अर्थव्यवस्था
कृषि लागत और लाभ- कैसे केंद्र अपने पसंद की फसल उगाने के लिए करे प्रोत्साहित

आशुचित्र- कृषि लागत और मूल्य आयोग की रिपोर्ट भारतीय कृषि में हो रहे परिवर्तन की ओर संकेत करती है जहाँ किसान उच्च मूल्य मिलने वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।

क्या केंद्र अपने मन की फसल उगाने के लिए किसानों को लुभा सकता है, विशेषकर वे फसलें जो माँग से अभाव में हैं? उदाहरण स्वरूप इस वर्ष भारत में निर्यात की दृष्टि से मक्के की फसल का अभाव है। दूसरी ओर देश में अभी भी खाना पकाने के तेल का आयात करना पड़ता है जिसमें मूल्यवान विदेशी मुद्रा व्यय होती है।

खरीफ 2019-20 के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य

यदि हम कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पेपर खरीफ फसलों की मूल्य नीति- 2019-20 के लिए बिक्री  को देखें तो संकेत मिलता है कि अपनी पसंद की फसल उगाने के लिए सरकार किसानों को प्रेरित कर सकती है। उदाहरण के लिए, 2014-15 से 2016-17 तक तीन वर्षों में अरहर की खेती में सर्वाधिक वृद्धि हुई है। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि सरकार ने इस दाल की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर इसे प्रोत्साहित किया।

जून से सितंबर तक उगाए जाने वाली खरीफ फसल पर लाभ की बात करें तो 2016-17 तक के तीन वर्षों के लिए आयोग ने कहा कि खेती मूल्य पर प्रति हेक्टेयर अरहर पर मिलने वाला लाभ सर्वाधिक है जिसका मूल्य 30,600 रुपये का है।

खेती पर मिलने वाला प्रतिफल

सीएसीपी पेपर की अन्य बातों को जानते हैं-

सर्वाधिक लाभ में मूँगफली का स्थान दूसरा है जहाँ इसपर प्रति हेक्टेयर 25,050 रुपये का लाभ मिलता है, वहीं दूसरी ओर नाइजर बीज पर कम उपज के कारण किसानों को प्रति हेक्टेयर 1,710 रुपये का घाटा झेलना पड़ता है। अनाजों में अधिक पानी की लागत वाले धान पर सर्वाधिक प्रति हेक्टेयर 17,675 रुपये का लाभ होता है और इसके बाद मक्के पर 12,261 रुपये का लाभ मिलता है।

अनाजों की तुलना में कपास पर अधिक लाभ मिला जहाँ प्रति हेक्टेयर किसानों नें 21,123 रुपये कमाए। लेकिन कम उत्पादन के कारण पोषक अनाजों जैसे बाजरा, जोवार और रागी पर प्रति हेक्टेयर 6,000 रुपये से कम का लाभ मिला। उड़द पर कुल प्रतिफल प्रति हेक्टेयर 20,072 रुपये का मिला।

वहीं मूँग पर प्रति हेक्टेयर 9,000 रुपये से भी कम की कमाई हुई। तेलबीजों में सीसम पर प्रति हेक्टेयर 12,671 रुपये और सूरजमुखी पर 7,130 रुपये मिले। खरीफ तेलबीजों में सबसे अधिक उगाई जाने वाली सोयाबीन पर प्रति हेक्टेयर मात्र 5,714 रुपये का लाभ मिला।

इन आँकड़ों से आयोग ने इस वर्ष खरीफ फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुझाने से पूर्व 14 फसलों की लागत निकाली। सीएसीपी ने उन्हीं राज्यों का अवलोकन किया जो राष्ट्रीय उत्पादन में अहम भूमिका निभाते हैं।

लागत की तुलना में अरहर पर कुल प्रतिफल 174 प्रतिशत था, मूँगफली पर 142 प्रतिशत और उड़द पर 114 प्रतिशत। लागत से 120 प्रतिशत प्रतिफल कपास पर मिला और वहीं धान पर 100 प्रतिशत।

सीएसीपी ने कहा कि खेती पर मजदूरी शुल्क में पिछले वर्ष 6.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। अगर मान लें कि शुल्क स्थिर रहा तो लागत में 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। राज्यों में सबसे अधिक श्रम मूल्य में वृद्धि राजस्थान में हुई जहाँ मूल्य 12.4 प्रतिशत बढ़ा, वहीं ओडिशा में यह वृद्धि 0.6 प्रतिशत के साथ सबसे कम रही।

