भारती
तुगलक के 1 लाख सैनिकों का पहाड़ी हिंदुओं ने किया सफाया- भारत में इस्लाम भाग-32

ये कुछ ऐसी कहानियाँ हैं, जिन्हें जान-बूझकर हमारे इतिहास से गायब रखा गया। अलाउद्दीन खिलजी के बाद मोहम्मद तुगलक दिल्ली में दूसरा ऐसा इस्लामी कब्ज़ेदार है, जिसे खिलजी से भी ज्यादा समय तक कब्ज़ा बरकरार रखने का मौका मिला।

खिलजी ने 20 साल तक हिंदुस्तान को रौंदा। तुगलक को 26 साल मिले। वह 1325 में अपने बाप गयासुद्दीन तुगलक को रास्ते से हटाकर तख्तासीन हुआ और 1351 में मर गया। इस दौरान 20 से ज्यादा स्थानों पर लगातार विद्रोह हुए हैं, जिन्हें दबाने के लिए उसने लगातार कत्लेआम किए।

यह समय पूरे भारत में खूनखराबे से भरा हुआ है। हर जगह बुरी तरह सताए जा रहे हिंदुओं ने भी संगठित विरोध किए हैं और मुँह तोड़ जवाब दिए हैं। हिमाचल-उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में हमला करने गई तुगलक की फौज का तो सफाया ही कर दिया गया था। मूल दस्तावेजों में इसे कराजिल पर्वत कहा गया है।

आइए 1337-38 के दौर में चलते हैं। हमारे साथ कई भरोसेमंद सूत्र हैं, जो पल-पल की खबर देंगे। तुगलक को दिल्ली पर कब्ज़ा जमाए 12 साल हो चुके हैं। अपनी कई सनक भरी योजनाओं के लगातार नाकाम होने के दौर में उसने चीन तक कब्ज़ा करने की एक और योजना बनाई है।

लुटेरों की एक बड़ी फौज तैयार की गई और उसे हिमाचल के पहाड़ों के पार जाने का हुक्म दिया गया। इसका लीडर बनाया गया खुसरो मलिक को, जो उसका बहनोई भी है। हालांकि तुगलक के करीबी सलाहकारों ने इस हिमाकत से रोकने की कोशिश की लेकिन उस सनकी सुलतान के दिमाग में चीन तक कब्ज़ा करने का भूत सवार है।

इतिहास में फिरिश्ता के नाम से मशहूर मोहम्मद कासिम हिंदू शाह हमारे साथ लाइन पर है। आइए देखते हैं, उनके पास क्या डिटेल है- सुलतान का आदेश है कि सबसे पहले हिमाचल पर कब्ज़ा कर लें। जहाँ ज़रूरत समझें किला तैयार कर आगे बढ़ते जाएँ जब तक कि चीन की सरहद तक न पहुँचें। वहाँ एक बड़ा किला बनाकर वहीं ठहर जाएँ। हिमाचल पर कब्ज़े के बाद दरबार में प्रार्थना पत्र भेजें। जब यहाँ से मदद मिल जाए तो चीन पर अधिकार जमाने की कोशिश करें।

कुछ पदाधिकारियों ने स्पष्ट कहा कि हिंदुस्तान के बादशाहों का वहाँ की एक हाथ भूमि पर भी कब्ज़ा मुमकिन नहीं है। लेकिन सुलतान ने एक नहीं सुनी। मजबूर होकर खुसरो मलिक सेना के साथ निकला। वे पहाड़ों तक पहुँचे। सही जगहों पर किले बनाए।

जब वे हिमाचल के पहाड़ों का बहुत बड़ा भाग पार करके चीन की सीमा के शहरों में पहुँचे तो चीन का वैभव और शानोशौकत देखकर हैरान रह गए। वे उनके मजबूत किलों, संकरे रास्तों और रसद की कमी का ख्याल करके आतंकित हो गए। उन्होंने सब छोड़कर लौटने का फैसला किया।

यह बिल्कुल वही दृश्य है, जो हमने बख्तियार खिलजी के समय उसकी तिब्बत पर कब्ज़े की मुहिम के समय देखा था। वह भी पहाड़ों की यात्रा करके लौटते समय असम के हिंदू राजा की सावधानी और साहस के चलते बरबाद हो गया। उसकी फौज नष्ट हो गई और वह भी लुटीपिटी हालत में देवकोट नाम की जगह तक आ पाया। इसके बाद मर गया। दिल्ली पर इस्लामी कब्जे के बाद चीन तक कब्जे की यह पहली कोशिश है। तुगलक की पस्तदम फौज हिमाचल के पहाड़ी रास्तों से लौटने का फैसला करती है।

