भारती
अमेरिका-ईरान टकराव भारत के लिए अहितकर, पाकिस्तान पर रखनी होगी नज़र

अमेरिका और ईरान ने खुले युद्ध की ओर बढ़ाए अपने कदमों को फिलहाल पीछे खींच लिया है, पर पश्चिम एशिया पर छाए युद्ध के बादल छँटे नहीं है। भारतीय विदेश-नीति के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि इस टकराव को बढ़ने से रोका जाए। 

लगभग ऐसी ही स्थिति सन 1990-91 में बनी थी, जब एक तरफ सोवियत संघ के विघटन की भूमिका बन रही थी और दूसरी तरफ इराक ने कुवैत पर हमला बोल दिया था। भारतीय राजनीति परिवर्तन के दौर से गुज़र रही थी। केंद्र में अल्पमत सरकार थी और अर्थव्यवस्था के सामने थीं चुनौतियाँ। कश्मीर में निजाम-ए-मुस्तफा लागू करने के इरादे से पाकिस्तानी शह पर अफगान मुजाहिदीन मार-काट मचा रहे थे। 

इस समय सब कुछ वैसा ही नहीं है। केंद्र में मजबूत सरकार है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका तब के मुकाबले आज कहीं बेहतर है। उस समय वैश्विक मंच पर अमेरिका का एकाधिपत्य था, आज उसका पराभव होता दिखाई पड़ रहा है। इराक़ और अफगानिस्तान से उसके पैर उखड़ रहे हैं। 

इराक़ और अफगानिस्तान की दोनों परिघटनाओं का असर भारत पर तब भी पड़ा था और अब भी पड़ेगा। संयोग से ईरानी विदेशमंत्री 14 से 16 जनवरी तक दिल्ली में होने वाले रायसीना संवाद में आ रहे हैं। उनकी यात्रा के दौरान कुछ बड़ी बातें सामने आएँगी। 

पाकिस्तानी गतिविधियाँ

हालाँकि ईरानी घटनाक्रम से पाकिस्तान का सीधा संबंध नहीं है, पर कश्मीर में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने और उसके बाद नागरिकता संशोधन कानून को लेकर पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर अपनी गतिविधियों को तेज़ कर दिया है। उसने तुर्की और मलेशिया के सहयोग से क्वालालंपुर में इस्लामी देशों के विशेष सम्मेलन की व्यवस्था कर ली थी, जिसमें ईरान ने भी भाग लिया। 

अमेरिका और ईरान के बीच ताज़ा टकराव में भी पाकिस्तान ने अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण बनाने का फैसला किया है। यों भी अमेरिका पश्चिम एशिया में उसका इस्तेमाल करता है। अंतिम क्षणों में सऊदी अरब के दबाव में पाकिस्तान क्वालालम्पुर सम्मेलन से अलग हो गया, पर उसके प्रयास कम होने वाले नहीं हैं। 

अमेरिका में पाकिस्तान ने लॉबीइंग पर काफी पैसा खर्च करना शुरू कर दिया है और इस बात के संकेत हैं कि अब वह चीन के सहयोग से यह सब कर रहा है। कश्मीर को लेकर भारत ने विश्व समुदाय से जुड़ने की कोशिश तो की है, पर यूरोपियन यूनियन के देशों की हिचक अभी बाकी है। 

टकराव की पृष्ठभूमि

अमेरिका में यह राष्ट्रपति-चुनाव का साल है। देश की सीनेट को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध लाए गए महाभियोग पर फैसला करना है। अमेरिका और चीन के बीच एक नए आंशिक व्यापार समझौते पर इस 15 जनवरी को हस्ताक्षर होने वाले हैं। बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए ट्रंप इसके बाद चीन की यात्रा भी करेंगे। ब्रिटिश संसद को ब्रेक्ज़िट से जुड़ा बड़ा फैसला करना है। 

