भारती
बजट 2020 में कर सुधारों के लिए है अनूठा अवसर, कितना लाभ उठा पाएगी सरकार?
करण भसीन - 30th January 2020

2019-20 का केंद्रीय बजट एक अंतरिम बजट था और इसपर प्रतिबंध थे क्योंकि अगले कुछ महीनों में चुनाव होने वाले थे। चुनाव के बाद के बजट की भी अपनी सीमाएँ थीं क्योंकि इसपर सीमित समय में ही काम किया जा सकता था।

हालाँकि, आगामी बजट कर सुधारों को शुरू करने का एक अनूठा अवसर है जो वर्ष 2024 के निकट आते-आते मुश्किल हो सकता है।

पिछले कुछ महीनों में सरकार को प्रत्यक्ष कर रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद ऐसी उम्मीद है कि कर सुधारों पर काम जारी है। हाल के निगम कर में हुई कटौती ने आगामी बजट में कर दरों को युक्तिपूर्ण बनाने के साथ-साथ हमारे कर मानकों के सरल होने की उम्मीद को और आगे बढ़ाया है।

एक ओर कई अर्थशास्त्रियों ने पिछले कुछ हफ्तों में व्यक्तिगत आयकर दरों में कमी के खिलाफ तर्क दिया है लेकिन मेरी राय में ​​प्रत्यक्ष करों के संबंध में एक संरचित कर सुधार किया जा सकता है।

निगम कर दर की तुलना में वर्तमान कर की उच्चतम दर 17 प्रतिशत अंक अधिक है, यहाँ से शुरुआत की जा सकती है। यह अंतर शायद दुनिया में सबसे अधिक है।

इसलिए कर युक्तिकरण की एक निश्चित आवश्यकता है और मौजूदा मंदी में इस तरह की कटौती का अनुरोध और बढ़ा देती है क्योंकि इससे लोगों के हाथों में अधिक पैसा बचेगा।

निगम कर में कटौती एक स्वागत योग्य बदलाव था क्योंकि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने अधिक अनुपालन के माध्यम से अधिक राजस्व जुटाने की बात कही थी। इसलिए, एक अवधि के बाद यह कर कटौती राजस्व के लिए सकारात्मक हो सकती है।

लेकिन कर दर कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है क्योंकि यह कर सुधार का सिर्फ एक भाग है। प्रत्यक्ष करों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है हमारी कर संहिता जो एक गतिशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पुरातन और अपर्याप्त है।

हमें प्रक्रियाओं के सरलीकरण, आधुनिक कर संरचना के माध्यम से कर अनुपालन में सुधार और कर संरचना को विकास का एक महत्वपूर्ण निर्धारक मानकर इनपर पर्याप्त ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

उदाहरण के रूप में यंग ली और रॉबर्ट गॉर्डन परिकल्पना का समर्थन करते हुए साक्ष्य से बताते हैं कि कैसे कर संरचना आर्थिक विकास का प्रमुख निर्धारक है। वे आगे इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि कर दरों में हर 1 प्रतिशत अंक की कमी से विकास दर कैसे 0.1 प्रतिशत से बढ़ जाती है।

ये निष्कर्ष अगस्त 2019 में डॉ सुरजीत एस भल्ला के साथ किए गए एक संयुक्त अभ्यास के अनुरूप हैं।

कर संरचना मायने रखती है और इसलिए टैक्स रिटर्न दाखिल करने के दौरान प्राप्तकर्ता की कर दर पर ही लाभांश का कर लिया जाना चाहिए। इससे तीन बार कर की समस्या दूर होगी, हालाँकि तब भी एक ही आय पर दो बार कर लगा रहा होगा। लाभांश पर प्राप्तकर्ता की आय जैसा कर लगाना अच्छा विचार है क्योंकि इससे आयकर दरों का युक्तिकरण होगा और उचित कर दर पर पहुँचने में लाभांश आय को समग्र आय में नहीं जोड़ा जाता।

इसी तरह, इस बात पर भी चर्चा करने की आवश्यकता है कि क्या भारत जैसे पूंजी की कमी वाले देश को पूंजी पर कर लगाना चाहिए और यदि हाँ तो किस दर पर।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा है कि कर का भुगतान कब करना है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कम लाभ के परिणामस्वरूप निवेशकों को निवेश के नए अवसरों की तलाश है और इसलिए उन्हें भारत लाने में कर सुधार की नीतियाँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

इस पृष्ठभूमि के साथ कर संरचना को देखना चाहिए और इसे हमारे विकास के उद्देश्यों के अनुकूल ढालना चाहिए।

पूंजी पर कर लगाने में हमने गंभीर त्रुटियाँ कीं हैं। ऐसी ही एक त्रुटि प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) है, जिसे दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) के विकल्प के रूप में पेश किया गया था। भारत ने एक ओर प्रतिभूतियों पर एलटीसीजी लगाया, दूसरी ओर एसटीटी को भी बरकरार रखा जिसने कई निवेशकों को असमंजस में डाला।

दरअसल, इस कदम के कारण हमारी कर नीति की विश्वसनीयता प्रभावित हुई जैसा कि वोडाफोन के पूर्वव्यापी कर मामले के दौरान हुआ था। शायद, एसटीटी को हटा दिया जाना चाहिए और एलटीसीजी के लिए सरकार के पास एक समान दर या अवधि होनी चाहिए।

इक्विटी व्यापार से उत्पन्न होने वाला पूंजीगत लाभ अचल संपत्ति के संभावित पूंजीगत लाभ की तुलना में अधिक या कम होने चाहिए जैसा विचार मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण है।

सरकार ने पहले ही नई कंपनियों के लिए कर की कम दर की पेशकश करते हुए निगम कर दरों को घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया है।

हालाँकि, नई निगम कर दरें सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) के लिए लागू नहीं होती हैं, जिन पर 30 प्रतिशत कर लगाया जाता है। कंपनी की संरचना और कर में संबंध नहीं होना चाहिए और एलएलपी को भी कम कर दर का लाभ मिलना चाहिए।
यह अपने साथ कर दरों की एकरूपता लाएगा जो कर संरचना के सरलीकरण में सहायक होगी।

कई लोगों ने कर कटौती के खिलाफ वकालत की है और इसलिए कोई भी असंरचित कर कटौती नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे केवल अनिश्चितता में बढ़ोतरी होगी।

लेकिन, व्यक्तिगत आयकर के लिए कर दरों के युक्तिकरण से युक्त एक संरचित कर सुधार समय की आवश्यकता है। यानी कोई भी कर कटौती समग्र प्रत्यक्ष कर सुधार का एक हिस्सा होनी चाहिए। यह हाल की आर्थिक मंदी को संबोधित करने के लिए महत्वपूर्ण है लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह समय के साथ भारत की संभावित विकास दर को बढ़ाएगा।

इसके साथ ही वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को और सरल बनाने की आवश्यकता है लेकिन यह जीएसटी परिषद के दायरे में है इसलिए इसमें ऐसा बहुत कुछ नहीं है जो बजट कर सकता है। लेकिन इसके प्रति प्रतिबद्धता दर्शाते कथन पर ज़ोर देने से सभी को यह विश्वास दिलाया जा सकता है कि दीर्घावधि में अप्रत्यक्ष कर सुधारों की भी संभावना है।

एक सरल कराधान शासन से भ्रम कम होंगे और इसके परिणामस्वरूप अनावश्यक अनुपालन आवश्यकताओं की अनिश्चितता व कर संबंधी मुकदमेबाजी कम हो जाएगी। दोनों ही कंपनियों को धन सृजन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे जो 2024 या 2025 तक 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।