भारती
वोडाफोन-आइडिया के लिए दिवालिया कोर्ट जाने से बेहतर है राष्ट्रीयकरण का विकल्प

प्रसंग- आर्थिक तनाव में चल रही वोडाफोन-आइडिया के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं।

वित्तीय वर्ष 2019-20 की तीसरी तिमाही में भारत के दूरसंचार उद्योग ने राजस्व में 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की है। दिसंबर 2019 में तीनों दिग्गज दूरसंचार कंपनियों ने शुल्क बढ़ाया था जिसके फलस्वरूप ये परिणाम देखने को मिले हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी वित्तीय वर्ष में 15-20 प्रतिशत की बढ़त भी देखने को मिलेगी।

रिलायंस जियो और भारती एयरटेल ने राजस्व बाज़ार में अपनी साझेदारी बढ़ाई है, वहीं वोडाफोन-आइडिया की राजस्व बाज़ार में साझेदारी घटी है। राजस्व बढ़त में भी वोडाफोन-आइडिया 5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ सबसे पीछे रहा। वहीं जियो और एयरटेल का राजस्व क्रमशः 10.3 प्रतिशत और 9.5 प्रतिशत बढ़ा।

24 अक्टूबर 2019 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय पहले ही मुश्किल में चल रहे दूरसंचार उद्योग पर भारी पड़ा और उसमें भी वोडाफोन-आइडिया की मुश्किलें अधिक बढ़ीं क्योंकि उसे 53,038 करोड़ रुपये का भुगतान करना था, वहीं एयरटेल को 35,586 करोड़ रुपये का।

वोडाफोन-आइडिया और एयरटेल दोनों ही कंपनियों ने 23 जनवरी की तय समय-सीमा तक यह राशि नहीं भरी। इसपर न्यायाधीश अरुण मिश्रा की बेंच ने आश्चर्य भी प्रकट किया था। केवल जियो ने ही 195 करोड़ रुपये की अपनी बकाया राशि तय समय-सीमा में भरी।

न्यायालय ने दूरसंचार विभाग के प्रति भी क्रोध व्यक्त किया जिसने कंपनियों को बकाया राशि जमा करने में देरी करने की छूट दी। पिछले सप्ताह आइडिया वोडाफोन ने दो किश्तों में 2,500 और 1,000 करोड़ रुपये जमा किए।

इसके बाद दूरसंचार विभाग, वित्त मंत्रालय और नीति आयोग को पत्र लिखकर वोडाफोन-आइडिया ने कहा कि व्यापार में बने रहने के लिए उसे सरकार से सहायता की आवश्यकता है। इससे पहले दिसंबर में ही आदित्य-बिड़ला समूह के प्रमुख कुमार मंगलम बिड़ला ने कह दिया था कि वे ऐसे कंपनी को नहीं चला पाएँगे।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारण के साथ बैठक करते कुमार मंगलम बिड़ला और उनके साथी

वोडाफोन-आइडिया ने बकाया राशि भरने के लिए सरकार से 15 वर्षों का समय माँगा है। साथ ही कर वापसी, लाइसेंस और स्पेक्ट्रम शुल्क में कटौती की भी माँग की है। पत्र में लिखा गया है कि 8,000 करोड़ रुपये की जीएसटी वापसी को बकाया राशि में से काट लिया जाए और शेष राशि तीन वर्षों के बाद 15 वर्षों तक चरणबद्ध रूप से भरने की अनुमति दी जाए।

दूसरी ओर मोतीलाल ओसवाल रिपोर्ट कहती है कि शुल्क बढ़ोतरी के बाद कुल ग्राहकों की संख्या कम हुई है। दिसंबर में ग्राहकों की संख्या 35 लाख कम हुई। एयरटेल के कुल ग्राहकों की संख्या में कोई बढ़त या गिरावट नहीं हुई। वहीं वोडाफोन के 36 लाख ग्राहक कम हुए तो जियो के 1 लाख ग्राहक बढ़े।

भले ही सितंबर की तिमाही में 50,922 करोड़ रुपये के घाटे से उबरकर वोडाफोन-आइडिया का घाटा दिसंबर की तिमाही तक 6,438.8 करोड़ रुपये का हो गया था लेकिन यह अच्छा सूचक नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि विशेषज्ञों ने आँकलन किया था कि वोडाफोन-आइडिया का घाटा मात्र 4,716 करोड़ रुपये ही रह जाएगा।

वोडाफोन-आइडिया बड़े आर्थिक दबाव से गुज़र रही है और यह तब ही अपना संचालन जारी रख पाएगी जब सर्वोच्च न्यायालय बकाया राशि भरने की समय-सीमा बढ़ाए या इस बकाया राशि की माँग से ब्याज दरों और जुर्माने को हटाकर कुछ कटौती करे।

यदि वोडाफोन समूह या आदित्य बिड़ला समूह दूरसंचार कंपनी में अतिरिक्त पूंजी नहीं डालेंगे तो कंपनी जल्द ही दिवालिया हो जाएगी। लेकिन दोनों साझेदार यह भी कहते आ रहे हैं कि जब तक सरकार कि ओर से कोई राहत नहीं मिलेगी, वे और निवेश नहीं करेंगे।

