भारती
पिथौरागढ़ ने चुनौतियों पर संकल्प-शक्ति की विजय से पाया लहलहाते कंद-पुष्पों का उद्यान

मई के पूर्वार्ध में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पिथौरागढ़ स्थित मुनस्यारी के जीवंत रंगों वाले फूलों के बगीचों का चित्र साझा किया था। चित्र की पृष्ठभूमि में हिम से ढके हुए पंचाचुली शिखरों को देखा जा सकता है।


ये चित्र राज्य की पायलट परियोजना के अंतर्गत विकसित किए गए 1,200 स्क्वायर मीटर के क्षेत्रफल में फैले हुए मुनस्यारी प्रकृति शिक्षा और ईको पार्क केंद्र के हैं। फूलों और पौधों की विविधता में समृद्ध तथा ऐसी दुर्लभ व दिव्य विरासत वाले उत्तराखंड के लिए यह परियोजना एक नई शुरुआत है।

कंद पुष्प का बगीचा

इस पायलट परियोजना का नेतृत्व पिथौरागढ़ जिला वन अधिकारी (डीएफओ) डॉ विनय भार्गव जिला प्रशासन की सहायता से कर रहे हैं। वन विभाग के अधीन मुनस्यारी केंद्र में विकसित कंद-पुष्प (ट्यूलिप) का बगीचा सार्थक है, मात्र सौंदर्य या प्रथा के लिए नहीं है। ट्यूलिप का रोपण उस मॉडल का अंश है जिसका उद्देश्य स्थानीय लोगों के लिए जीविका अवसर प्रदान कर बाहर की ओर प्रवासन की समस्या को रोकना है।

कंद-प्रकार और सजावटी पुष्पों में अपनी रुचि को भार्गव ने अपने काम में व्यक्त किया है। उनका कहना है कि पिथौरागढ़ में एक ट्यूलिप उद्यान के उनके विचार को उत्तराखंड के राजनेता व पूर्व विधायक स्वर्गवासी प्रकाश पंत ने समर्थन दिया था।

भार्गव मुनस्यारी प्रकृति शिक्षा और ईको पार्क केंद्र के लिए 7,000 कंद खरीद पाए थे लेकिन इस सीमित सामग्री के साथ भी वे वैज्ञानिक तरीके से बागवानी करना चाहते थे। मुनस्यारी में फूलों के खिलने के साथ इसी जिले के एक और ट्यूलिप बगीचे में भी फूल खिले हैं।

यह दूसरा बगीचा पशुपतिनाथ मंदिर में और इसके आसपास है व यहाँ लगभग 20,000 कंद हैं। अपेक्षा है कि भविष्य में यह बगीचा मोस्टामानू मंदिर के निकट तक फैलकर 50 हेक्टेयर क्षेत्रफल का हो जाएगा।

दूसरी ओर मुनस्यारी का ट्यूलिप बगीचा कंद-पुष्पों की यात्रा को अधिक सफल बनाने के लिए फूलों की दीर्घ और निरंतर खेती का लक्ष्य कर रहा है। इस स्थल की यात्रा रोमांच सहित मौसम की चुनौतियों का सामना करती हुई रही है।

यहाँ उगाए जाने वाले कई फूलों में से ट्यूलिप एक रहा है। ट्यूलिप के बाद 36 प्रकार के पुष्प पौधों से यह उद्यान सदैव सुशोभित रहता है।

बागवानी का मिशन

लोकप्रिय रूप से ऐसी परियोजनाओं में हाइब्रिड (मिश्रित प्रजाति के) बीजों का उपयोग होता है। भार्गव कहते हैं कि इस कारण से लोग दूर भागते हैं क्योंकि हाइब्रिड बीजों को बार-बार खरीदना पड़ता है जिससे अधिक खर्चा होता है।

वे ऐसा कुछ नहीं चुनना चाहते थे जिसे बार-बार खरीदना पड़े। “कंद प्रकार के पुष्पों के लिए पिथौरागढ़ का तापमान उपयुक्त है। मैंने स्वर्गवासी श्री प्रकाश पंत से कहा था कि मैं मधबन पंचायत क्षेत्र को चुनना चाहता हूँ क्योंकि लहरदार स्थान ही उपयुक्त रहेगा।”

जब मुख्यमंत्री रावत ने 13 जिलों के 13 गंतव्य स्थलों को रूप में विकसित करने की घोषणा की तो यह उनके विचार के अनुरूप ही थी। भार्गव ने निश्चय किया कि पिथौरागढ़ को ट्यूलिप स्थल के रूप में विकसित करना है।

मधबन पंचायत क्षेत्र (एक वन भूमि) में भार्गव 50 हेक्टेयर के क्षेत्र में ट्यूलिप उगाना चाहते थे। इसके लिए अनुमानित लागत जोड़ी गई। कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) को इससे जोड़ने का उनका विचार फलीभूत नहीं हुआ।

2018 में उनका श्रीनगर जाना हुआ। वहाँ उन्होंने ट्यूलिप के बगीचे देखे और पिथौरागढ़ की ऊँचाई और बागवानी के संबंध में उन्हें कई बातें स्पष्ट हुईं। 2019 में भार्गव के नेतृत्व में पिथौरागढ़ ने एक व्यवाहरिक विचार प्रस्तुत किया। पिथौरागढ़ की मिट्टी, मौसम, कंद पौधों की कठोरता, ढलान, ऊँचाई और उत्तुंगता ट्यूलिप की बागवानी के लिए लाभकारी थे।

