भारती
तिरुवल्लुवर बताते हैं सही स्थान और समय का महत्त्व, कौआ दिन में उल्लू को हरा देता है

प्रसंग- तमिल कवि तिरुवल्लुवर द्वारा तिरुकुरल में लिखे गए कुरलों का जो भावार्थ सी राजगोपालाचारी ने 14 जून 1969 के स्वराज्य पत्रिका अंक में प्रकाशित किया था, उसका हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है।

समय को पहचानना

1. क्या कोई भी कार्य असंभव है यदि सही समय पर सही तरीके अपनाए जाएँ?

2. जो राजा जीत की अभिलाषा रखते हैं वे आक्रमण करने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करते हैं।

3. ऊर्जा पर संयम लंबी छलांग से पहले पीछे लिए जाने वाले कदमों जैसा है।

4. बुद्धिमान व्यक्ति का क्रोध उकसावे पर तुरंत नहीं निकलता है बल्कि अंदर ही अंदर सुलगता है और समय आने पर ही बाहर निकलता है।

5. शत्रु के समक्ष शिष्टाचार न दिखाएँ बल्कि आज्ञाकारी विनम्रता अपनाएँ और जब समय आएगा तो आप शत्रु को अपने सामने झुकने पर विवश कर पाएँगे।

कुरल का व्यवहारिक और संतुलित ज्ञान निम्नलिखित दोहों में देखने को मिलता है जो ऊपर समय के विषय में कही गई बातों को और स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं।

6. अवसर आता है लेकिन कभी-कभी ही। यदि आपको महान व्यक्ति बनना है तो अवसर आते ही उसका लाभ लें।

7. समय पर कार्य करना सारस से सीखें जो शांति से प्रतीक्षा करता है और समय आने पर फूर्ती से काम करें।

रणनीति

8. जब तक आप विरोधी ताकतों को घेरने के लिए उपयुक्त स्थान न ढूँढ लें तब तक हमला न करें और शत्रु की क्षमता को कम आँकने की घातक गलती न करें।

9. भले ही आपका सैन्यबल अधिक और ऊर्जावान हो लेकिन रक्षात्मक तैयारियों को अनदेखा नहीं करना चाहिए क्योंकि वह लाभ आपकी बहुत तरह से सहायता करता है।

10. सैन्यबल कम होने के बावजूद यदि आप युद्ध के लिए उचित स्थान ढूंढें और बारीकी से सैन्य अभियान चलाएँ तो आप वैसे जीत सकते हैं जैसे आपके पास कोई बड़ी सेना हो।

11. कौआ दिन के समय में उल्लू को हरा देता है। जो राजा शत्रु के सैन्य अभियान को मात देना चाहता है, उसे सही समय चुनना चाहिए।

12. कितने भी मज़बूत पहियों का रथ हो लेकिन समुद्र पर नहीं चल सकता और पानी में तेज़ी से चलने वाली नाव ज़मीन पर नहीं चल सकती।

उपरोक्त दो दोहों में तिरुवल्लुवर समय और स्थान के महत्त्व को उजागर कर रहे हैं।

अगले अंक में जारी…

पिछला भाग- राज्य की संपन्नता, राजा की विशेषताओं और क्रिया के लिए सोच-विचार पर कुरल भाग-25