व्यापार समझौता

हमें न केवल अपनी, बल्कि पाकिस्तान की भूमिकाओं पर भी बारीकी से नज़र रखनी होगी। एक तरफ अमेरिका के साथ हमारे आर्थिक और सामरिक रिश्ते बन रहे हैं, वहीं ईरान के साथ हमारे परंपरागत रिश्ते हैं और सऊदी अरब तथा संयुक्त अरब अमीरात के साथ भी रिश्ते बन रहे हैं। इन दिनों इस्लामिक देशों के आपसी रिश्तों पर भी बदलाव के बादल छाए हैं। शायद यह किसी बड़े बदलाव की उमड़-घुमड़ भी है। 

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबे अर्से से चल रहा है, पर हाल में अमेरिका ने इराक़ी राजधानी बग़दाद में एक बड़ी सैनिक कार्रवाई करके ईरानी सेना के कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या कर दी। इस कार्रवाई के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करके इराक में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलों से हमला बोलकर अपने इरादे स्पष्ट कर दिए। हालाँकि ईरान का दावा है कि इस हमले में अमेरिका के 80 फौजी मारे गए हैं, पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि कोई नुकसान नहीं हुआ। 

अब अमेरिकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है। ट्रंप ने पहले कहा था कि हमारे किसी भी ठिकाने या व्यक्ति पर हमला हुआ तो हम जबर्दस्त कार्रवाई करेंगे। हमने ईरान के 52 ठिकानों पर निशाना लगा रखा है। कयास हैं कि ईरान ने जानबूझकर हमला इस तरह किया, जिससे अमेरिकी सैनिक हताहत नहीं हों। इससे जवाबी संदेश तो गया, पर बड़े युद्ध की सम्भावनाएँ टलीं। जवाब में अमेरिका ने बड़ी कार्रवाई नहीं की है, पर अमेरिकी विशेषज्ञ इस बात पर हैरान हैं क्योंकि ईरान के पास अचूक निशाना लगाने की क्षमता मौजूद है। 

सितंबर में सऊदी अरब के दो पेट्रोलियम संयंत्रों पर जब हमला हुआ था, तब आरोप यमन के हूती बागियों पर लगा था पर विशेषज्ञ मानते थे कि वह काम भी ईरान का था। हाल में संयुक्त राष्ट्र की एक जाँच रिपोर्ट से भी इस बात की पुष्टि हुई है। 

ईरान का महत्व

अमेरिका ने पिछले साल जब ईरान पर पाबंदियाँ लगाईं तब भारत ने उनका पालन किया और ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया। बावजूद इसके ईरान के साथ रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश की। हाल में पाकिस्तान, मलेशिया और तुर्की की पहल पर ईरान ने क्वालालंपुर में हुए मुस्लिम देशों के सम्मेलन में भाग भी लिया। उस सम्मेलन में सऊदी अरब की नाखुशी भी जाहिर हुई थी। 

हाल में ही ईरान-भारत संयुक्त आयोग की बैठक हुई है, जिस सिलसिले में विदेशमंत्री एस जयशंकर तेहरान गए थे। उन्होंने गत 23 दिसंबर को राष्ट्रपति हसन रूहानी से भी भेंट की और उसके पहले विदेशमंत्री जव्वाद जरीफ के साथ संयुक्त आयोग बैठक की बैठक में शामिल हुए। 

ताज़ा घटनाक्रम में भारत के सामने कई प्रकार की उलझनें हैं, जिन्हें समझदारी से सुलझाना होगा। कमांडर क़ासिम सुलेमानी के मारे जाने के बाद जयशंकर ने पहले जव्वाद ज़रीफ़ और फिर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो से भी फोन पर बात की। दोनों से तनाव कम करने की अपील की, पर हमले के लिए अमेरिका की निंदा नहीं की। 

ईरान के विदेश मंत्री जव्वाद ज़रीफ़ और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

दूसरी तरफ भारत और अमेरिका के विदेशमंत्रियों की वार्ता के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने जो बयान जारी किया है उसमें इस बात का उल्लेख है कि दोनों विदेशमंत्रियों ने ईरान के लगातार उकसावे को रेखांकित किया। इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने जो बयान जारी किया, उसमें यह भी कहा गया कि इस तनाव के कारण विश्व शांति के लिए खतरा पैदा हो गया है। 