भार्गव का उद्देश्य था एक दृढ़ बागवानी। कागज़ पर पर्यटन विभाग गंतव्य स्थलों को विकसित करने के लिए नोडल इकाई था इसलिए भार्गव और उनकी अपेक्षानुसार योजना का क्रियान्वयन कार्य के दायरे से बाहर रहे। “मेरे पास योजना थी लेकिन कोष नहीं। दूसरों के पास पैसे थे लेकिन योजना नहीं थी लेकिन मैं स्वयं को किसी पर आरोपित नहीं करना चाहता था।”, उन्होंने कहा।

सौभाग्यवश मुख्यमंत्री रावत ने ट्यूलिप उद्यान परियोजना में रुचि दिखाई। दुर्भाग्यवश, कुछ महीनों के बाद विधायक पंत का निधन हो गया।

2019 में औपचारिक रूप से अपनी अवधारणा मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर भार्गव को मिला। परियोजना की घोषणा मीडिया में सार्वजनिक रूप से कर दी गई।

कई उतार-चढ़ाव आए, कई लोगों से उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ नहीं मिलीं, कुछ ने तो भार्गव की योजना को “व्यर्थ” भी कहा दिया। “मैं डिगा नहीं और सभी गलत अवधारणों को सही किया, विफल होने की आशंका और बीजों में बार-बार लागत की चिंता को भी मैंने सुलझाया। मैंने कश्मीर और पिथौरागढ़ की ऊँचाई में अंतर समझाया। मैंने समझाया कि किस ऊँचाई पर कंद बनने शुरू होते हैं और भी कई तथ्य।”

यह परियोजना दूसरे (नोडल) विभाग के हाथ में चली गई और भार्गव पूर्ण रूप से दरकिनार हो गए लेकिन स्थानांतरण भी उन्हें ट्यूलिप परियोजना से दूर नहीं कर पाया। प्रकृति घटनाओं पर हावी हो गई।

सभी विषयमताओं के बावजूद खिले कंद-पुष्प

मार्च 2019 में 7,000 कंद आ गए थे। ये कंद अंकुरित होने लगे थे। भार्गव सीमित कंद ही खरीदना चाहते थे ताकि खतरा कम रहे। बाधाओं के कारण इन कंदों को बोने में हुई देरी से वे क्रुद्ध हो गए। मधबन पंचायत भूमि की तुलना में कंदों की संख्या अधिक हो गई।

फिर उन्होंने मुनस्यारी ईको पार्क की ओर रुख किया जो उस समय बर्फ से ढका हुआ था। “ईको पार्क पर हमने परिश्रम किया। हमारा समर्पित दल बेजोड़ है। मैंने बर्फ हटाने का सुझाव दिया। मिट्टी में बाँझ जंगल की मिट्टी, कोको पीट और गाय के गोबर की खाद मिलाई गई।”, भार्गव ने बताया। अंकुरण 40-45 दिनों में शुरू होने वाला था।

पत्ते विकसित हुए, कुछ फूल भी खिले लेकिन विकास अधिक नहीं हुआ। कंद मिट्टी में ही रहे। मानसून आ गए। मानसून के बाद पत्ते फिर उगे। कंद मिट्टी में ही रहे और 2019 की सर्दी गुज़र गई। मार्च 2020 में भार्गव आश्वस्त हुए कि कंदों में अभी भी प्राण हैं। जंगली सूअरों और लंगूरों से उन्हें बचाने के लिए घेराबंदी की गई।

मार्च में बर्फ के पिघलने के बाद अप्रैल में पत्ते उगे और कलियाँ खिलीं। यह शुरुआती चरण था। फिर ओले गिर गए जो इस क्षेत्र में प्रायः फसल खराब कर देते हैं लेकिन कंद-पुष्प उन्हें झेल गए।

कई तनावों से गुज़रने के बाद कंदों में अच्छी मात्रा में पत्ते और फूल खिल गए। लाल, लाल-पीले का मिश्रण और श्वेत हिम शिखरों की तरह गर्वीले सफेद कंद पुष्प भी खिले। केंद्र की साइट से भार्गव को दो बार इन फूलों के लुभावने चित्र देखने को मिले लेकिन यह दृश्य उनकी कल्पना से कुछ कम था।

एक दिन बादल छट गए और पृष्ठभूमि में पंचाचुली शिखरों के साथ वे फूल दिखे, भार्गव की कल्पना का दृश्य, वह दृश्य आ गया था।

इस सफलता का श्रेय भार्गव मुनस्यारी प्रकृति शिक्षा एवं ईको पार्क केंद्र का प्रबंधन करने वाले स्थानीय रूप से प्रशिक्षित लेकिन बेरोजगार युवकों को देते हैं। बृजेश धर्मशक्तु की अध्यक्षता उतार-तढ़ाव से भरी कंद-पुष्पों की यात्रा पूरी हुई।

भार्गव का कहना है कि 1.36 लाख रुपये में पूरी हुई इस परियोजना का फल इसके लिए किए गए प्रयासों के योग्य था। अब यदि उन्हें समर्थन मिले तो वे 1 लाख कंदों को 30-70 हेक्टेयर के क्षेत्र में उगाना चाहते हैं।

कोविड-19 के संकट के समय में मुख्यमंत्री रावत के पोस्ट में ट्यूलिप उद्यानों के चित्रों ने सोशल मीडिया पर फैली उदासी को हटाकर एक उत्साह भर दिया। कोविड के बाद के समय में इसका लाभ पिथौरागढ़ के लोगों को मिलेगा।

सुमति महर्षि स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @sumati_mehrishi के द्वारा ट्वीट करती हैं।