अर्थव्यवस्था
ई-रुपी कैसे वाउचरों के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभांतरण प्रणाली में एक क्रांति लेकर आएगा

जन धन खातों, आधार और मोबाइल संयोजकता (जैम) की त्रिमूर्ति के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने सरकार द्वारा प्रायोजित सामाजिक कल्याण योजनाओं को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर दिया है। रिसाव को रोका गया, अनावश्यक बिचौलियों व प्रणालियों को हटाया गया जो इस तंत्र में न सिर्फ दीमक बन गए थे बल्कि कई स्थानों पर भ्रष्टाचार का मूल भी थे।

आज (2 अगस्त) को सरकार ने प्रत्यक्ष लाभांतरण (डीबीटी) की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए ई-रुपी की घोषणा की। डीबीटी के क्षेत्र में अब तक सरकार की उपलब्धि यह रही थी कि बिना रिसाव के सही लाभार्थियों तक कल्याण पहुँचाया जा सका था।

उदाहरण स्वरूप, 2020 के अप्रैल, मई और जून के महीनों में कोविड-19 राहत पैकेज के रूप में 20 करोड़ से अधिक महिला धारकों के प्रत्येक जन धन बैंक खाते में 500 रुपये की राशि पहुँचाई गई जिनका उपयोग वे आवश्यकता पड़ने पर जब चाहें, वैसे कर सकती हैं।

ई-रुपी के साथ सरकर न सिर्फ लाभार्थियों को लक्ष्य कर सकती है बल्कि किस उद्देश्य से लाभांतरण किया जा रहा है, इसे भी लक्ष्य कर सकती है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के साथ मिलकर अपने यूपीआई मंच पर भारत के राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने ई-रुपी को विकसित किया है।

ई-रुपी की कल्पना एक नकद-रहित और संपर्क-रहित ऑनलाइन भुगतान प्रणाली के रूप में की गई है जिसमें लाभार्थियों को क्यूआर कोड या एसएमएस आधारित ई-वाउचर दिया जाएगा। किसी कार्ड, इंटरनेट बैंकिग सेवा या इंटरनेट पर आधारित मोबाइल ऐप के बिना लाभार्थी इस वाउचर का उपयोग किसी सेवा के लिए तय सेवा प्रदाता के पास कर सकते हैं।

2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के प्रथम तीन महीनों में महिला लाभार्थियों को जो राशि दी गई थी, उसका उपयोग वे कैसे भी कर सकती थीं लेकिन ये ई-वाउचर केवल उन्हीं सेवाओं के लिए वैध होंगे जिनके लिए तय किया गया है। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य में अन्य सेवाओं को सरकार जोड़ सकती है।

सेवा देने के बाद सेवा प्रदाताओं को उसका भुगतान सुनिश्चित हो सकेगा और ये ई-वाउचर पूर्व-भुगतान आधारित हैं तो सेवा प्रदाताओं को भुगतान के लिए अधिक प्रतीक्षा भी नहीं करनी होगी। 13 जुलाई को एनपीसीआई ने यूपीआई मंच के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे जिसमें कहा था कि मोबाइल फोन धारकों को बिना किसी ऐप या बैंक खाते के ये ई-वाउचर जारी हो सकेंगे।

इन वाउचरों से एक बार में भुगतान किया जा सकेगा और ओटीपी के माध्यम से सत्यापन का तंत्र होगा। बैंकों के लिए भी ये ई-वाउचर ऊपरी लागतों में बचत करेंगे क्योंकि हर चिप लगे प्रीपेड कार्ड के लिए बैंक को 200 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उसके बाद अन्य परिचालन खर्चों के अलावा लाभार्थी को कार्ड भेजने का खर्चा भी बैंकों को उठाना पड़ता है।

चिप लगे कार्ड का प्रतिनिधि चित्र

एनपीसीआई ने यह भी कहा है कि कोर्पोरेट, राज्य सरकर, केंद्र सरकार या किसी भी बैंक के व्यापार उपभोक्ताओं के बदले बैंक ये प्रीपेड वाउचर जारी कर सकते हैं। इन ई-वाउचरों को थोक में जारी करना होगा और ये किसी भी मोबाइल फोन धारक को भेजे जा सकते हैं।

ऐसे में आवश्यक नहीं होगा कि लाभार्थी का उस या किसी भी बैंक में खाता हो या किसी मोबाइल नंबर से संबंधित यूपीआई आईडी हो। इस प्रकार भविष्य में भी कॉर्पोरेट इस भुगतान सुविधा का उपयोग अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व सेवा या अन्य परोपकारी कार्यों के लिए कर सकेंगे।

ई-रुपी का उपयोग कैसे-कैसे किया जा सकता है, उसकी सूची अंतहीन है। किसी भी तय सेवा के लिए किसी भी लाभार्थी को वाउचर दिया जा सकता है। उदाहरण स्वरूप, ऊर्वरक या बीज खरीदने के लिए किसानों को या पुस्तकें व अन्य विश्वविद्यालयी संसाधन खरीदने के लिए विद्यार्थियों को या किसी विशिष्ट सेवा जैसे रेस्तरां, स्वास्थ्य जाँच, आदि के लिए कर्मचारियों को।

हालाँकि, इसे सुचारु रूप से चलाने का परीक्षण सरकार प्रगतिशील कोविड-19 टीकाकरण अभियान में कर सकती है। निजी अस्पतालों के अलावा टीका हर जगह निःशुल्क है, ऐसे में कुछ राज्यों या जिलों में केंद्र लाभार्थियों को ई-रुपी जारी कर सकती है और इस प्रणाली की संभवानाओं व कमियों को देख सकती है।

इस वर्ष के आरंभ में राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन (एनडीएचएम) को लागू करने के लिए ई-वाउचर अवधारणा पर चर्चा हुई थी। हालाँकि इस नवीन समाधान से सरकार व निजी निगम क्या-क्या कर सकते हैं, उसका मात्र एक ट्रेलर होगा एनडीएचएम।

ई-रुपी व्यक्ति व उद्देश्य विशिष्ट डिजिटल भुगतान तंत्र है जो अलग-अलग आर्थिक वर्गों के लोगों को बेहतर पहुँच के साथ बेहतर सेवाएँ दे सकता है। एक ओर पश्चिमी देश चेक के माध्यम से लाभांतरण कर रहे हैं जिन्हें लाभार्थियों तक पहुँचने में कई दिन लग जाते हैं, वहीं 130 करोड़ लोगों वाले भारत के पास ऐसे डिजिटल समाधान हैं। वास्तव में, न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन।