भारती
सत्यवादिता संसार में प्रतिष्ठा और क्रोध पीड़ा देता है- कुरल भाग 12

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए हुए कुरल की शृंखला में पढ़ें सत्यवादिता और क्रोध-नियंत्रण के विषय में।

सत्यवादिता

1. सत्यवादिता वो होती है जब किसी की बोली ऐसी हो कि वह संसार में किसी को हानि न पहुँचाए।

वह सत्य सत्य नहीं है यदि वह किसी गलत चीज़ का समर्थन करता है। सदाचार वह होता है जिसमें सत्यावादिता के साथ हानिहीनता भी हो। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि सत्य कमतर है। लेकिन सत्य को हानिकारक न होने की परीक्षा से भी गुज़रना होता है।

2. यदि असत्य ऐसा हो जो दोषपूर्ण न हो और किसी का भला करे तो उसे सत्य के समतुल्य माना जा सकता है।

यह चिकित्सक के मामले में हो सकता है जहाँ वह रोगी को ढाढस बंधाने के लिए असत्य कह सकता है जिससे संभवतः रोगी का भला होगा और किसी को पीड़ा नहीं पहुँचेगी। इसी प्रकार के कुछ अन्य मामलों को अपवाद मानते हुए कवि कहते हैं कि सत्यवादिता का आधार अहिंसा है।

कुछ लोग दूसरों को पीड़ा पहुँचाने को सबसे बड़ा पाप मानते हैं और इसी आधार पर अच्छे-बुरे का निर्णय करते हैं। कुछ के लिए सत्य ही सबसे बड़ा कर्तव्य है और इसका उल्लंघन करना ही पाप होता है। वे इसे दूसरों को पहुँचने वाली पीड़ा से जोड़कर नहीं देखते हैं।

प्रायः दूसरे को पीड़ा न पहुँचाने से आसान सत्य बोलना होता है। पीड़ा न पहुँचाना ही असली परीक्षा होती है। हालाँकि जो पीड़ा न पहुँचाने को सत्यवादिता मानते हैं, उन्हें सत्य में ढील देने वाला नहीं समझना चाहिए।

3. हमारे अनुभव में जितनी बातों की पुष्टि हो चुकी है, उनमें सबसे मज़बूती से स्थापित सत्य का आधार है। सत्य से अधिक अमूल्य कुछ नहीं है।

4. यदि आप विचार और शब्दों में सत्यवादी हैं तो आप तपस्या करने वालों और उपहार देने वालों से श्रेष्ठ हैं।

5. सत्यवादिता संसार में आपको प्रतिष्ठा तो दिलाती ही है, साथ ही तपस्या की शारीरिक पीड़ा के बिना वरदान भी देती है।

6. पानी बाहरी वस्तुओं को साफ करता है, जबकि हृदय को साफ करने का काम सत्यवादिता करती है।

7. पवित्र मनुष्य जिस प्रकाश की आशा करते हैं, वह दीप नहीं दे सकते हैं। सत्य का प्रकाश ही उनके पथ को आलोकित करता है।

क्रोध के विरुद्ध

8. वास्तविकता में वही क्रोध से मुक्त है जो तब भी क्रोध नहीं करता जब गलती करने वाला उसके अधीन हो। जहाँ वह कुशलतापूर्वक प्रतिकार नहीं कर सकता, वहाँ उसका क्रोध हानि नहीं पहुँचा सकता लेकिन मायने वह रखता है वह अपने क्रोध को नियंत्रित कर सकता है या नहीं।

9. सब जानते हैं कि वरिष्ठों के साथ व्यवहार करने में आपा नहीं खोना चाहिए। लेकिन जहाँ अपने अधीन कार्यरत व्यक्तियों पर क्रोध किया जाता है, वह सभी अपराधों में सबसे बड़ा है।

क्रोध से पीड़ा पहुँचती है और जीवन के एक ताज़ातरीन भाग में भी दुर्भाव भर जाता है। यह दूसरे को दुख नहीं देता है बल्कि स्वयं को ही पीड़ा पहुँचाता है। यह पाप है लेकिन जब यह दूसरे को दुख देकर दुर्भाव को और बढ़ाता है तब पाप और भी बड़ा हो जाता है।

10. क्रोध से ही सारे पाप उपजते हैं। किसी के द्वारा भी उकसाए जाने पर उस बात को भूल जाना चाहिए।

11. क्या मानव जाति के लिए क्रोध से बड़ा कोई शत्रु है जो हँसी-खुशी को नष्ट कर देता है जो कि पृथ्वी पर सबसे बड़े वरदान हैं।

तिरुवल्लुवर हमारी मूल्यों की समझ का आह्वान करते हुए कहते हैं कि जो वस्तु सुख को नष्ट करती हो, उसका क्या मूल्य?

12. क्रोध से खुद को बटाकर स्वयं की रक्षा करनी चाहिए। जिस क्रोध पर काबू नहीं पाया जाता, वह आप ही को नुकसान पहुँचाती है।

यहाँ कवि आपके हित की ही बात कर रहे हैं।

13. जो व्यक्ति क्रोध को लाभकारी और योग्य मानकर उसे उत्पन्न करता है, वह उसी प्रकार पाप का भागीदार बनता है जैसे ‘आ बैल मुझे मार’ मुहावरे में दर्शाया गया है।

ऐसा करके व्यक्ति स्वयं को ही नुकसान पहुँचाता है।

14. भले ही आपके साथ कितना भी बुरा किया गया हो लेकिन संघर्ष करना और अपने क्रोध को नियंत्रित करके रखना अंत में आप ही को लाभ पहुँचाएगा।

यहाँ कवि इन सीखों को व्यवहार में लाने से उत्पन्न मानसिक समस्याओं का उल्लेख कर रहे हैं और यही तिरुवल्लुवर की विशेषता है।

15. क्रोध न करने से कुछ नहीं खोता। दूसरी ओर आप पाएँगे कि अपने मस्तिष्क को क्रोध से मुक्त रखकर आप प्राप्य वस्तुओं को जल्दी प्राप्त कर सकेंगे।

यह एक आत्म-नियंत्रित व्यक्ति का अनुभव है।

अगले अंक में जारी…

पिछला भाग- पीड़ा को धैर्यपूर्वक झेलना, दूसरों को पीड़ा न पहुँचाना ही सच्ची तपस्या है- कुरल भाग 11