अर्थव्यवस्था / भारती
टाटा-एयरटेल का 5जी तकनीक के लिए गठबंधन आत्मनिर्भरता के लिए आवश्यक

भारत के दूसरे सबसे बड़े दूरसंचार नेटवर्क भारती एयरटेल और टाटा समूह के बीच एक रणनीतिक साझेदारी की घोषणा हुई है जिसके तहत वे स्वदेशी रूप से विकसित 5जी नेटवर्क समाधानों को जनवरी 2022 से लागू करेंगे। ‘आत्मनिर्भरता’ के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है।

बयान में कहा गया कि टाटा समूह ने एक आधुनिकतम ओ-रैन आधारित दूरसंचार स्टैक (ढेर) विकसित किया है और एयरटेल के साथ साझेदारी में टाटा कन्सल्टेन्सी सर्विसेज़ की वैश्विक प्रणालियों के एकीकरण की विशेषज्ञता का समर्थन मिलेगा।

यह तकनीक समाधान अगले वर्ष के प्रारंभ में व्यावसायिक रूप से तैनात किए जाने के लिए तैयार होगा। ओ-रैन का अर्थ होता है ओपन रेडियो ऐक्सेस नेटवर्क जो मुक्त वास्तुशिल्प पर आधारित एक गठबंधन होता है। इसके माध्यम से कई स्थानीय रूप से विकसित प्रणालियों का अंतर-संचालन किया जा सकता है।

2018 में ओ-रैन का आरंभ कई वैश्विक दूरसंचार नेटवर्कों के गठबंधन के रूप में हुआ था जिसमें एटी एंड टी, ड्यूश टेलीकॉम, चाइना मोबाइल, एनटीटी डोकोमो और ऑरेंज जैसी कंपनियाँ भागीदार थीं। तबसे इसका विस्तार हुआ है और कई अन्य वैश्विक नेटवर्क संचालक इससे जुड़ गए हैं।

5जी के लिए एयरटेल-टाटा का गठबंधन सराहनीय क्यों है इसका उत्तर सरल है- जब तक भारतीय उच्च तकनीकी या शोध एवं विकास आधारित कंपनियाँ अपनी तकनीक और जीविका के लिए विदेशी कंपनियों पर आश्रित रहेंगी, तब तक हम किसी भी बौद्धिक संपदा (आईपी) को भारतीय नहीं रख पाएँगे।

भले ही विदेशी हितधारकों के बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) में भारतीय कंपनी को थोड़ा-सा अंश मिल जाए। दूरसंचार क्षेत्र में देखें तो रिलायंस जियो में इंटेल, क्वालकॉम, फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों का निवेश है लेकिन जियो का भविष्य अंबानियों के हाथ में ही है।

जियो ने अपनी 5जी तकनीक भी विकसित की है, हालाँकि इसका पूर्ण परीक्षण होना अभी शेष है। वहीं, दूसरी ओर भारती एयरटेल अपने दूरसंचार नेटवर्क और संबंधित सॉफ्टवेयर के रख-रखाव के लिए विदेशी स्वामित्व और विदेशी तकनीक साझेदारों पर काफी निर्भर था।

लेकिन अब आशा है कि परिस्थिति बदलेगी। दूरसंचार क्षेत्र में भारती-टाटा का गठबंधन एक अच्छी प्रतिस्पर्धा के लिए आवश्यक है। भारतीय कंपनियों को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। जब वे किसी तकनीक को अकेले विकसित या उसका खर्च न उठा पाएँ तो उन्हें भारतीय उद्यमियों के साथ औपचारिक साझेदारी पर विचार करना चाहिए।

यह बात सिर्फ दूरसंचार नहीं, बल्कि मंच सॉफ्टवेयर, आईटी प्रणालियों, दवा आईपी, नई दवाओं के शोध, नए वाहन मंच, रक्षा उपकरण विनिर्माण, आदि पर भी लागू होती है। जब इनका विकास विदेशी स्वामित्व वाले आईपी से किया जाता है जो भारत से बाहर रहते हैं, तब हम उन्हें लगातार रोयल्टी का भुगतान करते रहते हैं।

