भारती
क्या सरकार वोडाफोन के बाहर निकलने की तैयारी में है? क्यों द्वयाधिकार बुरा विचार नहीं

उठते हुए धुएँ से प्रतीत होता है कि भारतीय दूरसंचार उद्योग निकट भविष्य में द्वयाधिकार की ओर बढ़ रहा है।

कुछ दिन पहले, संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने वोडाफोन-आइडिया पर आरोप लगाया है कि उसे व्यापार में बने रहने के जैसी रियायतों की ज़रूरत है, वह उसे भारत धौंस दिखकार प्राप्त करना चाह रहा है। यदि सरकार मौजूदा स्तर पर उद्योग में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अधिक उदार योजना बना रही होती तो उन्हें इतना कठोर होने की आवश्यकता नहीं थी।

निस्संदेह ही प्रसाद पिछले महीने वोडाफोन समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) निक रीड द्वारा समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद सरकार से अधिक राहत की मांग पर प्रतिक्रिया दे रहे थे।

एजीआर का मुकदमे में दूरसंचार कंपनियों की हार हुई और अब न्यायालय के निर्णय के अनुसार दूरसंचार कंपनियों को लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये का कर देने के लिए कहा गया है जिसमें बकाया राशि पर जुर्माना और ब्याज भी शामिल है और वोडाफोन-आइडिया के पास इस बकाए का काफी बड़ा हिस्सा है।

सरकार ने अब तक दूरसंचार उद्योग को 42,000 करोड़ रुपये के स्पेक्ट्रम शुल्क पर दो साल की मोहलत दी है, लेकिन इस मोहलत के समाप्त होने के बाद स्पेक्ट्रम शुल्क का भुगतान करना होगा।

वोडाफोन के सीईओ ने कहा था, “मैंने सरकार से कहा, यदि वे राहत पैकेज नहीं देते हैं तो हम जैसी स्थिति में हैं, ‘वहाँ क्या इसे भी चिंता का विषय बनना चाहिए?’, मैं वहाँ (यानी, भारत) गया और बहुत-बहुत स्पष्ट था कि हमने बीते वर्षों में देश में कई अरब डॉलर का निवेश किया है, लेकिन हम अब यहाँ (स्वीकार्य राहत के बिना) कोई और पूंजी नहीं डालेंगे।”

रीड के बयान को सहारा देते हुए उनके भारतीय साझेदार कुमार मंगलम बिड़ला ने हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में दर्शकों से कहा था कि कंपनी को बंद करना ही एकमात्र विकल्प था क्योंकि कंपनी को तीन महीनों में 40,000 करोड़ रुपये का भुगतान करने के लिए कहा गया था।

हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में कुमार मंगलन बिड़ला, साभार ट्विटर @tweetloveleen

मिंट  समाचार-पत्र ने बिड़ला के हवाले से लिखा, “अगर हमें राहत नहीं मिली तो हम दुकान बंद कर देंगे। क्योंकि दुनिया में ऐसी कोई कंपनी नहीं है जो तीन महीने में इस तरह का जुर्माना भर सके। यह इस तरह से काम नहीं करता है।”

लेकिन स्पष्ट रूप से सरकार इन धमकियों से प्रभावित नहीं हुई और प्रसाद ने स्पष्ट रूप से कहा, “मैं इस तरह के बयान की सराहना नहीं करता हूँ। किसी को भी हमारे लिए शर्तों को निर्धारित नहीं करना चाहिए। भारत एक संप्रभु देश है।”

कुछ और राहत भी उद्योगों को मिलने वाली है क्योंकि भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने अंतरसंयोजकता (इंटरकनेक्ट) उपयोग शुल्क (आईयूसी) कोसमाप्त करने के अपने निर्णय को एक साल के लिए स्थगित कर दिया है।

आईयूसी को जनवरी 2020 से समाप्त हो जाना चाहिए था लेकिन अब ऐसा नहीं होगा जो एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया को पर्याप्त नकदी प्रवाह बनाए रखने की अनुमति देगा। वर्तमान आईयूसी शुल्क 6 पैसे प्रति मिनट है जिसे कॉल प्राप्त करने वाले नेटवर्क को दिया जाता है।

आगे की राहत इस बात पर निर्भर करती है कि सर्वोच्च न्यायालय दूरसंचार कंपनियों के एजीआर बकाया को सरकार द्वारा आंशिक रूप से कम किए जाने की बात से सहमत है या नहीं और अगर न्यायालय को उचित लगता है तो ऐसा हो सकता है।

रीड और बिड़ला के बयानों के बाद आया प्रसाद का बयान संकेत करता है कि टेलीकॉम रियायतों पर सरकार का रुख थोड़ा सख्त हो सकता है। सवाल यह है कि क्या सरकार वोडाफोन-आइडिया के अधिक रियायत ना मिलने पर भारत छोड़ देने की धमकी वाले झाँसे में आएगी?

