भारती
तीन तलाक हिंदू हितों का मुद्दा नहीं है, इस्लाम की ताकत के लिए थीं रूढ़िवादी प्रथाएँ
शंकर शरण - 2nd August 2019

कुछ लोग तीन तलाक विधेयक का संसद से पास होना ‘हिंदुत्व की जीत’ बता रहे हैं। यह बहुत बड़ा भ्रम है। मुसलमानों के बीच तीन तलाक प्रथा खत्म करने से केवल मुस्लिम स्त्रियों को राहत मिलेगी। हिंदू हित मुद्दे यहाँ संविधान की धारा 25-31 को सभी समुदायों के लिए समानतः लागू करने से जुड़े हैं।

तीन तलाक से संबंधित सारी बात केवल मुस्लिमों के हित-अहित से जड़ी है। कुछ लोग इसे मुसलमानों को चोट पहुँचाना, तो कुछ इसे मुसलमानों के लिए फायदेमंद बता रहे हैं। अलग-अलग नज़रिए से दोनों बातें सही हैं। सिर्फ मुस्लिम मर्दों की नज़र से देखें तो जब चाहे औरत को छोड़ देने और नई ले आने की सुविधा उनसे छिन रही है। यह कोई बुनियादी इस्लामी रिवायत भी नहीं है। पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों में तीन तलाक को मान्यता नहीं है।

पर मुस्लिम स्त्रियों की दृष्टि से तीन तलाक का खात्मा एक उपलब्धि है। दरअसल, भारत में मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति पहले भी काफी अच्छी थी। उन्हें तरह-तरह की लाचारी में जकड़ने का काम पिछले 100 सालों में ही हुआ है। यहाँ मुस्लिम पर्सनल लॉ ही हाल की चीज है। भारत में पारंपरिक रूप से सब को धार्मिक स्वतंत्रता रही है। किसी मुसलमान को भी इस्लाम छोड़ दूसरा धर्म अपनाने तक का अधिकार हासिल था। यह भारतीय समाज की विशेषता थी जिस में व्यक्ति कोई भी और कितने भी धर्म-विश्वास रख या छोड़ सकता था।

डॉ. अंबेडकर के अनुसार सन् 1939 तक भारत में कानून था कि यदि कोई विवाहित मुस्लिम महिला इस्लाम छोड़ देती थी, तो उसका विवाह स्वतः भंग हो जाता था और ‘वह अपने नए धर्म के किसी भी पुरुष से विवाह करने के लिए स्वतंत्र हो जाती थी।’ मगर कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने मुसलमानों को भारतीय परंपरा से तोड़कर हू-ब-हू अरबी इस्लाम से जोड़ने का इरादा शुरू किया। इसी में अंग्रेजों पर दबाव डालकर पुराना कानून रद्द कराया गया।

अर्थात्, यहाँ मुस्लिम स्त्रियों की दशा सदा इतनी बुरी नहीं थी। वह फिर सुधर सकती है। खासकर, जब मुस्लिम स्त्रियाँ तीन तलाक, चार बीवियों और हलाला जैसी घृणित प्रथाओं के विरुद्ध खुद खड़ी हो रही हैं। अनेक मुस्लिम पुरुष भी स्थिति सुधारने के पक्ष में हैं। वे जानते हैं कि इस्लामी निकाह, तलाक या निकाह के नियम मनमाने हैं।

यह समझने के लिए बड़ी संवेदना की ज़रूरत नहीं कि मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति बेहद अपमानजनक है। इधर यहाँ शाह बानो से लेकर अभी तक जितने मामले हुए, सभी में मुस्लिम स्त्री का मान-सम्मान गायब था। प्रत्येक स्त्री शौहर या मौलानाओं द्वारा संपत्ति के टुकड़े की तरह तय की गई। क्योंकि इस्लामी निकाह में केवल पुरुष-केंद्रित है। उस के सुख, भोग तथा उम्मत की संख्या बढ़ाने के सिवा कोई अन्य उद्देश्य उस में नहीं मिलता। इसीलिए एकतरफा मनमाना तलाक सामान्य समझा जाता है।

मुस्लिम स्त्रियों की दुर्गति इस्लामी व्यवस्था के कारण है। क़ुरान में औरतों को मर्दों की खेतियाँ बताया गया है, ‘जिसे वह जैसे चाहें जोतें’ (2-223)। बीवियों के अलावा लौंडियाँ भी भोग्या हैं (4-24)। कुरान में एक अध्याय है ‘अल तलाक’ जिस में मर्दों द्वारा तलाक देना मामूली, रोजमर्रे काम जैसा लगता है। अन्य अध्याय ‘अल-निसा’ में भी यही भाव है। जब चाहो एक बीवी छोड़ दूसरी ले आओ (4-20), केवल परित्यक्ता को पहले दिए गए उपहार मत छीनना।

यानी औरत मानो संपत्ति भर है जिसे मर्द लोग मनचाहे ला, छोड़, बाँट सकते हैं। किसी को अपनी स्त्री उपहार में दे देने के लिए भी तलाक दे सकते हैं! एक बार, मदीना में प्रोफेट मुहम्मद के साथी अब्दुर्रहमान को साद ने मजहबी भाई बनाया। जब दोनों खाने बैठे तो मेजबान ने कहा, ‘मेरी दोनों बीवियों को देख लो, और जिसे पसंद करो, ले लो।’ उसी वक्त एक बीवी को तलाक दे कर उपहार में भेंट कर दिया गया।

