भारती
तुर्की और भारत में इस्लाम- कश्मीर पर एर्दोगन का बयान निजी महत्वाकांक्षा का परिचायक

मंगलवार (24 सितंबर) को तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में कश्मीर का मुद्दा उठाया। “कई प्रस्तावों की स्वीकृति के बावजूद कश्मीर अभी भी कब्ज़े में है और वहाँ 80 लाख लोग फँसे हुए हैं।”, कहते हुए उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की निंदा करते हुए कहा कि वे कश्मीर विवाद पर ध्यान नहीं दे सके।

इसके कुछ देर बाद ही दुनिया भर के मुस्लिमों, पलीस्तीन से कश्मीर तक, के कल्याण की चिंता करने वाले तुर्की के राष्ट्रपति की सराहना में #OurVoiceErdogan (#आरवॉइसएर्दोगन) ट्रेंड होने लगा।

तुर्की-पाकिस्तान मित्रता

भारत और तुर्की के संबंधों में औपनिवेशिक ताकतों से लड़ने के सामान्य संघर्ष है से उपजी सद्भावना भारत की स्वतंत्रता के बाद मित्रता का रूप नहीं ले सकी। लेकिन पाकिस्तान के साथ अलग कहानी है।

1941 में पाकिस्तान और तुर्की ने अनंत मित्रता का एक समझौता किया था। यह साझेदारी मूल रूप से इस्लाम पर आधारित थी। तुर्की और पाकिस्तान दोनों ही सुन्नी बहुल मुस्लिम देश हैं। पाकिस्तान की तरह तुर्की भी इस्लाम को विभिन्न संजातीय समूहों के बीच सहमति बनाने का एक साधन मानता है।

पाकिस्तान की रह मुस्लिम भाईचारा और राजनीतिक इस्लाम आधुनिक तुर्की की भी आधारशिला रही है। ऐतिहासिक रूप से तुर्की का दुर्व्यवहार और अंततः प्रथम विश्व युद्ध के बाद आर्मेनियाई ईसाइयों का नरसंहार पाकिस्तान के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ 1947 से संस्थानिक और धार्मिक कट्टरता के आधार पर किए गए दुर्व्यवहार से मेल खाता है।

तुर्की और पाकिस्तान का एक और ऐतिहासिक संबंध है जो भारत में ब्रिटिश शासन के समय स्थापित हुआ जब तुर्की ने अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के निर्माण में सहायता की थी।

प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत के मुस्लिमों ने गिरते उस्मानी साम्राज्य को संभालने के लिए सहायता भेजी थी जबकि भारत मित्र देशों के लिए लड़ रहा था। युद्ध में उस्मानी साम्राज्य की हार से भारत में खिलाफत आंदोलन सुरू हुआ जिसका उद्देश्य सभी भारतीय मुस्लिमों को अपने तुर्की भाइयों की सहायता के लिए एकजुट करना था।

गांधी के नेतृत्व और हिंदुओं को आंदोलन में सम्मिलित करने के प्रयास के बावजूद खिलाफत इस्लामी आंदोलन ही रहा। इसने मुस्लिम नेतृत्व के इस्लामी लक्ष्य को वैधानिक सिद्ध करने के लिए एक कट्टरवादी मंच की भूमिका निभाई। आज पाकिस्तान इस आंदोलन को अपनी स्थापना में एक महत्त्वपूर्ण कदम मानता है और अली भाइयों को अपना संस्थापक पिता।

तुर्की और पाकिस्तान शीत युद्ध के समय यूएस गुट के सदस्य बन गए थे और बगदाद समझौते में सम्मिलित हो गए थे जिसे सेंटनो यानी कि सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन के नाम से भी जाना जाता है।

दोनों ही क्रमशः साइप्रस और कश्मीर के प्रति पश्चिम की प्रत्यक्ष अनिच्छा से निराश हुए और 1964 में विकास के लिए क्षेत्रीय समन्वय (आरसीडी) का गठन किया। इस्लामी समन्वय संस्था (ओआईसी) का सदस्य होने के नाते तुर्की कश्मीर पर पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है।

उसने बाबरी मस्जिद का मुद्दा उठाने के साथ-साथ भारत के परमाणु परीक्षण का विरोध भी किया था। इसने पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण को भारत के परमाणु कार्यक्रम की प्रतिक्रिया बताया था और परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) में उसकी सदस्यता की सिफारिश भी की थी।

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था ने भले ही भारत के प्रति तुर्की के रुख को नर्म किया हो लेकिन यूएन में कश्मीर मुद्दे पर एर्दोगन का कथन दर्शाता है कि आने वाले समय में भी यह मुद्दा दोनों देशों के बीच एक दरार की तरह रहेगा।