आगे का हाल फिरिश्ता से सुनिए- “बारिश का मौसम शुरू हाे गया। जिन रास्तों से यह फौज आई थी, वे जलमग्न होकर गायब ही हो गए। उन लोगों को दूसरे रास्ते पता नहीं थे। वे बुरी तरह परेशान होकर पहाड़ी किनारों से आगे बढ़े। पहाड़ी गाँवों के लोगों ने अब इन लुटेरों को निशाना बनाया। मुसलमानों को मारकर उन्हें लूटा। फौज के सामने अकाल के हालात बन गए।

एक हफ्ते बाद मुसलमान एक बड़े मैदान तक पहुँचे तो राहत की उम्मीद नजर आई। बदकिस्मती से उस रात तेज़ बारिश होने लगी। फौज के शिविर डूब गए। घोड़ों को तैरकर निकलना कठिन हो गया। खुसरो मलिक समेत सारे लोग 15 दिनों में खाने के सामान की कमी के चलते बरबाद हो गए।

हिमाचल के लोगों को जब इनके हाल पता चले तो वे नौकाओं में सवार होकर आए खुसरो मलिक द्वारा तैनात लोगों को कत्ल कर दिया और अत्यधिक धन-संपत्ति और हथियार उनके हाथ लगे। कोई नामोनिशान नहीं छोड़ा गया। बहुत थोड़े से लोग ही बचकर लौट पाए। अब वे मोहम्मद तुगलक की तलवार के पंजे में फँस गए।”

पूरी सेना का पहाड़ों में सर्वनाश हो गया

तुगलक का करीबी सलाहकार है जियाउद्दीन बरनी। वह बताता है कि यह सुलतान के दिमाग की छठी बड़ी योजना थी कि चीन और हिंदुस्तान के बीच के इस पहाड़ी इलाके पर इस्लामी परचम फहराए। वह लिखता है कि इस विचार से एक बड़ी सेना प्रतिष्ठित अमीर और नामी सेना नायकों की अधीनता में कराजिल पर फतह के लिए तैनात हुई। सुलतान के हुक्म से सेना ने दिल्ली से कूच किया। बरनी के शब्द हैं-

“सेना ने कराजिल की तरफ प्रस्थान किया और वहाँ दाखिल होकर जगह-जगह अपने पड़ाव डाले। कराजिल के हिंदुओं ने वापसी के मार्ग की घाटियों पर अधिकार जमा लिए। इस प्रकार समस्त सेना का पूरी तरह विनाश हो गया। इतनी बड़ी सुव्यवस्थित और चुनी हुई सेना में से सिर्फ 10,000 सवार लौट सके।

इस हैरतअंगेज घटना से दिल्ली की सेना को बेहद नुकसान पहुँचा। इतनी बड़ी बदइंतजामी और नुकसान की किसी तरह से भरपाई नहीं हो सकी। सुलतान मोहम्मद की महत्वाकांक्षा से हुकूमत में ऐसी गड़बड़ी और खजाने को भारी नुकसान हुआ। खजाने का विनाश तो हुआ ही सुव्यवस्थित राज्य भी हाथ से निकल गया।

यह कराजिल पर्वत का इलाका था कहाँ? एक विचार यह है कि यह कुमायूं का पुराना नाम कूर्मांचल है। इसलिए यह गढ़वाल और कुमायूं यानी वर्तमान उत्तराखंड के हिमालय का पहाड़ी इलाका होना चाहिए। लेकिन कुछ इतिहासकारों ने स्पष्ट रूप से हिमाचल और कराचल को एक ही बताया है।

जो भी हो, इस घटना का जिक्र तुगलक के समकालीन हमारे सब साथियों ने किया है। दिल्ली से दौलताबाद के बीच आबादी को ले जाने के समय के भुक्तभोगी एसामी के मन में तुगलक की सनकी योजनाओं को लेकर एक तरह का गुस्सा झलक रहा है। हिमालय के पहाड़ों में अपनी ही फौज की बरबादी पर एसामी ने गजब की जानकारी दी है। देखिए वह क्या बता रहा है-

एक दिन सुलतान सुबह के वक्त एक बाग की सैर करने निकला। लौटते समय बाज़ार से गुज़रा। वहाँ उसे बड़ी चहल-पहल मिली। लोग खरीदारी में लगे थे। उसने अपने दिल में कहा कि यह शहर तो अब भी आबाद है। इन लोगों का किसी तरह विनाश कराना चाहिए। वह राजधानी पहुँचा।

