अर्थव्यवस्था
अर्थव्यवस्था के 50 खरब डॉलर पर पहुँचने की राह और रोजगार के क्षेत्र की संभावनाएँ

विशेष मान्यता रखने वाले अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि कोविड वैश्विक महामारी के कारण निकट भविष्य में भारत 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य पूरा नहीं कर पाएगा। वे गलत हैं, आँकड़ों से समझें।

केंद्रीय बजट 2021-22 के अनुसार के सांकेतिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 31 मार्च 2021 तक 195 लाख करोड़ रुपये का होगा। बजट का अनुमान है कि वित्तीय वर्ष 2021-22 में सांकेतिक जीडीपी (वास्तविक+मुद्रास्फीति) में 14.4 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

बजट दस्तावेज़ के अनुसार इस हिसाब से 31 मार्च 2022 तक भारत का जीडीपी 223 लाख करोड़ रुपये होगा। यहाँ तक सब सही है। अब मान लें कि 1 अप्रैल 2022 से 31 मार्च 2028 तक इस छह वर्ष की अवधि में औसत रूप से प्रति वर्ष वास्तविक जीडीपी में 7 प्रतिशत की वृद्धि होगी। प्रति वर्ष औसत रूप से 5 प्रतिशत की मुद्रास्फीति जोड़ लीजिए।

इस प्रकार 2022 से 2028 के बीच सांकेतिक जीडीपी, अनुदार अनुमान के साथ, 12 प्रतिशत के औसत पर प्रति वर्ष बढ़ेगी। ऐसे में 31 मार्च 2022 तक जो 223 लाख करोड़ रुपये की जीडीपी का अनुमान है, वह वार्षिक चक्रवृद्धि गणना के अनुसार छह वर्षों में दोगुना होकर 450 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा।

अब रुपये-डॉलर की विनिमय दर पर ध्यान दें। ऐतिहासिक रूप से रुपये का मूल्य डॉलर की तुलना में प्रति वर्ष 3 प्रतिशत घटा है। छह वर्षों के लिए इसकी चक्रवृद्धि गणना का आँकड़ा 20 प्रतिशत हो जाता है। यानी आज 1 डॉलर के सामने मूल्य जो 73 रुपये का है, वह मार्च 2028 में 90 रुपये का हो जाएगा।

2027-28 में 450 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित जीडीपी को हम डॉलर में रूपांतरित करें तो 50 खरब डॉलर की जीडीपी के लक्ष्य पर पहुँच जाते हैं। लेकिन इसमें तीन चेतावनियाँ हैं-

पहला, भारतीय रुपये और डॉलर की विनिमय दर का अनुमान लगाना कठिन है लेकिन भारत में जिस तरह से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) की बाढ़ आ रही है, वह अपेक्षा से बेहतर विदेशी विनिमय दर के भविष्य के अनुमान पर ज़ोर देता है।

दूसरा, वास्तविक जीडीपी की वार्षिक वृद्धि दर को यदि हम औसत रूप से 7 प्रतिशत रखना चाहते हैं तो सरकार को संरचनात्मक सुधारों के प्रयास दोगुने करने होंगे। यदि नौकरशाही द्वारा नाकाम किए जाने के प्रयास (जैसा 2018 में एयर इंडिया के साथ हुआ था) के बिना निजीकरण हो सके तो वह वृद्धि का एक बड़ा कारक बनेगा।

तीसरा, उत्पादन संबंधित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना जैसे छोटे सुधारों में सामर्थ्य है कि वे वैश्विक उत्पादन को भारत में स्थानांतरिक कर सकें। यह योजना भारत को मोबाइल फोन, कार, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी हार्डवेयर और दवाओं के निर्यातक के रूप में उभार सकती है क्योंकि विदेशी कंपनियाँ विश्व के लिए भारत में विनिर्माण करके 4-6 प्रतिशत का पीएलआई लाभ लेना चाहेंगी।

नकारात्मक सोचने वाले अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि प्रमुख क्षेत्रों में कोई वृद्धि नहीं है और रोजगार के अवसर उत्पन्न नहीं हो रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि एक महामारी से उभरते हुए अर्थव्यवस्था ने काफी अच्छी वापसी की है। अक्टूबर-दिसंबर 2020 की तिमाही में कॉर्पोरेट लाभों ने भी काफी अच्छी वापसी की है।

यूनिलीवर के वैश्विक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ऐलन जोप भारत की वृद्धि संभावनाओं पर कहते हैं, “(हमारा) 84 प्रतिशत भारतीय व्यापारी परिमाण में बढ़ा है और वृद्धि के लिए वहाँ अच्छा अवसर है।”

वैश्विक बिक्री में 18 प्रतिशत की भागीदरी के साथ यूनाइटेड स्टेट्स यूनिलीवर के लिए सबसे बड़ा बाज़ार है जिसके बाद दूसरे स्थान पर भारत है। यूनिलीवर की 10 प्रतिशत वैश्विक बिक्री भारत में होती है जो कि चीन के 6 प्रतिशत से अधिक है।