वही व्यवहार आज भी मुस्लिमों के लिए ‘इस्लामी कानून’ बताया जाता है! यह केवल निकाह और तलाक की बात नहीं। कई अन्य स्थितियाँ भी बड़ी त्रासद हैं, जिन से मुस्लिम औरतों पर स्थाई आतंक रहता है। हलाला, बहुपत्नी प्रथा, मुताह, स्त्री-खतना (इन्फ्यूबलेशन), आदि- सब की सब क्रूर प्रथाएँ हैं।

इसलिए, जब स्वयं मुस्लिम स्त्रियाँ अपने सम्मान के लिए खड़ी हो रही हैं तो समर्थन देना चाहिए। मध्ययुगीन इस्लामी कायदों को विवेक से परखना चाहिए। आखिर मुसलमान भी मनुष्य पहले हैं। उनका मनुष्य होना बदला नहीं जा सकता। उनका मजहब, विश्वास, मतवाद, विचारधारा, राजनीति, आदि परिवर्तनीय हैं। इसे स्वीकारा, बदला, छोड़ा जा सकता है। यह पहले भी हुआ, अभी हो रहा है और आगे भी होगा।

अतः सोचना चाहिए कि कौन सी चीज मुसलमानों को दूसरों से अलग करती रहती है? वैसे भी, परिवर्तनशील जगत में हानिकारक रिवाज सदा नहीं चलते रह सकते। मुसलमानों के नेता जानबूझ कर असलियत से कतराते हैं, और केवल हिंदुओं, अमेरिकीयों, पश्चिमी सभ्यता, आदि की निन्दा करते रहते हैं। किंतु उन्हें अंततः वह देखना ही पड़ेगा जिस से वे बचते हैं। सचाई यही है कि कई इस्लामी रिवाज खुद मुस्लिमों के गले का पत्थर हैं।

मुसलमानों की समस्या स्वयं अपनी रूढ़ियों, इस्लामी कानूनों के साथ है। आम मुसलमान अपने उलेमा की तानाशाही झेलते हैं, जिनका डंडा शरीयत है। यह उन्हें मनुष्यता से दूर कर एक अलगाववादी मानसिकता में रखती है। दूसरों से अलग-थलग रख कर ही आम मुसलमानों को इस्लामी राजनीति का साधन बनाया जाता है।

इस दृष्टि से भी, मुस्लिम स्त्रियों को गैर-मुस्लिम स्त्रियों जैसा मान-सम्मान व अधिकार मिलना स्वागत योग्य है। अगले चरण में यह मुसलमानों को गैर-मुसलमानों जैसी मानसिक, बौद्धिक स्वतंत्रता मिलने की माँग में बदलना चाहिए। मुस्लिम स्त्रियों को समानता व सम्मान देना मुस्लिम पुरुषों को भी मुक्त करेगा। उनके बच्चों को बेहतर लालन-पालन मिलेगा। याद रखें, सताई, त्रस्त या परित्यक्ता स्त्रियों के बच्चों की मानसकिता भी स्वस्थ नहीं हो सकती। अतः मुस्लिम समुदाय में विवेकवान, सुधारवादी लोगों का आगे बढ़ना बहुत ज़रूरी है।

वैसे भी, इस्लामी निर्देशों की कई बुनियादी बातें पहले ही छोड़ी जा चुकी। जैसे गैर-मुस्लिमों के शासन में हरगिज न रहना, ‘हिजरत’ कर जाना, संगीत व चित्रकला जैसे ‘कुफ्र’ से दूर रहना, आदि। अब कोई मुस्लिम देश पूरी दुनिया को मुसलमान बनाने की नीति नहीं रखता। जबकि यह सब प्रोफेट मुहम्मद के निर्देश थे। इस प्रकार, सिद्धांत-व्यवहार में इस्लाम की नैतिक, वैचारिक पराजय तो बहुत पहले हो चुकी!

राजनीतिक भी। 50 वर्ष पहले तक दुनिया की किसी राजनीतिक पुस्तक या विमर्श में इस्लाम का उल्लेख फुटनोट में भी नहीं होता था। यानी, इस्लाम का बौद्धिक, तकनीकी, आर्थिक योगदान तो छोड़िए, राजनीतिक अस्तित्व भी शून्यप्राय था। तुर्की में सन् 1924 में इस्लामी ‘खलीफा’ की गद्दी और सत्ता खुद वहाँ के मुसलमानों ने खत्म की।

दरअसल, इस्लाम की गिरती वकत को बचाने के लिए यहाँ कट्टरपंथी मौलानाओं ने अपनी स्त्रियों की दुर्गति की। डॉ. अंबेडकर के अनुसार, यह इसलिए किया गया ताकि भारत में इस्लामी राजनीति की ताकत बढ़ाई जाए। यह राजनीति अपनी संख्या हिंदुओं से अधिक बढ़ाने का सचेत लक्ष्य रखती है। चाहे इसके लिए मुस्लिम स्त्रियाँ केवल बच्चे पैदा करने की मशीन बन कर रह जाएँ। इसे खारिज करना इस्लामियों को बुरा लग सकता है। किंतु मानवतावादियों, लोकतंत्रवादियों, सेक्यूलरवादियों द्वारा इस का स्वागत होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो, तो मतलब यही कि वे इस्लामी कट्टरपंथियों के हाथों खेल रहे हैं। यह हमारे देश-हित में नहीं है।