भारती
शस्त्र निर्यातक के रूप में बढ़ेगी भारत की भूमिका, आर्मेनिया से हुआ रक्षा सौदा शुरुआत

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) ने इस हफ्ते शस्त्र-अस्त्र के वैश्विक हस्तांतरण रुझान-2019 रिपोर्ट जारी की है, जिसके अनुसार भारत अब भी दुनिया में हथियारों के दूसरे सबसे बड़े आयातक के स्थान पर बना हुआ है। गत 9 मार्च को जारी सिपरी के आँकड़ों के अनुसार सऊदी अरब इस सूची में सबसे ऊपर है। एक समय में चीन और भारत इस सूची में सबसे ऊपर रह चुके हैं। चीन ने इस दौरान अपने रक्षा उद्योग पर काफी बड़े स्तर पर निवेश किया है और अब वह पाँचवें नंबर का सबसे बड़ा शस्त्र निर्यातक देश है। 

इन आँकड़ों को गौर से पढ़ें तो पाएँगे कि भारत का आयात भी कम होता जा रहा है और निर्यात में वृद्धि हो रही है। विश्व के शीर्ष 25 निर्यातक देशों में भारत का नाम भी शामिल हो गया है। इनमें भारत का स्थान 23वाँ है।

इससे हालाँकि हमारी तस्वीर बड़े शस्त्र निर्यातक की नहीं बनती, पर आने वाले समय में देश के रक्षा उद्योग की तस्वीर ज़रूर उभरकर आती है। सिपरी के आँकड़े बता रहे हैं कि सन 2015 के बाद से भारतीय रक्षा आयात में 32 प्रतिशत की कमी आई है। इसका अर्थ है कि ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम को सफलता मिल रही है। 

औद्योगिक आधार 

भारत सरकार अब खुलकर शस्त्र निर्यात के क्षेत्र में उतरने का निश्चय कर चुकी है। इसके लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बदलाव भी किया गया है। हालाँकि हमारा रक्षा उद्योग अभी शैशवावस्था में है और शस्त्र निर्यात बहुत कम है, पर उसके निहितार्थ बड़े हैं और भारत सरकार अपेक्षाकृत खुलकर इसे स्वीकार कर रही है।

हाल में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने फिर कहा, “हमने सन 2025 तक देश में एयरोस्पेस, रक्षा-उपकरणों और सेवाओं के कारोबार को 26 अरब डॉलर के स्तर तक पहुँचाने का निश्चय कर रखा है। इसमें से 5 अरब डॉलर के शस्त्रास्त्र का हम निर्यात करेंगे। रक्षा उद्योग पर हम 10 अरब डॉलर के अतिरिक्त निवेश की व्यवस्था कर रहे हैं, जिससे 20 से 30 लाख लोगों को रोजगार भी मिलेगा।” इस कार्य के लिए देश के भीतर कई प्रकार के संरचनात्मक बदलाव किए जा रहे हैं। विशेषतः निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने और उन्नत विदेशी तकनीक को भारत लाने का प्रयास किया जा रहा है। 

वर्तमान समय में वैश्विक शस्त्र बाज़ार में विक्रेता के रूप में भारत की भागीदारी केवल 0.2 प्रतिशत की है। भारत ने म्यांमार, श्रीलंका और मॉरिशस को मुख्यतः हथियार बेचे हैं। अब वियतनाम और फिलीपींस के अलावा अफ्रीकी देशों के साथ कुछ बड़े सौदे संभव हैं। भारत सरकार अगले पाँच वर्षों में कुछ मित्र देशों को क्रेडिट लाइन बढ़ाने जा रही है। दूसरी सामग्री के मुकाबले हथियारों का सौदा सरल नहीं है। जिस देश को हथियार बेचे जाते हैं, उसके भारत के दूसरे मित्र देशों के साथ रिश्ते कैसे हैं, यह देखना भी ज़रूरी होता है। 

रक्षा अनुसंधान

हाल में रक्षा मंत्री ने बताया कि भारत 18 देशों को बुलेटप्रूफ जैकेटों की आपूर्ति कर रहा है। देश के रक्षा अनुसंधान संगठन ने बुलेटप्रूफ जैकेटों की बेहतर तकनीक विकसित की है। निजी क्षेत्र की 15 कंपनियों को इस कार्य के लिए लाइसेंस दिए गए हैं।

मोटे तौर पर डीआरडीओ ने कई प्रकार की तकनीकों के करीब 900 लाइसेंस निजी कंपनियों को दिए हैं। इस तकनीकी हस्तांतरण से ये कंपनियाँ स्वदेशी माँग को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात आदेशों को भी पूरा करेंगी। सरकार ने हाल में संसद को बताया कि भारत 42 देशों को रक्षा-उपकरणों की आपूर्ति कर रहा है। अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन और बोइंग जैसी कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए भारत में कारखाने लगा चुकी हैं। 

