अर्थव्यवस्था
सौर ऊर्जा का युग: स्वच्छ भारत के बाद अब भारत को एक स्वच्छ ऊर्जा अभियान की आवश्यकता

प्रसंग
  • मई 2014 में भारत की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता महज 2,650 मेगावॉट थी। भारत सरकार 2022 तक 1,00,000 मेगावॉट का लक्ष्य रख रही है

बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु पैटर्न में परिवर्तन के विरुद्ध लड़ाई में देशों को अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों प्रकार के समाधानों पर विचार करना होगा। परमाणु ऊर्जा, विस्तृत अनुसंधान और विकास एवं कोयले से संचालित उद्योगों से धीरे-धीरे बाहर निकलना दीर्घकालिक समाधानों के लिए आदर्श विकल्प हैं। हालांकि, अल्पकालिक समाधानों के लिए अक्षय (रिन्यूवेबल) ऊर्जा में निवेश की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जलवायु परिवर्तन पर अपनी चिंताओं के बारे में मुखर रहे हैं। मई 2014 में भारत की सौर उत्पादन क्षमता (एसजीसी) केवल 2,650 मेगावाट थी। चार वर्षों के बाद इस क्षमता का कुल योग है 21,000 मेगावॉट। 2015-16 में सौर ऊर्जा उत्पादन में 100 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गयी थी। जनवरी 2018 तक भारत ने अपने 20,000 मेगावॉट के लक्ष्य को निर्धारित समय से चार वर्ष पहले ही हासिल कर लिया है। जुलाई 2018 तक सौर उत्पादन क्षमता 23,000 मेगावॉट से अधिक है। 2022 तक के लिए भारत सरकार 1,00,000 मेगावॉट का लक्ष्य निर्धारित कर रही है।

2017 के अंत में भारत की सौर उत्पादन क्षमता 18,000 मेगावॉट से थोड़ा अधिक थी जो कि 19,700 मेगावॉट के साथ इटली, 42,000 मेगावॉट के साथ जर्मनी, 49,000 मेगावॉट के साथ जापान, 51,000 मेगावॉट के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और 1,31,000 मेगावॉट के साथ चीन से पीछे है। अकेले भारत के लिए, कोयले की तुलना में सौर बिजली की औसत कीमत 18 प्रतिशत गिर गई है।

भारत का भूगोल भारत को सौर ऊर्जा के लिए आदर्श बनाता है। सूर्य के प्रकाश के 300 से अधिक दिनों के साथ देश के लिए सौर ऊर्जा पर विचार करने के लिए पर्याप्त कारण हैं। साथ ही, 8 प्रतिशत से अधिक सकल घरेलू उत्पाद का लक्ष्य रखने वाले देश के लिए तेल और कोयले के आयात पर बहुत अधिक निर्भर हुए बिना एक निरंतर विद्युत आपूर्ति अनिवार्य है।

उत्तरी क्षेत्र में राजस्थान ने अक्टूबर 2017 के अंत में 2,250 मेगावॉट के साथ उच्चतम सौर ऊर्जा क्षमता दर्ज की थी। इसी अवधि के लिए, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में क्रमशः 876 मेगावॉट, 510 मेगावॉट और 250 मेगावाट की क्षमता दर्ज की गई। एक अनुकूल वातावरण की सहायता से राज्य अब अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं।

यदि आंकड़ों को देखा जाये तो राजस्थान की 2,250 मेगावॉट की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्विट्ज़रलैंड (1,900 मेगावॉट), चिली (1,800 मेगावॉट), दक्षिण अफ्रीका (1,800) से अधिक है और ऑस्ट्रिया (1,250 मेगावॉट) तथा इज़राइल (1,100 मेगावॉट) से लगभग दोगुनी है।

पश्चिमी क्षेत्र में, गुजरात और मध्य प्रदेश ने एक अनुकूल वातावरण की सहायता से 1,290 मेगावॉट और 1,140 मेगावॉट की सौर ऊर्जा क्षमता दर्ज कराई है, वहीं महाराष्ट्र ने 515 मेगावॉट के आंकड़े को छुआ है। 2017 में, मार्च और अक्टूबर के बीच मध्य प्रदेश में सौर ऊर्जा क्षमता में 50 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी।

