भारती
“किसी भी कार्य की विषमता के समक्ष अपना पुरुषार्थ न खोएँ”- कुरल भाग 15

तिरुवल्लुवर का मानना था कि धर्म से ही हमारे दैनिक कार्य भी विनियमित होने चाहिए। जीवन में अध्यात्म को देखना कुरल और गांधीजी का सामान्य बिंदु है।

कुरल के शास्त्रीय भाष्यकार कुरल के पोरुलपाल, पुस्तक 2 को सरकार चलाने के लिए ज़िम्मेदार लोगों के लिए संबोधन मानते हैं। लेकिन कई अध्याय सांसारिक कार्यों में लगे हुए व्यक्तियों के लिए हैं जो सरकार से जुड़े हुए नहीं हैं। ऐसे ही कुछ कुरल निम्नलिखित हैं-

सतर्कता

उपलब्धि के मद में की गई लापरवाही अत्यधिक क्रोध से भी अधिक हानिकारक है।

जो सतर्क नहीं हैं, वे महान नहीं हो सकते। यह जीवन के सभी क्रमों पर लागू होता है और हर संहिता में यह स्वीकृत है।

निस्तेज और लापरवाह लोगों को संपत्ति भी लाभ नहीं पहुँचा सकती, उसी प्रकार जैसे कोई दुर्ग भी कायर को नहीं बचा सकता।

सभी लोगों से व्यवहार में और हर समय बिना चूक के सतर्क रहने से बेहतर और कुछ नहीं होगा।

पहले से सतर्क रहें, बाद में पश्चाताप करना व्यर्थ है।

यह सबसे व्यवहारिक और सर्वस्वीकार्य परामर्श है। यह नैतिक आचरण पर भी उतना ही लागू होता है जितना सांसारिक गतिविधियों पर।

सतर्कता और कुशल मस्तिष्क के साथ यदि कोई भी कार्य किया जाए, तो वह असंभव नहीं हो सकता।

आदर्शों के अलावा लोगों को मनोवैज्ञानिक सहायता देने की तिरुवल्लुवर की कला को आप निम्न कुरल में देख सकते हैं।

जब आप अपनी संपन्नता से आनंदित महसूस कर रहे हों तब उन लोगों का ध्यान करें जो सतर्कता के अभाव में तहस-नहस हो गए।

अपने मस्तिष्क के समक्ष अपना लक्ष्य सदा रखने से कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है।

परिश्रम

पारिवारिक विरासत तब तक ही काम आती है जब तक आप अपनी मेहनत से उसे बरकरार रखें। मंदिर का दीपक भी ध्यान न देने पर बुझ जाता है।

जब व्यक्ति का विनाश निकट होता है तो वह चीज़ों को टालने और भूलने लगता है, शिथिलता और निद्रा उसे घेर लेती है।

जो निष्क्रिय होकर कामचोरी करता है, वह पहले मित्रों से निंदा पाता है और अंततः उसे सभी की आलोचना झेलनी पड़ती है।

अपनी प्राकृतिक कमियों की भरपाई आप परिश्रम से कर सकते हैं।

जो राजा अथक परिश्रम करता है, उसके आगे पूरा संसार झुकता है।

कर्मठ जीवन

किसी भी कार्य की विषमता के समक्ष अपना पुरुषार्थ न खोएँ। कर्मठता सदैव विजय लाती है।

कामचोरी न करें। मनुष्य का जन्म कर्म के लिए ही हुआ है। जो इसमें असमर्थ होता है, वह संसार में असमर्थ होता है।

सतत कर्म करने वाले ही अन्य के काम आने से होने वाले गर्व की अनुभूति कर सकते हैं।

बिना परिश्रम के दूसरों के काम आने की अभिलाषा रखने वालों की कामना उसी प्रकार अर्थहीन होती है जैसे किसी निर्बल द्वारा युद्ध के शस्त्र चलाने की अभिलाषा।

जो अपने कर्म से प्रेम करता है और इसमें सुख पाता है, वह अपने मित्रों और परिजनों के कष्टों को हरकर उन्हें संबल देता है।

यदि प्रकृति ने आपको कुशाग्र बुद्धि नहीं दी है तो इसमें आपका दोष नहीं है लेकिन ज्ञान होने के बावजूद इसका उपयोग न करना निंदनीय है।

यदि दुर्भाग्यवश आपको लक्ष्य की प्राप्ति नहीं भी होती है तो भी आपके प्रयास व्यर्थ नहीं जाते हैं।

तात्पर्य यह है कि सच्चे प्रयास स्वयं में फल हैं। हर सच्चे प्रयास से मनुष्य स्वयं को बेहतर करता है। जो ऊर्जा आप लगाते हैं, वह व्यर्थ नहीं होती बल्कि आपके चरित्र का सामर्थ्य बढ़ाती है।

सतत और साहसिक प्रयास मनुष्य का बाग भी बदल देते हैं।

अगले अंक में जारी…

पिछला भाग- “इच्छाओं से मुक्त होकर ही पवित्र हुआ जा सकता है”, कर्म के विधान पर कुरल भाग-14