भारतीय रक्षा तकनीक के लिए विश्व बाज़ार खोजने की दिशा में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड मलेशिया, वियतनाम, इंडोनेशिया और श्रीलंका जैसे देशों में अपने लॉजिस्टिक बेस बनाने पर विचार कर रहा है। इसके पीछे मूलतः भारतीय हल्के लड़ाकू विमान तेजस के लिए विश्व बाजार में संभावनाएँ तलाश करने का विचार है। ये देश बुनियादी तौर पर रूसी रक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं और उनके पास उन उपकरणों के रख-रखाव (मेंटेनेंस) की उचित व्यवस्था नहीं है। 

भारतीय रक्षा-उपकरण

रख-रखाव अपने आप में एक महत्वपूर्ण कारोबार है, पर भारत की दिलचस्पी तेजस, अटैक हेलिकॉप्टर रुद्र और एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर ध्रुव के लिए दक्षिण पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में बाज़ार की तलाश करना है। हमारी ब्रह्मोस मिसाइलों, हवाई रक्षा प्रणाली आकाश और हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र मिसाइल पर भी दुनिया की नज़रें हैं। पिछले साल मलेशिया ने तेजस में दिलचस्पी दिखाई थी और उसका विशेष हवाई प्रदर्शन भी मलेशिया के आकाश पर हुआ था। 

भारतीय रक्षा उपकरणों के निर्यात के संदर्भ में महत्वपूर्ण खबर आर्मेनिया से आई थी। आर्मेनिया ने भारत से चार स्वाति वैपन लोकेटिंग रडार खरीदने का निश्चय किया है। डीआरडीओ द्वारा विकसित स्वदेशी तकनीक के इन रडारों का निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम बीईएल करता है। इस सौदे का उत्साहवर्धक पहलू यह है कि आर्मेनिया की सेना ने रूस और पोलैंड के रडारों से साथ स्वाति का भी परीक्षण किया था और उसे अपनी स्वीकृति दी थी।

वैपन लोकेटिंग रडार

वैपन लोकेटिंग रडार युद्धक्षेत्र में कई दिशाओं से हो रही गोलाबारी के आधार पर त्वरित गति से यह बताता है कि शत्रु की तोपें कहाँ हैं। उन तोपों पर हमला करके उन्हें खामोश किया जा सकता है। भारतीय उपकरणों की विशेषता है कि वे यूरोपीय सामग्री की टक्कर के हैं और उनकी कीमत काफी कम है। आर्मेनिया के साथ भारत की यह बात एक अरसे से चल रही थी। आर्मेनियाई मीडिया के अनुसार उनकी दिलचस्पी भारत के मल्टी बैरल रॉकेट सिस्टम पिनाक में भी है। 

राजनीतिक निहितार्थ

रक्षा उपकरणों के सौदों का विदेश नीति के साथ सीधा रिश्ता होता है। आर्मेनिया को हथियार देने के पहले भारत को तुर्की और अजरबैजान जैसे देशों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी देखना होगा। तुर्की और अजरबैजान दोनों देशों ने पाकिस्तान के साथ रक्षा संबंधों को बढ़ाया है। तुर्की ने विश्वमंच पर कश्मीर पर भारतीय नीतियों की न केवल आलोचना की है, बल्कि पाकिस्तानी मुहिम को पूरा समर्थन दिया है।

सिपरी की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2015-19 के दौरान आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच नागोर्नो-कारबाख को लेकर सशस्त्र संघर्ष हुए हैं। दोनों देश अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए शस्त्रों का आयात कर रहे हैं। आर्मेनिया अपने तकरीबन सभी हथियार रूस से खरीदता है, जबकि अजरबैजान ने 60 प्रतिशत हथियार इज़रायल से और 31 प्रतिशत रूस से खरीदे हैं। 

पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान और अजरबैजान के बीच रक्षा-संबंधों में गरमाहट आई है। खबरें हैं कि अजरबैजान ने पाकिस्तान से जेएफ-17 लड़ाकू विमान और सुपर मशक विमान खरीदने की पेशकश की है। अजरबैजान की सेना 23 मार्च को इस्लामाबाद में होने वाली पाकिस्तान दिवस परेड में भी हिस्सा लेती है। अजरबैजान को पाकिस्तान का न केवल सैनिक समर्थन है, बल्कि उसने आर्मेनिया को राजनयिक मान्यता भी नहीं दी है। पाकिस्तान ऐसा अकेला देश है। 

अजरबैजान ने कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ दिया है और आर्मेनिया ने भारत का। दक्षिण पूर्व और सुदूर पूर्व एशिया में चीन के साथ रिश्ते भारतीय नीतियों को प्रभावित करते हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि भारतीय रक्षा-उत्पादों की माँग अब दक्षिण पूर्व एशिया में बढ़ रही है।

हालाँकि अभी यह कारोबार छोटा है, पर अगले कुछ वर्षों में यह तेज़ी से गति पकड़ेगा। इसके साथ ही भारतीय विदेश नीति की दिशा भी स्पष्ट होती जाएगी। वैश्विक शस्त्र व्यापार में हमारी भागीदारी भी 0.2 प्रतिशत है। यह प्रतिशत हमारी वैश्विक भूमिका को देखते हुए कुछ भी नहीं है। 

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।