तुर्की और दक्षिण एशिया में जिहाद

पाकिस्तान के अलावा तुर्की के भी जमात-ए-इस्लामी (जेई), पाकिस्तान की सबसे पुरानी धार्मिक पार्टी, से घनिष्ठ संबंध हैं। शरिया लागी करने के उद्देश्य के साथ चलने वाली इस इस्लामी पार्टी ने जिया-उल-हक़ के शासनकाल में “वैचारिक और राजनीतिक बाजु” की भूमिका निभाई थी।

हिजबुल मुजाहिद्दीन समेत विभिन्न आतंकी समूहों से भी जेई के निकट संबंध हैं। मुजाहिद्दीन को कश्मीर में जिहाद करने के उद्देश्य से 1990 में स्थापित जेई का आतंकी समूह माना जाता है।

मुस्लिम विश्व का राजनीतिक नेतृत्व करने की महत्वाकांक्षा के साथ एर्दोगन ने जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश और अराकन रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (अरसा) को धनराशि और हथियार भी दिए हैं, कुछ रिपोर्ट दावा करती हैं।

2016 में तुर्की ने जमात के एक अपराधी को मृत्युदंड देने पर बांग्लादेश की निंदा की थी। जैसा 1990 के दशक में पाकिस्तान ने अफगान शरणार्थियों के साथ किया, वैसे ही तुर्की भी रोहिंग्या शरणार्थी बच्चों के लिए मक़ताब चलाकर उन्हें “अल्लाह के दुश्मनों” का पाठ पढ़ा रहा है। और यह कि रोहिंग्या अपनी भूमि म्यान्मार तब ही लौट सकते हैं जब “इन गैर-इस्लामी शक्तियों” को “अल्लाह के फरिश्ते” हराएँगे।

2018 की एक रिपोर्ट में आउटलुक  ने एर्दोगन को “कश्मीरी अलगाववादियों का लेटेस्ट चहेता” कहा था। हुर्रियत नेता मिरवाइज़ उमर पारूक़ ने एर्दोगन के पुनर्निर्वाचन की सराहना करते हुए उन्हें “कश्मीरी अस्तित्व की लड़ाई का प्रचंड” बताया था।

फारूक़ ने आगे कहा कि पाकिस्तान के बाद तुर्की ही एकमात्र देश है जो “कश्मीरी अस्तित्व का एक स्वर में समर्थन” करता आ रहा है। साथ ही उसने तुर्की को ओआईसी का सबसे मुखर देश भी बताया था।

“पलीस्तीन हो या कश्मीर”, मिरवाइज़ ने कहा, “तुर्की ने एर्दोगन के नेतृत्व में दमन किए हुए लोगों के लिए आवाज़ उठाई है।” जमात-ए-इस्लामी नेतृत्व ने भी एर्दोगन को “मुस्लिम विश्व का एक महान नेता” और तुर्की को “उम्माह के लिए आशा की किरण” कहा था।

भविष्य में क्या

जहाँ एक तरफ भारत की अर्थव्यवस्था के आगे तुर्की का नर्म रवैया है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम विश्व का नेता बनने की एर्दोगन की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा इसमें बाधक बन सकती है। इसी महत्वाकांक्षा के चलते तुर्की के नेता ने उइगर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए चीन से आर्थिक संबंधों के बावजूद उसकी निंदा की थी।

दक्षिण एशिया में रणनीतिगत पहुँच बढ़ाने के लिए प्रॉक्सी समूहों के प्रयोग के लिए इसका लोभ और मदरसा व धार्मिक संस्थाओं को हथियार की तरह उपयोग करना भी भारत के विरुद्ध है।

भारत और तुर्की के लोगों का आपसी संबंध पाकिस्तान-तुर्की के लोगों के आपसी संबंध से कम है। पाकिस्तान तुर्की के सिनेमा और टीवी के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। शरीफ परिवार से एर्दोगन के व्यक्तिगत संबंध भी हैं। तुर्की में जहाँ पाकिस्तानियों को “भाई” माना जाता है, वहीं भारतीयों को “गौ पूजक” माना जाता होगा।

तुर्की की भौगोलिक-राजनीतिक वास्तविकताएँ यह हैं कि वह यूएस से दूर जा रहा है, सऊदी अरब से उसकी शत्रुता है जो कि यूएस का मित्र देश है। ईरान के साथ ट्रंप के व्यवहार के कारण इस्लामी दुनिया में विरोध और तुर्की की राजनीति का इस्लामीकरण भारत के प्रतिकूल है जिससे वहाँ आर्थिक मंदी के आसार बढ़ेंगे।