भारत और ईरान के पारंपरिक रिश्ते हैं। सन 1994 में जब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के सालाना सम्मेलन में कश्मीर को लेकर भारत दबाव में आ गया था, ईरान ने हमारी मदद की थी। उसी सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने अटल बिहारी वाजपेयी को भारत का प्रतिनिधि बनाकर भेजा था। 

ईरान के साथ हमारे कारोबारी रिश्ते भी अच्छे रहे हैं। चाबहार बंदरगाह का निर्माण भारत कर रहा है। एशिया को यूरोप से जोड़ने वाले उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर का साझीदार भी भारत है। अफगानिस्तान को ईरान के रास्ते समुद्र मार्ग उपलब्ध कराने वाली परियोजनाओं में भी भारत शामिल है। बावजूद इसके ईरान के साथ हमारे रिश्तों में पिछले डेढ़ दशक से डगमगाहट है। 

सन 2005 में भारत ने अंतरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा आयोग में ईरान के खिलाफ वोट दिया। इस बात से ईरानियों को धक्का लगा। पर उसे ईरान ने स्वीकार कर लिया। इस रिश्ते को बनाए रखने में जनरल कासिम सुलेमानी की भूमिका भी थी, जो बग़दाद पर हुए अमेरिकी हमले में मारे गए हैं। 

ईरान से नाराज़गी?

तमाम तरह के अंतर्विरोधों के बीच ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ रिश्तों को सुधारने के बजाय बिगाड़ने का फैसला किया, जिन्हें ओबामा प्रशासन ने एक हद तक ठीक कर लिया था। सन 2018 में ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ हुए समझौते से हाथ खींच लिया था। इस समझौते के कारण ईरानी नाभिकीय कार्यक्रम पर रोक लग गई थी। इसके बाद ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर पाबंदियाँ लगानी शुरू कर दीं। 

उन्होंने ईरान पर तमाम तरह के दबाव डाले हैं, पर पिछले सितंबर में जब सऊदी तेल संयंत्रों पर मिसाइलों से हमले बोले गए तो अमेरिका कोई बड़ी जवाबी कार्रवाई कर नहीं पाया। ट्रंप प्रशासन अंतर्विरोधों का शिकार है। इसमें बड़ी भूमिका अमेरिका की आंतरिक राजनीति की है। बग़दाद में की गई फौजी कार्रवाई के बाद वॉशिंगटन, न्यूयॉर्क और शिकागो जैसे शहरों में युद्ध-विरोधी प्रदर्शन हुए हैं। 

ट्रंप ने इतना बड़ा फैसला क्यों किया? क्या केवल चुनाव जीतने के लिए? क्या इसकी मदद से चुनाव जीता जा सकता है? खबरें हैं कि अमेरिकी इंटेलिजेंस के अनुसार सीरिया, इराक़ और लेबनॉन में अमेरिकी दूतावासों, वाणिज्य दूतों और सैनिक कार्यालयों पर हमले हो सकते हैं।

इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति ने बड़ा कदम उठाया। जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या का फैसला छोटा नहीं है। बताते हैं कि 28 दिसंबर को अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले को टाल दिया था, पर अमेरिकी दूतावास पर हुए हमले के बाद इस कार्रवाई को अंजाम देने का फैसला कर लिया गया। 

यह टकराव किसी भी दृष्टि से भारत के हित में नहीं है। इसका सीधा प्रभाव पेट्रोलियम की कीमतों पर पड़ेगा। हमारी विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम के आयात पर जाता है। देश की अर्थव्यवस्था इस समय नाजुक दौर से गुजर रही है। इस क्षेत्र में करीब 80 लाख भारतीय काम करते हैं। सन 1991 के युद्ध के दौरान भारत को 1,10,000 भारतीयों को एयरलिफ्ट करना पड़ा था। 

हाल में हैदराबाद से खबर थी कि इराक के एरबिल क्षेत्र में जहाँ ईरानी मिसाइलों ने हमला किया है, तेलंगाना के करीब 25,000 लोग काम करते हैं। भारत के कारोबारियों को विश्वास है कि इस संकट का असर हमपर पड़ेगा नहीं, पर इसमें दो राय नहीं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अचानक अनिश्चय के भँवर में फँस गई है, जिससे बाहर निकलना चाहिए।  

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।