अर्थव्यवस्था
इथेनॉल का ईंधन में अधिक उपयोग का अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, कृषि व स्वास्थ्य पर प्रभाव

यूएस ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) के अनुसार, “यूनाइटेड स्टेट्स में बेचे जाने वाले गैसोलिन (परिष्कृत पेट्रोल) में अब लगभग 10 प्रतिशत इथेनॉल होता है।” यूनाइटेड स्टेट्स में कोई भी गैसोलिन पर चलने वाली गाड़ी ई10 (10 प्रतिशत इथेनॉल के साथ गैसोलिन) का उपयोग कर सकती है लेकिन 10 प्रतिशत से अधिक इथेनॉल वाले मिश्रणों का उपयोग केवल कुछ वाहन ही कर सकते हैं।

एक ईंधन-लचीला वाहन 10 प्रतिशत से अधिक इथेनॉल वाले गैसोलिन का उपयोग भी कर सकता है। अक्टूबर 2020 में यूएस पर्यावरण संरक्षण एजेंसी ने कहा था कि 2007 और उसके बाद के वाहन ई15 ईंधन (गैसोलिन में 15 प्रतिशत) इथेनॉल का उपयोग कर सकते हैं।

ई85, एक ऐसा ईंधन जिसमें 51 से 83 प्रतिशत तक इथेनॉल होता है, का उपयोग स्थान और मौसम के आधार पर होगा। इसे मुख्य रूप से मिडवेस्ट में बेचा जाता है और सिर्फ ईंधन-लचीले वाहन में ही इसका उपयोग किया जा सकता है। ब्राज़िल भी 25 प्रतिशत इथेनॉल के मिश्रण की अनिवार्यता पर गर्व करता है।

इसी नियम के कारण ब्राज़िल देश में होने वाली अत्यधिक गन्ने की फसल की उपयोग कर पा रहा है। यदि इस मामले में भारत को देखा जाए तो ऊपर से देखकर लगता है कि हम पिछड़ रहे हैं परंतु हाल में आई रिपोर्टें कि 7 प्रतिशत इथेनॉल वाला गैसोलिन हमारे पेट्रोल पंपों पर पहुँच रहा है, धीमी ही सही लेकिन एक अच्छी शुरुआत है।

दिसंबर से नवंबर तक के आपूर्ति वर्ष के शुरुआती चार महीनों को देखें तो लगभग 80 करोड़ लीटर इथेनॉल को वहन ईंधन से मिलाया गया है जो कि हमें 7 प्रतिशत के आँकड़े तक पहुँचाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रदूषण करने वाले और निर्यात से आने वाले ईंधन का भाग 93 प्रतिशत है।

इस दर पर भारत चलता रहा तो वर्ष के अंत तक गैसोलिन में इथेनॉल की मात्रा 8.5 प्रतिशत हो जाएगी और 2022 तक 10 प्रतिशत इथेनॉल के आँकड़े को भी छुआ जा सकता है। हालाँकि 2025 तक इथेनॉल की मात्रा 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य अति महत्वाकांक्षी लगता है।

चीनी मिलों और तेल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) के बीच सरकार ने समझौता करवाया था। अभी तक दोनों उद्योग बस समय आने पर ही एक-दूसरे को याद करते थे- जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दाम गिरते थे तो ओएमसी चीनी मिलों को अनदेखा करने लगतीं और जब चीनी तथा शराब के मूल्य बढ़ते तो चीनी मिल ओएमसी को अनदेखा कर देतीं।

सरकार दोनों को एक समझौते पर लेकर आई और उनकी प्रतिबद्धताएँ सुनिश्चित कीं ताकि वे जीवाश्म ईंधन में जैव ईंधन के उपयोग को बढ़ाने के महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय लक्ष्य को अनदेखा न करें। लेकिन इसमें सरकार को यूएस के अनुभव से कुछ सीखना चाहिए।

अत्यधिक पानी का उपयोग करने वाले गन्ने पर ही भारत को इथेनॉल के लिए आश्रित नहीं होना चाहिए। यूएस में मक्के का उपयोग करके जैव ईंधन बनाया जाता है क्योंकि वहाँ इसकी आपूर्ति माँग से अधिक है। ऐसे ही भारत के लिए भी हमें कुछ अनोखा सोचना होगा।

क्यों न हम कृषि कचरे और खाद्य तेल का रिसाइकल करके उपयोग करें, क्या पता हमें लाभकारी परिणाम देखने को मिलें। जत्रोफा के बीज भारत में उपयोग किए जाते हैं और उनमें 40 प्रतिशत तेल होता है जिसका उपयोग बिना किसी प्रसंस्करण के सीधे डीज़ल के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।

मुख्य बात है कि जंगली और अपने आप उग जाने वाले पौधों व अन्य कृषि एवं घरेलू कचरे का उपोग जैव ईंधन के लिए होना चाहिए, बजाय खाद्य सामग्री के रूप में उपयोग में आने वाले मक्के के। उत्तरी भारत में पराली जलाने की समस्या फैली हुई है।

किसान ऐसा इसलिए करते हैं ताकि अगली फसल के लिए भूमि को जल्दी तैयार कर सकें जिससे सरकारें परेशान हैं लेकिन यदि किसानों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे पराली बेचें और उससे इथेनॉल बनाया जाए तो पराली की समस्या से भी निपटा जा सकता है।

जीवाश्म ईंधन काफी प्रदूषण करते हैं जबकि जैव ईंधन के मिश्रण के साथ इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। गन्ने को इथेनॉल उत्पादन में लगाकर हम देश में डायाबिटिस की समस्या से भी निपट सकते हैं क्योंकि मीठी वस्तुएँ महंगी हो जाएँगी जिससे इनका उपयोग हतोत्साहित होगा।

कुछ देशों में चीनी कर का प्रयोग किया गया है और मोटापे में कमी देखने को मिली है। लेकिन यदि किसी चीज़ से लोगों को दूर करने के लिए कर का उपयोग किया जाए तो प्रायः असंतोष देखने को मिलता है जबकि कमी के कारण उच्च मूल्य से लोग उतना गुस्सा नहीं होते हैं।

अंततः इस समस्या का समाधान आधुनिक यानी कि इलेक्टिक कार है और इसलिए टेस्ला निवेशकों को भी उतनी ही पसंद है जितनी कार प्रेमियों को। लेकिन भारत की सड़कों पर इलेक्ट्रिक कार का राज चलने में कुछ दशक लग जाएँगे। जब तक कि भारतीय परिवर्तन के लिए तैयार होते हैं और बिजली उत्पादन में बढ़ोतरी होती है तब तक के लिए जैव ईंधन विकल्प है।