पर निशाना साध रहे हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने दि इकोनॉमिक टाइम्स को दिए गए साक्षात्कार में संशोधित संख्याओं में कोई भी राजनीतिक स्वार्थ होने से इंकार किया और एनडीए के लिए किसी भी श्रेय का दावा नहीं किया। नई पिछली श्रृंखला में तीन बड़ी बातें इस प्रकार हैं – “यह मिथक टूट चुका है कि भारत वैश्विक रूझान से प्रथक हो गया है। पिछली श्रृंखला के डेटा से पता चलता है कि वैश्विक संकट का असर अनुमान से कहीं अधिक गहरा था। आगे बढ़ते हुए, भारत को वैश्विक रुझानों के अनुरूप अपनी नीतियों पर ध्यान देना चाहिए। दूसरी बड़ी बात यह है कि 8 प्रतिशत वृद्धि की उच्चतम दर को तोड़ना मुश्किल है। तृतीयक क्षेत्र के विकास का पूरी तरह से अधिमूल्यांकन किया गया था। हमें संरचनात्मक सुधारों के साथ कड़ी मेहनत करने की जरूरत है। इसके अलावा, अपने सांख्यिकीय डेटा में सुधार करने के लिए हमने और निवेश की जरूरत को महसूस किया है। यह समय है कि नीति निर्माण में मदद करने के लिए हम अपने डेटा को आधुनिक और रियल-टाइम बनाने के लिए बजटीय संसाधन आवंटित करें।”

वह सही हैं। लेकिन इस बेहतर डेटा एकत्रीकरण के प्रयास की शुरुआत नौकरियों के क्षेत्र से होनी चाहिए। रोजगार का हिसाब लगाना जीडीपी रुझानों का हिसाब लगाने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वृद्धि और रोजगार के बीच सम्बन्ध इस समय कमजोर है, बल्कि शायद टूट चुका है।

बात जब रोजगार की आती है, तब न ही यूपीए और न ही एनडीए, किसी ने भी संतोषजनक कार्य नहीं किया है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।