हालांकि सौर ऊर्जा के संबंध में दक्षिणी क्षेत्र अन्य राज्यों पर भारी है। अकेले तेलंगाना के पास 2,570 मेगावॉट की क्षमता है, इसके बाद अगला स्थान 2,140 मेगावॉट के साथ आंध्रप्रदेश, 1,710 मेगावॉट के साथ तमिलनाडु और 1,500 मेगावॉट के साथ कर्नाटक का है। अकेले 2017 में ही, इन चारों राज्यों के पास ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और स्पेन की तुलना में अधिक क्षमता थी।

भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सूरज की रोशनी की कमी को देखते हुए सौर क्षमता यहाँ कम रहती है, जिसमें 12 मेगावॉट के साथ असम सबसे आगे है और मेघालय में यह क्षमता मात्र 0.06 मेगावॉट है।

आंकड़े अक्टूबर 2017 से जून 2018 तक और वृद्धि को दर्शाते हैं। भारत का अग्रणी सौर राज्य कर्नाटक स्थापित (इन्स्टाल्ड) सौर क्षमता के संदर्भ में 5,000 मेगावॉट से अधिक की क्षमता तक पहुँच रहा है। जून 2018 के अंत तक राजस्थान की क्षमता 2,290 मेगावॉट तक बढ़ी है।

आजादी के सात दशक बाद भी बिजली कटौती से ग्रस्त राष्ट्र के लिए अक्षय ऊर्जा एक आदर्श समाधान प्रदान करती है। 2012 के अंत तक, 46,00,000 से अधिक सौर लालटेनें और 10,00,000 सौर ऊर्जा वाली घरेलू लाइटें लगाई गई थीं। 2022 तक, सरकार ने 40 प्रतिशत सब्सिडी की पेशकश करते हुए 20 मिलियन सोलर लाइटें बेचने का लक्ष्य रखा है।

भारत बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा स्थापित करने का इरादा रखता है। भारत की क्षमता का मूल्यांकन करने के लिए पहले से ही 60 से अधिक सौर विकिरण संसाधन मूल्यांकन स्टेशन स्थापित किए गए हैं। 2022 तक 1,00,000 मेगावॉट के सरकार के लक्ष्य को देखते हुए पूरे वर्ष के दौरान निरंतर सूर्य के प्रकाश से भरपूर रहने वाले क्षेत्रों से ऊर्जा का उपयोग करना लाभकारी होगा। इसलिए, इनमें से अधिकतर स्टेशन राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु एवं कर्नाटक के कुछ हिस्सों में स्थापित किए गए हैं।

हालांकि, सौर ऊर्जा की कहानी संख्याओं से परे है। 1,00,000 मेगावाट की सौर उत्पादन क्षमता के प्रयास में भारत कई चुनौतियों का सामना करेगा। सबसे पहले, भारत की कमजोर विद्युत ग्रिड, वितरण घाटे और मौद्रिक भार संचालक अपने आप को दबाव में पाते हैं। दूसरा, सौर ऊर्जा का उपयोग करने के लिए भारत को ऊर्जा के कुशल भंडारण की दिशा में भारी निवेश करना चाहिए। हालांकि बैटरियों पर शोध ने भंडारण की लागत घटाई है, परिवहन व्यवहार्यता बढ़ाई है और इनके कार्यकाल को बढ़ाया है लेकिन फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर सौर ऊर्जा के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

जलवायु परिवर्तन के विषय पर दुनिया आज एक निर्णायक मोड़ पर है। जबकि विकसित और विकासशील देश बहस जारी रख सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किसे ज्यादा प्रयास करने चाहिए और किस सरकार को जीवाश्म ईंधन का उपयोग जारी रखने का अधिकार है वगैरह वगैरह, लेकिन परिणाम तबाही मचाने से पहले किसी भी अर्थव्यवस्था का आकार नहीं देखते। इस प्रकार, फर्क नहीं पड़ता कि ग्लोबल वार्मिंग की शुरुआत कहाँ से हुई, यह भारत जैसे देशों की बेहतरी के लिए है कि वे सौर ऊर्जा जैसी अक्षय ऊर्जाओं में निवेश करें।