दूसरे ही दिन हुक्म दिया कि तिलपट में बारगाह सजाई जाए। सेना ने बाहर शिविर लगाए। उसने अपने भागिनेय खुसरो मलिक को हुक्म दिया कि वह दिल्ली से कराचिल के पहाड़ों की तरफ रवाना हो। सेना को उन गुफाओं की तरफ ले जाए, जो हमेशा कांटों से भरी हैं। वहाँ ले जाकर वह सेना को खत्म करा दे, जिससे कुछ तो आबादी कम हो। सुलतान ने उसके साथ करीब 1 लाख सवार रवाना किए।

काफिरों की कारीगरी से हैरत में है एसामी

एसामी ने सीधी-सपाट जानकारी नहीं दी है। वह इसे सुलतान की सोची-समझी आत्मघाती योजना बता रहा है। कत्लेआम और खूनखराबा तुगलक की रोजमर्रा की आदत थी। ऐसा दिन नहीं जाता था जब उसने बड़े पैमाने पर किसी न किसी कारण से किसी न किसी का खून न बहाया हो। इसलिए एसामी की बात बेबुनियाद भी नहीं हो सकती। उसका ब्यौरा है दिलचस्प। देखिए आगे क्या बताया है-

पहाड़ के नीचे एक नदी थी, जिसके चारों तरफ काँटे ही काँटे थे। हिंदुस्तान के कारीगरों ने उसमें एक हैरतअंगेज कारीगरी की थी। वहाँ झरने के मुँह पर एक विचित्र कुंजी थी। वहाँ बहुत से लोग रात-दिन तैनात रहते थे।

जब तक वह कुंजी बंद रहती थी, वहाँ मैदान रहता था और जब वह खोल दी जाती थी तो वहाँ नदी नज़र आने लगती थी। जब सेना उस नदी को पार करके गुफाओं और पहाड़ों में पहुँची तो हिंदुओं ने सेना को पहाड़ों में दाखिल हो जाने दिया। जब सेना पहाड़ों में पहुँच गई तो हिंदू उन पहाड़ों से उबल पड़े और शाही सेना का रास्ता राेक दिया। सुना है कि एक लाख में से 5-6,000 सवार ही लौट पाए।

जब वे लोग सुलतान के पास पहुँचे तो उसने गुस्से में कहा कि तुम लोग जिंदा लौटकर आए क्यों हो? तुमने भी गुफाओं में अपने प्राण क्यों नहीं त्याग दिए? तुमने अपने साथियों को खतरे में डाल दिया। इस अपराध में सुलतान ने उनके भी सिर कटवा डाले।”

एक भारी-भरकम फौज की तबाही से बचकर आए अपने ही 5-6,000 या 10,000 लोगों के सिर काटे गए हैं। इस खबर के साथ ही एसामी ने सुलतान के अगले आदेश का भी ज़िक्र किया है- “उसने इंसानों का शिकार करने वाले अपने अवानों को आम लोगों की हत्या के लिए भेजा। उसने हुक्म दिया कि मालदार लोगों से दौलत हासिल की जाए, जहाँ कहीं कोई सरदार मिले, उसका सिर काट दिया जाए और जहाँ कहीं कोई धनी मिले, उसे दरिद्र बना दिया जाए। हर जगह लोग बंदी बनाए जाने लगे और लोगों के घर आग के हवाले किए जाने लगे।

 काफिरों ने 1 लाख फौज को तबाह कर दिया

और आइए एक बार फिर इब्नबतूता से बात करते हैं। उसके अनुसार कराचिल का इलाका कुमायूं-गढ़वाल का ही है। वह अपने सफरनामे का हर बारीक ब्यौरा दर्ज करता है। उसने लिखा है

यह लंबा-चौड़ा पहाड़ी इलाका है। इसकी लंबाई तीन महीने के सफर की है। दिल्ली से इसकी दूरी 10 दिन की है। यहाँ का राजा काफिर राजाओं में सबसे ताकतवर है। सुलतान ने मलिक नुकबिया को 1 लाख घुड़सवारों के साथ बड़ी तादाद में पदाति देकर यहाँ जंग के लिए रवाना किया। उसने पहाड़ों के नीचे जिदया नगर पर कब्ज़ा जमा लिया।

