संस्कृति
श्री दुर्गा सप्तशती में छुपे गूढ़ अर्थ और चरित्रों के नामों के प्रतीक

“अजी नाम में क्या रखा है?”, कुछ बड़े लोग कहते हैं। सनातनी संस्कृति के हिसाब से देखें तो ऐसा होता नहीं दिखता। यहाँ नाम के प्रकट और गूढ़, कई अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के रूप में श्री दुर्गा सप्तशती में कुछ ही नाम देख लेने पर यह स्पष्ट हो जाता है।

मार्कंडेय पुराण के एक भाग से निकले इस ग्रंथ के पहले ही अध्याय में आपको तीन पात्रों के नाम मिल जाएँगे। इनमें से पहले पात्र सुरथ नाम के एक राजा हैं, दूसरे समाधि नामक एक वैश्य (व्यापारी) और तीसरे मेधा नाम के एक ऋषि हैं।

इनमें से दो, सुरथ एवं समाधि, अपनी स्थिति से परेशान होकर वन में आ गए होते हैं। उनकी चिंता, मन का उद्वेग शांत नहीं हुआ था इसलिए वे मेधा ऋषि के पास जाते हैं। अगर सुरथ नाम को देखें तो शरीर की तुलना कई बार रथ से होती मिल जाएगी।

ऐसा माना जाता है कि मन अश्वों की भाँति इस शरीर रूपी रथ को इधर-उधर ले जाता है और बुद्धि (मेधा) एक कुशल सारथि की भाँति मन रूपी अश्वों पर नियंत्रण करके रथ का सही तरीके से संचालन करे, यह मनुष्य के धर्म-पथ पर रहने के लिए आवश्यक है।

आत्मानम् रथिनम् विद्धि, शरीरम् तु एव रथम्,
बुद्धिम् तु सारथिम् विद्धि, मनः च एव प्रग्रहम् ।
(कठोपनिषद्, अध्याय 1, वल्ली 3, मंत्र 3)

अर्थ- इस जीवात्मा को तुम रथी, रथ का स्वामी समझो, शरीर को उसका रथ, बुद्धि को सारथि, रथ हाँकने वाला, और मन को लगाम समझो ।

धर्म अंततः अर्थ अथवा काम के उपार्जन हेतु, उचित पथ पर ले जाए इसलिए राजा का नाम सुरथ, अर्थात अच्छे रथ वाला है। समाधि भी धर्म की प्रवृत्ति ही दर्शाता हुआ नाम है लेकिन समाधि की स्थिति में चार पुरुषार्थों में से काम और अर्थ को छोड़कर केवल धर्म और मोक्ष की और झुकाव स्पष्ट है।

यानी कि इन नामों से हमें शुरू में ही पता चल जाता है कि जब कथा के अंत में हम पहुँचेंगे, तो राजा सुरथ को राज्य-वैभव इत्यादि मिलेंगे और समाधि को मोक्ष! थोड़ा और आगे चलें तो जब भगवान् विष्णु निद्रा में होते हैं, उनके कान के मैल से दो राक्षस मधु-कैटभ जन्म लेते हैं।

इन दोनों राक्षसों का वध करने के ही कारण विष्णु ‘मधुसूदन’ और ‘कैटभजित्‌’ कहलाए। यहाँ अगर फिर से प्रतीकों की ओर ध्यान दें तो विष्णु निद्रा में हैं, अर्थात् उनका ध्यान नहीं है, तब इन राक्षसों का जन्म हुआ है।

कान के मैल से जन्म हुआ है तो कहा जा सकता है कि आपके कानों में जो बातें जा रही हैं, उनकी बात प्रतीकों में हो रही है। मधु से ऐसा लगता है कि सुनने में अच्छी बातें की जा रही होंगी, जिनसे अक्सर अहंकार का जन्म होता है। अहंकार वश गलतियाँ होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

कैटभ का नाम कटु जैसा सुनाई देता है। निंदा या नीचा दिखाए जाने से जो स्थिति होगी इसे उसका द्योतक कहा जा सकता है। आत्मविश्वास के न होने, निराशा की स्थिति में होने से जो होगा यह राक्षस कुछ वैसा ही है।

अगर महाभारत के अनुसार, दुखों के कारण देखें तो वहाँ भी अहंकार और आत्मविश्वास की कमी, दोनों ही दुखों के कारणों में से दिख जाते हैं। अगर अपनी क्षमता इत्यादि को आँके बिना, कौशल-बुद्धि न होने पर भी कोई कार्य करना आरंभ किया जाए तो उससे असफलता मिलेगी और दुःख होगा।

इसके विपरीत लगातार निंदा सुनता व्यक्ति, जिसमें कमियाँ निकाली जा रही हों, हताशा की स्थिति में होगा और वह भी असफल हो, ऐसा संभव है। जिस मानसिक स्थिति में राजा सुरथ और समाधी दोनों, ऋषि मेधा के पास जाते हैं, उसे अवसाद की सी स्थिति कहा जा सकता है।

हाल के कोविड काल से जुड़े लॉकडाउन, नौकरियों के जाने की चिंता, उद्वेग जैसी स्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य की चर्चाएँ भी होती रही हैं। हाल ही में यूनिसेफ की मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित रिपोर्ट भी जारी की गई है। इनके आलोक में सोचा जाए तो अवसाद, मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बुरी परिस्थिति है।

वापस श्री दुर्गा सप्तशती पर आएँ तो यह भी दिखता है कि ये दोनों राक्षस ब्रह्मा को मारने के प्रयास में थे। ब्रह्मा जन्म से वैसे ही जुड़े हैं, जैसे विष्णु पालन से। इसे प्रतीक मानें तो कहा जा सकता है कि अवसाद जैसी स्थितियाँ या मानसिक स्वास्थ्य का सही न होना, नई संभावनाओं को जन्म देने की क्षमता को रोकता है।

यह सृजन का ही अंत कर देने पर तुला होगा। भगवान् विष्णु का इनसे युद्ध को देखें तो वह लंबे समय तक चला युद्ध था। यह भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं में होता है। इनसे जीतना आसान नहीं है।

अंततः जब उनके ही अहंकार के प्रयोग से उत्पत्ति-विनाश के कारणों को पहचानकर प्रयास किया जाता है, तब मधु-कैटभ पर विजय प्राप्त होती है। सीधे-सीधे अध्यात्म, तंत्र या फिर धार्मिक दृष्टिकोण को छोड़कर अगर काफी नीचे के मनुष्यों के स्वास्थ्य के स्तर पर आएँ तो भी श्री दुर्गा सप्तशती के केवल पहले ही अध्याय से सीखने के लिए इतना कुछ है!

अंत में यह याद दिला देना भी आवश्यक है कि जो प्रतीक एक व्यक्ति को दिखे, वही आपको भी दिखें यह आवश्यक नहीं। जिसे आदिशंकराचारी विवर्तवाद की दृष्टि से देखते हैं, उसे ही श्री भास्कराचार्य की गुप्तवती जैसी टीका परिणामवाद की दृष्टि से देखती है। आपकी दृष्टि से क्या दिखता है यह आप स्वयं पढ़कर तय करें!