दो कारण हैं जिनसे वोडाफोन-आइडिया के भारत से बाहर निकलने (दिवालियापन मार्ग के लिए चयन करके) और भारत के द्वयाधिकार बनने से उस तरह का प्रलय ना हो जैसा पहली नज़र में दिख रहा है।

पहला, दूरसंचार एक प्राकृतिक एकाधिकार होता है, और विश्व के अधिकांश प्रमुख बाज़ारों में केवल दो या तीन बड़ी कंपनियाँ ही हैं। अमेरिका में एटी एंड टी और वेरिज़ोन 70 प्रतिशत से अधिक तार-रहित बाजार को नियंत्रित करती हैं, और दो कमज़ोर कंपनियाँ, टी मोबाइल और स्प्रिंट, विलय की संभावित भागीदार मानी जाती हैं। संक्षिप्त में, अमेरिका निकट भविष्य में तीन-कंपनियोंं वाले बाज़ार की ओर बढ़ सकता है।

दूसरा, भारत का परिदृश्य तब से बदल गया है जब से नरेंद्र मोदी सरकार ने रणनीतिक कारणों से एक बड़े राज्य क्षेत्र की कंपनी के पुनर्निर्माण और पुनर्जीवन के उद्देश्य से 56,000 करोड़ रुपये के निवेश का जोखिम उठाने का निर्णय लिया है।

भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) का विलय 92,000 से अधिक कर्मचारियों को बड़ी रकम के साथ सेवानिवृत्ति दिए जाने के बाद किया जाना है। विलय की गई इकाई को 4जी सेवाओं को प्रथम बार बाज़ार में उतारने के लिए स्पेक्ट्रम दिया जाएगा। यदि बीएसएनएल एक मज़बूत तीसरी कंपनी बन जाती है तो भारत के पास तीन बड़ी कंपनियाँ रहेंगी फिर भले ही वोडाफोन-आइडिया बाहर निकल जाएँ।

सरकार संभवतः बीएसएनएल में निवेश की लागतों की तुलना उद्योग को भारी स्पेक्ट्रम शुल्क रियायत देने से कर है। यदि बीएसएनएल को दी गई वित्तीय सहायता की लागत बहुत अधिक होगी तो सरकार निर्णय ले सकती है कि द्वयाधिकार ही ठीक है, जब तक कि बीएसएनएल उपभोक्ताओं को एक स्पष्ट विकल्प प्रदान नहीं करता है।

जैसा कि देखा जा सकता है, सितंबर के अंत तक 37.5 करोड़ तार-रहित ग्राहकों के साथ वोडाफोन-आइडिया, 35.5 करोड़ के साथ रिलायंस जियो और 32.5 करोड़ ग्राहकों के साथ एयरटेल, तीनों बड़े खिलाड़ी हैं, लेकिन वोडाफोन-आइडिया तीनों में सबसे कमज़ोर है।

इसके बाहर निकलने से वास्तव में एयरटेल और जियो को शुल्क बढ़ाने में आसानी होगी, जो तब अप्रत्यक्ष रूप से बीएसएनएल को अपने कर्मचारियों का भार कम करने और 4जी इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करने के बाद व्यवहार्य बने रहने में मदद करेगा।

एक मज़बूत निजी क्षेत्र का द्वयाधिकार वित्तीय वर्ष 2020-21 में 5जी नीलामी को और अधिक व्यावहारिक बना सकता है। हालाँकि नीलामी के लिए तय समय-सारिणी को औपचारिक रूप से इस वित्तीय वर्ष से अगले वर्ष में स्थानांतरित नहीं किया गया है।

ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारत तेज़ी से एक द्वयाधिकार के लिए बढ़ रहा है, बीएसएनएल एक्स कारक है जो इन कंपनियों को मनमानी करने से रोकेगी। ट्राई के पास वैसे भी गुटबंदी और शुल्क में आक्रामक बढ़ोतरी को रोकने के लिए नियामक शक्तियाँ मौजूद हैं।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।