तो, भारत चुनौतियों से कैसे निपटे? सबसे पहले, अधिकारियों को ग्रिड से परे देखना चाहिए। एक लंबी अवधि के लिए, ग्रामीण भारत को ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए कोयला एक बहाना नहीं हो सकता है। इसके बजाय, न्यूनतम नुकसान और अधिकतम लाभ सुनिश्चित करने के लिए विकसित स्थानीयकृत ग्रिड के लिए शोध होना चाहिए। यदि सौर ऊर्जा में सस्ते विकल्पों के साथ ग्रामीण भारत में 400 मिलियन लोगों की मदद की जा सकती है तो उनके पास ऊर्जा की जरूरतों के लिए मिट्टी का तेल, कोयले और यहां तक कि लकड़ी के उपयोग को त्यागने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन होगा।

दूसरा, शहरी क्षेत्रों के लोगों को इस आंदोलन का सक्रिय प्रतिभागी बनाया जाना चाहिए। यह देखते हुए कि कैसे आवासीय संस्थाएं और निगम बेंगलुरू, पुणे, चंडीगढ़, नोएडा, गुड़गांव और मुंबई जैसे शहरों में आवासीय क्षेत्रों का केंद्र बनाते हैं, राज्य सरकारों को उन्हें सौर ऊर्जा के विकल्पों पर अमल करने के लिए मनाना चाहिए। हजार परिवारों से अधिक का आवास प्रबंधन करने वाले इनमें से कुछ निजी समूहों के साथ कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा जा सकता है।

यदि सरकार नागरिकों को साधने में कठिनाई का सामना करती है तो सरकारी कर्मचारियों और सिविल सेवकों के आवासों वाले रिहायशी क्षेत्रों और सरकारी भवनों से शुरुआत का विकल्प कैसा है? एक ऐसे देश के लिए जो अभी भी बिजली पैदा करने के पारंपरिक साधनों से परे नहीं जा पा रहा, वहाँ शायद सरकार को उदाहरण पेश करने के लिए कुछ बड़ा करना पड़ेगा। स्वच्छ भारत के बाद शायद यह स्वच्छ ऊर्जा का समय है।

जब बात अक्षय ऊर्जा की हो तब चीन का नाम हमेशा ही जेहन में आता है। यह देखते हुए कि यह देश रिन्यूवेबल्स के आधार पर एक आयात-निर्यात संचालित अर्थव्यवस्था का पुनःनिर्माण करने की कोशिश कर रहा है, इसने सौर उद्योग को अत्यधिक सब्सिडी दी है। इस प्रकार, स्थानीय निर्माताओं को परेशानी में छोड़ते हुए, वहाँ सोलर सेलों, पैनलों, बैटरियों और अन्य आवश्यक घटकों का अतिरिक्त उत्पादन होता है।

भारत इस समस्या से दो तरीकों से निपट सकता है। पहला, यह अमेरिका जैसे कठोर टैरिफ लगाए या दूसरा, यह शोध में बड़ा निवेश करे और भारतीय बाजार से चीनी सौर उत्पादों को धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से हटाये। जबकि अनुसंधान और विकास के परिणाम प्राप्त होने में कुछ वर्षों का समय लग सकता है, वहीं सौर क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा के भारत के ध्येय में घरेलू मोर्चे पर नवाचार की कमी के कारण अड़चन नहीं आनी चाहिए।

कृषि से लेकर ग्रामीण भारत के विद्युतीकरण तक और बिजली कटौती से तंग शहरों से लेकर एक स्वच्छ ऊर्जा वाले भारत की ओर कदम बढ़ाते हुए भारत के लिए जलवायु परिवर्तन के एक अल्पकालिक समाधान के रूप में सौर ऊर्जा को अमल में लाने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन हैं। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के लिए नींव पहले ही एक आदर्श शुरुआत दे चुकी है। हालांकि, भारत को दीर्घकालिक समाधानों के लिए परमाणु विकल्प की खोज के साथ-साथ 2020 तक सभी अक्षय और स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों में बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। 2020 के अंत तक सवाल 1.4 अरब लोगों तक बिजली पहुंचाने का नहीं होना चाहिए, बल्कि स्वच्छ बिजली पहुंचाने का होना चाहिए।

सौर ऊर्जा के युग में भारत को संख्याओं से ज्यादा एक ऊर्जा परिवर्तन की ओर ध्यान देना चाहिए जो कि संख्याओं में मापे जाने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। 100 गीगावॉट सौर ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य के साथ 1000 मिलियन परिवारों को रोशन करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करने पर ध्यान होना चाहिए – जो कि एक उत्सव योग्य उपलब्धि होगी।

तुषार गुप्ता स्वराज में एक वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वह @tushjain15 पर ट्वीट करते हैं।