सरकार के लिए इस प्रकार की राहत देना राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से भारी पड़ सकता है। वोडाफोन-आइडिया को दिवालिया घोषित करने से भी काम नहीं चलेगा क्योंकि फिर सरकारी बैंकों पर भार आ जाएगा जो दूरसंचार कंपनी को दिए गए ऋण को वसूल नहीं पाएँगे।

इससे नरेंद्र मोदी सरकार के पास दो विकल्प बचते हैं-

पहला यह कि बकाया राशि वसूलते हुए स्पेक्ट्रम शुल्क में राहत दी जाए। इससे यह होगा कि दूरसंचार कंपनियाँ एक हाथ से देंगी और एक हाथ से लेंगी।

दूसरा विकल्प है कि वोडाफोन-आइडिया का कुछ समय के लिए अस्थाई रूप से राष्ट्रीयकरण किया जाए जिससे इसमें पूंजी का निवेश करके बकाया राशि वसूली जा सके।

स्वराज्य  के संपादक निदेशक आर जगन्नाथन वोडाफोन-आइडिया का राष्ट्रीयकरण करके बीएसएनएल के साथ इसके विलय के कुछ लाभ बताते हैं-

पहला, बीएसएनएल और वोडाफोन-आइडिया के कुल ग्राहकों की संख्या 48.9 करोड़ होगी जो इसे बाज़ार का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनाएँगे।

दूसरा, वोडाफोन-आइडिया का अधिग्रहण सरकार को सस्ता पड़ेगा। वर्तमान स्टॉक के अनुसार सरकार 17,000-18,000 करोड़ रुपये या उससे भी कम में वोडाफोन-आइडिया को खरीद सकती है।

वोडाफोन-आइडिया का फरवरी माह का स्टॉक मूल्य

तीसरा, वोडाफोन-आइडिया के प्रचारक विरोधी नहीं करेंगे क्योंकि वे काफी समय से इसके तरलीकरण की बात कर रहे हैं। दिवालिया कोर्ट जाने से उन्हें कुछ नहीं मिलेगा लेकिन सरकार के अधिग्रहण से उन्हें कुछ राशि तो मिल जाएगी।

चौथा, वोडाफोन-आइडिया का राष्ट्रीयकरण कंपनी और ग्राहकों, दोनों के लिए लाभदायक है क्योंकि इससे दीर्घ अवधि में कंपनी के टिकने की संप्रभुता सुनिश्चित हो जाएगी।

पाँचवा, बकाया राशि का भुगतान न लाभ-न हानि का सौदा होगा क्योंकि वोडाफोन-आइडिया बकाया राशि भर देगा और सरकार लगभग इतनी ही राशि कंपनी में डाल देगी। इससे अन्य कंपनियाँ भी अपनी बकाया राशि भर देंगी और एक करदाता के लिए भी यह सस्ता सौदै होगा।

छठा, राजनीतिक दृष्टि से भी वोडाफोन-आइडिया का अधिग्रहण स्वीकार्य होगा और सरकार को हज़ारों करोड़ों रुपये की राहत नहीं देनी होगी जो इसे आलाचनाओं के घेरे में नहीं लाएगी।

सातवाँ, देश के पास एक बड़ी सार्वजनिक दूरसंचार कंपनी होगी जो पुरानी बीएसएनएल से अधिक कार्य कुशल होगी व भविष्य में अत्यधिक शुल्क वृद्धि पर भी लगाम लगा पाएगी।

आठवाँ, सार्वजनिक उपक्रम की बाज़ार में बड़ी साझेदारी सरकार को स्पेक्ट्रम शुल्क घटाने के लिए प्रोत्साहित करेगी जिससे अंततः उपभोक्ताओं को लाभ मिलेगा।

नौवाँ, वोडाफोन-आइडिया को बड़ी मात्रा में ऋण दे चुके सार्वजनिक बैंको को भी राहत मिलेगी क्योंकि उन्हें नेशनल कमपनी लॉ ट्रिब्युनल से ऋण की वसूली नहीं करनी होगी।

इस प्रकार वोडाफोन-आइडिया के राष्ट्रीयकरण और बीएसएनएल में विलय सबको लाभ पहुँचाता दिख रहा है। भविष्य में वोडाफोन-आइडिया को फिर से निवेशकों को बेचा जा सकता है।

सरकार 11,000 करोड़ रुपये तक के सस्ते दाम पर वोडाफोन-आइडिया को खरीद सकती है और एक बार इसके वित्त संतुलित हो जाएँ तो कई गुना अधिक दाम पर बेच सकती है।

यूएस सरकार ने 2008 की आर्थिक मंदी के समय सिटी बैंक के साथ यही किया था। सिटी बैंक के बड़े हिस्से को सरकार ने खरीद लिया था और हालत सुधरने के बाद उसका निजीकरण कर दिया।

अंतिम निर्णय तब ही लिया जा सकता है जब वोडाफोन-आइडिया के प्रचारक आधिकारिक रूप से कह दें कि वे कंपनी को बचानेके लिए और निवेश नहीं कर सकते। लेकिन यह विकल्प दिवालिया कोर्ट जाने से बेहतर है।