कई बार भारत सरकार ही प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है- पूर्वव्यापी कर विधान से लेकर प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को लागू करने और जीएसटी को दो दरों में बाँटकर सरल बनाने जैसे प्रस्ताव को न मानना।

लगता है कि अंततः केंद्र को समझ आ गया है कि इसे व्यापार के मार्ग से हट जाना चाहिए और अपने काम यानी शासन चलाने पर ध्यान देना चाहिए। भारत के 300 से भी अधिक सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (पीएसयू) और बैंकों (पीएसबी) के निजीकरण का निर्णय दर्शाता है कि सरकार में आर्थिक समझदारी आ गई है।

अगले कुछ वर्षों में भारत की विकास यात्रा में बुरा क्या हो सकता है? प्रमुख चिंता राजनीतिक है। अगले तीन वर्षों में कई प्रमुख चुनाव होने हैं जिसे देखते हुए कुछ प्रेरित विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं जो वृद्धि में बाधा बनेंगे।

विशेषकर, मार्च-अप्रैल 2021 में होने वाले पश्चिम बंगाल और असम के विधान सभा चुनाव महत्त्वपूर्ण हैं। वे इनके बाद होने वाले 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव की लय तय करेंगे जो कि 2024 के लोक सभा चुनाव का अग्रगामी है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी प्रायः ‘सूट-बूट की सरकार’ का तंज कसते हैं जिससे मुक्ति पाने में नरेंद्र मोदी सरकार को छह वर्ष लग गए हैं। गांधी की गरीब-उन्मुखी अर्थनीति को सर्वश्रेष्ठ उत्तर होगा निजीकरण। सुधारों को अब गति देनी होगी। 2000 में जन्मी एक नई पीढ़ी अब रोजगार योग्य हो रही है और अपने लिए पहली नौकरी तलाशने लगी है।

20-30 की आयु श्रेणी वाले स्टार्ट-अप उद्यमी एक नई ऊर्जा दर्शाते हैं जो ‘कर सकते हैं’ के भाव से भरी है, 60-70 की आयु वाले वृद्ध अर्थशास्त्रियों की तरह ‘नहीं हो सकता है’ का भाव उनमें नहीं होता है। फोनपे जैसे स्टार्ट-अप में काम कर रहे सहस्रों कर्मचारियों को ईसॉप मिल रहा है जो उन्हें रातों-रात लखपति बना रहा है। उपभोग में उछाल आने ही वाला है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) के सीईओ और एमडी महेश व्यास की तरह व्यावसायिक निराशावादी लगातार शहरी भारत में नौकरियाँ जाने का दुखद समाचार सुनाते रहते हैं और अनिच्छा से स्वीकार करते हैं कि ग्रामीण भारत में इसके उलट हो रहा है।

रोजगार की प्रकृति परिवर्तित हो रही है, आंशिक रूप से महामारी के कारण और आंशिक नई तकनीक के कारण। नौकरी के बाज़ार में संतुलन आने के लिए थोड़ समय लगेगा। भारतीय कंपनियों में बड़ी इक्विटी धारक विदेशी निवेशक बिना किसी पूर्वाग्रह के शांति से भारत की ओर देख रहे हैं।

जो लोग बाज़ार से सीधे रूप से प्रभावित होते हैं, वे भारत के भविष्य में विश्वास प्रकट करते हैं। वहीं भारतीय टिप्पणीकार, जिनपर बाज़ार के उतार-चढ़ाव का कोई प्रत्यक्ष प्रबाव नहीं पड़ता, वे भारत के विनाश की भविष्यवाणियाँ करते हैं।

लेकिन बुद्धिमानी इसमें होगी कि इनमें से कुछ भविष्यवाणियों पर ध्यान दिया जाए। भारत की अर्थव्यवस्था ऐसी है कि चलती कार पर हैंडब्रेक लगाया गया हो। विनियामक, नौकरशाह और प्रदर्शनकारी, सभी ने अपना हाथ इस ब्रेक पर रखा हुआ है ताकि अर्थव्यवस्था आगे बढ़े लेकिन झटके खा-खाकर।

समय आ गया है कि इस ब्रेक से इन लोगों का हाथ हटाया जाए और एक्सिलरेटर पर पैर दबाया जाए ताकि भारत निश्चित रूप से निकट भविष्य में 2027-28 तक 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सके और यूनाइटेड स्टेट्स, चीन तथा जापान के बाद चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो जो जर्मनी, ब्रिटेन व फ्रांस से आगे हो।

मामला यहीं समाप्त नहीं हो जाता। 7 प्रतिशत की वार्षिक वास्तविक वृद्धि दर और 5 प्रतिशत की मुद्रास्फीति के अनुसार सांकेतिक जीडीपी दोगुनी होकर 2034 तक 10 खरब डॉलर की हो जाएगी। इसकेबाद सिर्फ यूएस और चीन भारत से बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ होंगे।

ऐसे में भारत तीन प्रमुख शक्तियों की कक्षा में आ जाएगा। बीच के वर्षों में मोदी सरकार और उसके उत्तराधिकारियों को सुनिश्चित करना चाहिए कि अर्थव्यवस्था में वृद्धि के साथ शासन की गुणवत्ता भी बढ़े।