अर्थव्यवस्था
बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया और देना बैंक के विलय से एक नई पहचान और ब्रांड का आगाज
बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया और देना बैंक के विलय से एक नई पहचान और ब्रांड का आगाज

प्रसंग
  • विलय के लिए प्रास्तावित बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक को सांस्कृतिक एकीकरण के क्षेत्र में अपनी सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
  • अगर यह विलय काम कर जाता है तो तीन काम काफी महत्वपूर्ण हैं।

विलय हमेशा से एक गन्दा व्यवसाय रहा है। इसकी वजह यह है कि इसमे केवल बैलेंस-शीटों, चालक सहक्रियाओं और ओवरहेडों की कटिंग ही नहीं होती है बल्कि इसमें संस्कृतियों और लोगों का एकीकरण भी होता है। दुनिया भर में, तीन में से दो विलय लोगों और सांस्कृतिक एकीकरण समस्याओं के कारण अपना प्रदर्शन करने में नाकाम रहे।

विलय के लिए प्रास्तावित बैंक ऑफ बड़ौदा, विजया बैंक और देना बैंक को सांस्कृतिक एकीकरण के क्षेत्र में अपनी सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। खस्ता हालातों का सामना कर रही देना बैंक को तो इससे कोई समस्या नहीं होगी उसके कर्मचारी एक एक मजबूत इकाई का हिस्सा बनने के लिए उत्सुक होगें, लेकिन विजया के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है, जो वास्तव में वास्तविक मूल्य और तालिका में एक मजबूत बैंलेस शीट लेकर आ रही है। बेंगलुरू आधारित विजया बैंक की दक्षिण भारत में अच्छी पकड़ है और इसको अपनी पहचान की अच्छी समझ है, इसलिए यह बैंक ऑफ बड़ौदा में शामिल होने का विरोध कर सकती है, जिसके पास राष्ट्रीय स्तर की एक मजबूत ब्रांड छवि है और विलय के लिए इसके पास चालक दल होगा।

जाहिर है कि अगर यह विलय काम कर जाता है तो तीन काम काफी महत्वपूर्ण हैं।

पहला, प्रबंधनों को एक मजबूत संचार रणनीति बनाकर काम शुरू करना होगा। औपचारिक तथा पारदर्शी पुर्नमूल्यांकन प्रक्रिया के द्वारा कर्मचारियों के एकीकरण की जरूरत होगी ताकि केवल सबसे अच्छे उम्मीदवारों को ही महत्वपूर्ण नौकरियां प्राप्त हों।

दूसरा,  नौकरी न खोने के सरकारी आश्वासन के बावजूद भी, जब तक लोग अपनी मर्जी से नौकरी नहीं छोड़ेंगे और नए प्रतिभावान लोगों को भर्ती नहीं किया जाएगा तब एक साथ मिलकर काम नहीं हो पाएगा।

लोगों को नौकरी से हटाने की बात को स्वैच्छिक रूप से स्वीकार करवाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उनको न केवल यादगार विदाई दी जाए बल्कि उनके समूहों को छोटी ईकाईयां स्थापित करने की अनुमति दी जाए जो इन एकीकृत इकाइयों से शुल्क राजस्व कमा सकें, या इसके उत्पादों को बेचकर नए ग्राहक बनाने में मदद कर सकें। दूसरी तरफ, बैंकों को अत्यधिक कुशल और उच्च वेतनमान वाले तकनीकि, मार्केटिंग और साइबर सुरक्षा पेशेवरों को भर्ती करना होगा, क्योंकि बैंकिंग गहन-तकनीकि, कम-शाखा और लोगों पर ध्यान केन्द्रित करने वाली हो गई है।

तीसरा, सभी शेष बचे कर्मचारियों को संबद्धता की एक नई भावना से रूबरू करवाने के लिए बैंक को एक नया नाम रखना होगा। हालांकि इसका नाम बैंक ऑफ बड़ौदा रखना भी सही लगता है, जो मजबूत है और एक नया नाम रखने के लिए एक समान रूप से यह सार्थक हो सकता है, इससे तीनों बैंकों के सभी कर्मचारियों को यह पहचान भी मिल सकती है और उनको यह भी महसूस नहीं होगा कि वे दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। एक नया ब्रांड बैंक को अपने व्यापार का विस्तार करने और एक आधुनिक इकाई के रूप में सामने आने का मौका प्रदान करेगी, न कि पुराने चलन के सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक के रूप में। बैंक ऑफ बड़ौदा ने निजी क्षेत्र के सीईओ पीएस जयकुमार के तहत अपने अंदरूनी हिस्सों को बदलना शुरू कर दिया है इस नई शुरूआत से इसका नाम और ब्रांड भी बदल जाएगा।

क्या बैंक ऑफ बड़ौदा के पास यह बैंक ऑफ भारत इंटरनेशनल बनने का समय है?

जगन्नाथन स्वाराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।