अर्थव्यवस्था
इंटरनेट को अंतरिक्ष से लोगों तक पहुँचाने में क्या होगी भारती एयरटेल की भूमिका

भू-संबंधी इंटरनेट, जिसे हम जनाते हैं और जिसका उपयोग करते हैं, वह बीते समय की बात जैसा है। पृथ्वी के हर इंच को सर्वव्यापी वैश्विक डाटा नेटवर्क सैंकड़ों या सहस्रों छोटे उपग्रहों के माध्यम से अंतरिक्ष से मिल सकता है।

एक निजी उद्यमी की पहल भारत को अवसर दे रही है जिससे अंतरिक्ष इंटरनेट के युग में छलाँग लगाकर पहुँचा जा सके। 18 दिसंबर को यूके आधारित संचार कंपनी वनवेब ने रूस के सोयूज़ प्रक्षेपण वाहन से एक साथ 36 संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण की घोषणा की।

इसके साथ ही अंतरिक्ष में कंपनी के उपग्रहों की संख्या 110 हो गई है- 648 उपग्रहों की योजना के पहले चरण में। वे पृथ्वी की सतह से 1,200 किलोमीटर ऊुपर होंगी (जीपीएस और भारत की नाविक जैसे जियोस्टेशनरी उपग्रहों की तुलना में 30 गुना अधिक निकट)।

वनवेब का उपग्रह प्रक्षेपण

वादा किया जा रहा है कि विश्व को एक ऐसी वैश्विक इंटरनेट सेवा दी जाएगी जो पहले संभव नहीं थी, इसमें कोई भाग अछूता नहीं रहेगा, न आर्कटिक, न अंटार्क्टिक, न मध्य भाग और डाटा दर लगभग हर जगह बराबर होगी।

वनवेब में दो उद्यमों की भागीदारी है- ब्रिटिश सरकार और भारती ग्लोबल जो कि भारत की सबसे बड़ी और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी मोबाइल सेवा प्रदाता एयरटेल को चलाने वाली कंपना भारती का भाग है। वनवेब में दोनों की भागीदारी लगभग 45-45 प्रतिशत है और कुछ सप्ताह पूर्व ही कंपनी को दिवालिया होने से बचाने के लिए 50 करोड़ डॉलर का प्रस्ताव दिया था।

नई राशि पाकर कंपनी अपनी योजनाओं पर आगे बढ़ रही है और हो सकता है अंतरिक्ष इंटरनेट सेवा देने वाली पहली कंपनी बन जाए। भारती उद्योग के अध्यक्ष सुनील भारती मित्तल, अब वनवेब के कार्यकारी अध्यक्ष हैं जो एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना में भारतीय कंपनी की भागीदारी बढ़ाता है।

आप सोचें कि मुख्य कंपनी यूके में आधारित है, उपग्रह यूएस बना रहा है जिनका प्रक्षेपण रूसी वाहन कर रहा है और भारतीय सह-भागीदार का दायित्व है कि सभी उत्पादों, सेवाओं और परिचालनों का निरीक्षण करे। साथ ही भारतीय भागीदार की भूमिका पर कहा गया-

दक्षिण एशिया और उप-सहाराई अफ्रीका में पहुँच होने के कारण भारती वनवेब की बड़ी सहायता करेगा जहाँ भौगोलिक स्थिति उपग्रह-आधारित संयोजकता की माँग करती है। ऐसे में वनवेब की सेवाओं के शुरुआती उपभोक्ता इन क्षेत्रों के हो सकते हैं।

एयरटेल की विश्व भर में पहुँच

भारत के लिए लाभ

अपेक्षा है कि वेबवन 2021 में अपनी सेवाएँ उत्तरी ध्रुव समेत उत्तरी गोलार्द्ध में शुरू करे। नेटवर्क से अधिक उपग्रहों के जुड़ जाने के कारण भारत को 2022 के मध्य तक हाई-स्पीड इंटरनेट मिल सकता है, मित्तल ने आश्वासन दिया।

लेकिन कुछ नियामक बाधा बन सकते हैं। यूके का दूसरा सह-भागीदार सरकारी है लेकिन भारती निजी कंपनी है और उसे आवश्यकता होगी इसरो जैसी एजेंसियों समेत भारत सरकार की अनुमति और सहयोग की ताकि उपभोक्ताओं तक पहुँचा जा सके।

फिर भी, उपग्रह आधारित इंटरनेट फाइबर केबल या मोबाइल वायरलेस की तुलना में सबसे महंगा होगा। इसका लाभ यह है कि देश के आंतरिक क्षेत्र जहाँ इंटरनेट की पहुँच नहीं है य़ा कमज़ोर है, यह उन्हें सेवा दे सकता है और आपातकाल परिस्थितियों में भी विश्वसनीय सेवा प्रदाता बन सकता है।

दूसरे विकल्प

अंतिम भूमिका निभाएँगे सैटेलाइट फोन और छोटे जियोस्टेशनरी उपग्रह (8-10) जो कि इरिडियम, ग्लोबलस्टार, इन्मारसैट आदि कंपनियों द्वारा संचालित हैं। ये उपग्रह वनवेब के उपग्रहों की तरह 1,200 किलोमीटर नहीं बल्कि पृथ्वी से 36,000 किलोमीटर ऊपर होते हैं व बड़े एंटीना की आवश्यकता पड़ती है।

सैटेलाइट एंटीना

इन्मारसैट का अर्थ स्टेशन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में गाज़ियाबाद में स्थित है और बीएसएनएल के साथ साझेदारी में यह आईसैटफोन तथा ग्लोबल सैटेलाइट फोन सर्विस (जीएसपीएस) उपलब्ध करवाता है जिसमें वॉइस कॉल व इंटरनेट सेवा मिलती है।

इन सेवाओं की लागत लगभग उतनी होती है जितनी अंतर्राष्ट्रीय कॉल की दर होगी किसी होटल से या एयरलाइन्स से जिसमें केबिन फोन की सुविधा होती है। वॉइस या डाटा के लिए ट्रैवल टाइम अधिक होने के कारण सैटेलाइट फोन सेवाएँ देरी का सामना करती हैं जैसे आवाज़ का देर से पहुँचना, आदि परेशानी।

वनवेब के प्रतिस्पर्धी अमेज़ॉन की परियोजना कुइपर और इलॉन मस्क के नेतृत्व वाले स्पेस-एक्स का स्टारलिंक हैं। इन्होंने लॉ-ऑर्बिट सैटेलाइट इंटरनेट परियोजनाओं की घोषणा तो कर दी है लेकिन अभी तक किसी प्रणाली को आगे नहीं बढ़ाया है।

वनवेब के पास अग्रणी होने का लाभ है और यूके व भारती मिलकर इसकी आर्थिक सहायता कर देंगे जिससे वह बाज़ार में उतरने वाली भी पहली कंपनी बन सके। लेकिन यह देखना शेष है कि क्या अंतरिक्ष इंटरनेट की तकनीक खुद का विस्तार ऐसे कर रपाएगी जिससे वह विश्व के अछूते क्षेत्रों को जोड़ सके और सर्वव्यापी इंटरनेट सेवा प्रदान कर सके।

भारत सरकार के लिए यह एक अवसर है वैश्विक मंच पर तकनीक के क्षेत्र में नेतृत्व करने का। निर्णय इसके हाथ में है कि भारत आधारित निजी कंपनी का भावी तकनीक में सहयोग करके यह विश्व को एक उपयोगी संदेश देना चाहता है या इस प्रगति को सिर्फ तकनीकी-वाणिज्य दृष्टि से देखना है।