वहाँ के लोगों को बंदी बनाया गया। शहर को जलाकर राख कर दिया गया। काफिर पहाड़ों के ऊपरी हिस्सों में चले गए और अपनी ज़मीन, धन-दौलत और खजाना छोड़ गए। इस पहाड़ी इलाके में केवल एक ही रास्ता है। नीचे एक घाटी है, ऊपर पहाड़ हैं। घोड़ों की सिर्फ एक कतार ही जा सकती है। मुसलमान रास्ते पर चढ़ते चले गए। पहाड़ों के ऊपर वरंगल शहर पर भी कब्ज़ा जमा लिया गया।’

जिन शहरों के नाम इब्नबतूता ने लिखे हैं, आज उनके कोई वजूद नहीं हैं। हो सकता है कि वे आज भी अस्तित्व में हाें, लेकिन सदियों बाद उनके नाम घिसकर दूसरे हो गए हों। हो सकता है कि अभी कहीं ज़मीन के नीचे से इनके अवशेष खोजे जाने बाकी हों। यह भी मुमकिन है कि इब्नबतूता ने इनके नाम लिखने में कोई गफलत की हो।

जो भी हो, लेकिन यह बात निर्विवाद है कि पूरे हिंदुस्तान में तबाही मचा रहे बेफिक्र तुगलक ने हिमालय के पहाड़ी हिंदू राज्यों पर कब्ज़े की नीयत से एक बड़ी फौज भेजी थी, जो बुरी तरह तबाह हो गई थी। इसके आगे इब्नबतूता नई जानकारी यह दे रहा है कि इस विकट हमले के बीच से दिल्ली और पहाड़ों के बीच खतो-किताबत हुई। पढ़िए उसने अपनी डायरी में क्या लिखा है-

फतह के समाचार सुलतान तक भेजे गए। सुलतान ने एक काज़ी और खतीब के ज़रिए हुक्म भेजा कि वे वहीं रुकें। लेकिन तभी बारिश शुरू हो गई। सेना में एक बीमारी फैल गई। सैनिक परेशान हो गए। घोड़े मर गए। धनुष बेकार हो गए।

अमीरों ने सुलतान को खत लिखकर लौटने की इजाज़त मांगी और बारिश के बाद फिर हमला करने का सुझाव दिया। सुल्तान ने इजाज़त दे दी। अमीर नुकबिया ने पूरा खजाना और जवाहरात पहाड़ों से नीचे ले जाने के लिए बांट दिया।

काफिरों को जब इसकी जानकारी मिली तो वे गुफाओं और संकरे रास्तों पर घात लगाकर बैठ गए। वे बड़े-बड़े दरख्त काटकर रास्तों पर लुढ़का देते थे। बहुत लोग मारे गए। शेष सैनिक बंदी बना लिए गए। काफिरों ने खजाने पर कब्ज़ा कर लिया। धन-दौलत, घोड़े, हथियार सब छीन लिए। सेना में सिर्फ तीन लोग ही बचे-सरदार नुकबिया, बदरुद्दीन और दौलत शाह। इससे हिंदुस्तान की सेना शक्तिहीन हो गई।

रूपकुंड में मिले हज़ारों कंकाल किसके हैं?

भारत की अनकही रक्तरंजित कहानियों में से एक है तुगलक की फौज का हिमालय के पहाड़ों में मारा जाना। हम नहीं जानते कि बिल्कुल सही स्थान कौन-सा होगा, जहाँ तुगलक के हज़ारों लुटेरे हमलावरों को पहाड़ी हिंदुओं ने निशाना बनाया होगा और वे बारिश के कारण आई तबाही में डूब मरे होंगे। वह कौन-सी नदी है, जिसे किसी कुंजी से मैदान बना दिया जाता होगा?

लेकिन उत्तराखंड में 1942 में रूपकुंड नाम की एक रहस्यमयी जगह सामने आई, जहाँ बड़ी तादाद में इंसानी खोपड़ियाँ और हडि्डयाँ मिलीं। नेशनल ज्योग्राफिक की टीम ने भी इस झील में मिलने वाले कंकालों पर अध्ययन किया है। इनके डीएनए परीक्षण भी हुए हैं और ये करीब 1,000 साल पुराने ही पाए गए हैं।

रूपकुंड झील चमोली जिले की पहाड़ी ऊँचाइयों पर आज भी है और रहस्य-रोमांच की तलाश में निकले लोगों को आमंत्रित करती है। यह खोजा जाना अभी बाकी है कि क्या यह वही रास्ता था, जहाँ तुगलक की फौज को हिंदुओं ने घेरकर मारा था और क्या ये कंकाल उसी की लुटेरी फौज के हैं?

पिछला भाग- शिहाबुद्दीन के ब्यौरों में देखें कुओं-झीलों में छुपाया गया सोना, दिल्ली में मुफ्तखोरी- भाग 31

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com