साथ ही, भारत में विकसित वस्तुओं पर स्वामित्व अधिकार भी नहीं जता पाते हैं। वहीं, दूसरी ओर देखें कि जापानी किस तरह से साझेदारी करते हैं, जब वे स्वयं पूरी परियोजना कर पाने में असमर्थ होते हैं। जब टोयोटा को लगा कि वह भारत में अकेले सफलता नहीं प्राप्त कर पाएगी, तब उसने सुज़ुकी के साथ साझेदारी की, जो कि एक जापानी कंपनी है।

लेकिन सभी भारतीय वाहन कंपनियों ने जापानी साझेदारों को ही चुना जब बाज़ार 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक के आरंभ में खुला था। सभी भारतीय-जापनी साझेदारियों टूट गईं जिसमें दोनों कंपनियाँ अलग-अलग राह चली गईं।

ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इन कंपनियों ने दीर्घ अवधि में आईपी पर स्वामित्व की बजाय लघु अवधि में लाभ को प्राथमिकता दी। अब जब टीवीएस से सुज़ुकी अलग हो गई है, हीरो हॉन्डा से हॉन्डा अलग और बजाज से कावासाकी के अलग होने के बाद ही हम देख रहे हैं कि वास्तविक भारतीय आईपी उत्पाद बनाए जा रहे हैं।

अब कई भारतीय कंपनियों की विदेशी तकनीकी कंपनियों में भागीदारी भी है जैसे जेएलआर में टाटा मोटर और केटीएम में बजाज ऑटो की। ईशर ने रॉयल एनफील्ड को खरीदकर इसी ब्रिटिश ब्रांड को भारतीय स्वामित्व वाला बना दिया। अब यह अपनी तकनीक विकसित कर रहा है या वैश्विक बाज़ार में तकनीक खरीद रहा है।

ईशर के प्रबंध निदेशक सिद्धार्थ लाल

लेकिन मुख्य बात यह है कि यदि हम वाहन विकास में अग्रणी होना चाहते हैं और सिर्फ बाज़ार में भारतीय भागीदारी बनाने के लिए अनुसरण नहीं करना चाहते तो हमें आपस में समन्वय करना सीखना होगा। सिर्फ वाहन नहीं, बल्कि दवा शोध में भी यह लागू होता है जहाँ हमने एक भी नई रसायन इकाई नहीं बनई है जिससे अरबों डॉलर में रॉयल्टी मिल सकती है।

इसकी बजाय, हमने उन दवाओं की उत्क्रम अभियांत्रिकी (रीवर्स इंजीनियरिंग) पर ध्यान दिया है जो पेटेंट-मुक्त होने वाली होती हैं या जैविक-समानताएँ, आदि बनाई हैं। इसमें कुछ गलत नहीं है लेकिन इस तरह से चलकर हम अधिक आगे नहीं बढ़ सकते हैं।

अरबों डॉलर का राजस्व देने वाला रसायन बनाने के लिए सरकारी सहयोग के साथ बड़ी दवा कंपनियों में गठबंधन की आवश्यकता होगी। यही बात भारत की सॉफ्टवेयर सेवा कंपनियों पर भी लागू होती है जिन्होंने मानवबल सेवाओं और सहयोग कार्यों में तो डंका बजाया लेकिन बड़े मंच और उत्पाद नहीं बना पाए जिससे विकास लागत के बाद भारी राजस्व मिले।

यदि हमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीकों पर विजय पानी है तो हमें समन्वय करना सीखना होगा, निस्संदेह, सरकारी सहयोग भी आवश्यक होगा। आत्मनिर्भरता की राह सिर्फ उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) से नहीं, बल्कि भारतीय कंपनियों के निवेश पर आधारित स्थानीय आईपी स्वामित्व पर निवेश से भी होकर गुज़रती है।

जब कोई भारतीय कंपनी इसे अकेले नहीं कर सकती तो उसे ऐसी संरचना बनाना सीखना चाहिए जहाँ अन्य भारतीय कंपनियाँ भागीदार बन पाएँ ताकि कुल मिलाकर आईपी भारतीय रहे। अपेक्षा है कि टाटा और एयरटेल ने यह नया प्रचलन शुरू कर दिया है जहाँ भारत के हित में भारतीय भारतीय के साथ मिलकर काम करें।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।