समर्थन मूल्य के विषय में सीएसीपी ने कहा कि नई तकनीक अपनाने, राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन पद्धति अपनाने और भूमि, पानी, आदि संसाधनों का तर्क सम्मत उपयोग करने पर किसानों को लाभ दिया जाना चाहिए।

इस माह की शुरुआत में सरकार द्वारा स्वीकृत हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुझाने के लिए इस वर्ष सीएसीपी ने लागत, माँग-आपूर्ति स्थिति, फसलों के बीच भाव समानता, गैर-कृषि उत्पादों से व्यापार निबंधन और घरेलु एवं वैश्विक बाज़ार में कीमत पर विचार किया था। मूल्य नीति के अर्थव्यवस्था पर प्रभाव और किसानों को लागत से कम से कम 50 प्रतिशत मूल्य सुनिश्चित करने के विषय पर भी सोचा गया।

पोषक अनाजों के निम्न मूल्य पर चिंता व्यक्त करते हुए सीएसीपी ने कहा कि राज्य को उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मिड डे मील (मध्याह्न भोजन) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं में सम्मिलित किया जाए और मल्टी-ग्रेन की तरह उनका प्रसंस्करण किए जाने के साथ-साथ अन्य मूल्य वर्धक रणनीतियाँ भी बनाई जाएँ।

सीएसीपी ने कहा कि भारत में फसलों का उत्पादन दो कारणों से कम हुआ। पहला यह कि भारत में प्रति हेक्टेयर उपज विश्व औसत से कम है और दूसरा विभिन्न मौसमों के कारण यहाँ अंतर-क्षेत्रीय उत्पादन में बड़ा अंतर है।

पिछले 15 वर्षों में चावल, मक्का, बाजरा, जोवार और रागी जैसे अनाजों की उत्पादकता 1.46 प्रतिशत के साथ सबसे कम रही है। 2018-19 तक पिछले पाँच वर्षों में कुल अनाज के क्षेत्रफल में 0.55 प्रतिशत की गिरावट हुई है और उत्पादन वृद्धि 2.06 प्रतिशत धीमी पड़ गई है। इस काल में खरीफ उत्पादन वृद्धि दर 2 प्रतिशत धीमी पड़ी और फसल के क्षेत्रफल में 0.71 प्रतिशत की गिरावट हुई है।

दूसरी ओर दाल उत्पादन में 8.76 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 2018-19 तक उत्पादकता में पिछले पाँच वर्षों में 3.18 प्रतिशत की वृद्धि। इस काल में खरीफ दालों का उत्पादन 11.5 प्रतिशत बढ़ा है जबकि उपज वृद्धि दर 4.56 प्रतिशत ही है, वहीं 2013-14 तक पाँच वर्षों में यह 5.95 प्रतिशत थी।

तेलबीजों की उपज और उत्पादन में इस काल में गिरावट आई है और इनका क्षेत्रफल 3.08 प्रतिशत घटा है। यह पिछले दो दशकों में तेलबीजों में हुी अच्ची वृद्धि की तुलना में है, संभवतः सरकार ने इस ओर ध्यान देना छोड़ दिया है।

कपास की फसल भी चिंता का विषय है क्योंकि इन पाँच वर्षों में इसकी उत्पादकता 3.28 प्रतिशत घटी है और इसके क्षेत्रफल में वृद्धि भी 0.96 प्रतिशत धीमी हो गई है। इस कारण से 2018-19 तक पाँच वर्षों में इसका उत्पादन भी 3.12 प्रतिशत घटा है। इसका कारण हो सकता है कि किसानों को नए प्रकारों का उपयोग करने की छूट नहीं मिली है और पुराने प्रकार अपनी उपज-क्षमता खो रहे हैं।

सीएसीपी की रिपोर्ट भारतीय कृषि में हो रहे परिवर्तन की ओर संकेत करती है जहाँ किसान उच्च मूल्य मिलने वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। साथ ही, दाल जैसी फसलों को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्र की न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति कारगर सिद्ध होती दिख रही है।

संभवतः, सरकार विशेष फसलों की वृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त कर सकती है यदि यह आवश्यक फसल को उगाने के लिए कृषक को मौसम की शुरुआत में ही प्रोत्साहित करे। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा काफी पहले होनी चाहिए ताकि मौसम के पूर्व ही किसान योजना बना सकें कि कौनसी फसल उगानी है।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani द्वारा ट्वीट करते हैं।