भारती
मुस्लिम राजनीति का सच सामने लाने के लिए छोटे ओवैसी को धन्यवाद

प्रसंग- विभाजन के बाद मुस्लिम राजनीति की बुनियादी मानसिकता को खत्म न करने के कारण ऐसी घटनाएँ सामने आती रहती हैं।

अकबरुद्दीन ओवैसी को धन्यवाद! कि उन्होंने देश के तमाम लिबरल वामपंथी बौद्धिकों के पाखंड को बेपर्दा कर दिया। गत 24 जुलाई को एक भाषण में उन्होंने भारतीय राजनीति के सच को सामने रखा। दुनिया को भारत की असली हालत दिखाई, जहाँ भेड़िए को पीड़ित और भेड़ को उत्पीड़क बताने का राजनीतिक प्रपंच चलता है। उन्होंने यहाँ उन नेताओं के गुमान को भी ठंडा किया, जो विकास की आड़ में मूल समस्याओं के मुँह चुराते हैं और समझते हैं कि कोई इसे नहीं समझ रहा। अंततः ओवैसी को इसलिए भी धन्यवाद कि हिंदुओं को भ्रम-मुक्त होकर विचार करने के लिए झकझोरा।

यह छोटे औवैसी आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) नेता असदुद्दीन ओवैसी के भाई हैं। उनकी बातों को किसी मामूली बदगुमान की बातें कह उपेक्षित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “आरएसएस वाले उनसे डरते हैं”; कि “मुसलमानों को शेर बनना होगा ताकि कोई चायवाला सामने खड़ा न हो सके”; कि ‘‘शहादत का जज़्बा आ जाएगा तो आरएसएस वाला हमारा कुछ नहीं कर पाएगा। दुनिया उसी को डराती है जो डरता है, और दुनिया उसी से डरती है जो डराना जानता है।”

ओवैसी ने अपनी 15 मिनट वाली धमकी फिर दुहराई। उन्‍होंने छः साल पहले एक बड़ी सभा में कहा था, “हम (मुसलमान) 25 करोड़ हैं और तुम (हिंदू) 100 करोड़ हो,  मगर 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो, देख लेंगे किसमें कितना दम है।” सचमुच हमें छोटे ओवैसी का आभारी होना चाहिए। वे एक झटके में सेक्यूलर-वामपंथी दुष्प्रचार की धज्जी उड़ा देते हैं, जिनके सामने आरएसएस-भाजपा पसीना-पसीना होते रहते हैं। दशकों से यहाँ वामपंथियों, गांधीवादियों और मिशनरियों ने यह बौद्धिक प्रपंच जमाया है कि यहाँ ‘अल्पसंख्यक डरे रहते हैं’ और संघ-भाजपा भारत के खलनायक हैं। सच्चाई इसके ठीक विपरीत है।

वस्तुतः छोटे ओवैसी कोई नई बात नहीं कह रहे। पहले भी मुस्लिम नेता ‘एक दिन के लिए पुलिस हटाकर देख लेने’ की चुनौती देते रहे हैं। आज़म खान और फारुख अब्दुल्ला भारतीय सेना की खिल्ली उड़ा चुके हैं। बड़े ओवैसी भी सरकार को चेतावनी देते रहते हैं। यह सब पिछले 100 साल से चल रही मुस्लिम राजनीति की अखंड परंपरा है।

मुहम्मद अली जिन्ना ने अगस्त 1946 में कलकत्ता में ‘डायरेक्ट एक्शन’ के दो दिन में 2,000 हिंदुओं का संहार करवाकर कांग्रेस को धमकाया था कि भारत-विभाजन करो, “चाहे तो केवल हिंदुओं को कत्लेआम और विनाश से बचाने के लिए ही।” सन् 1926 में मौलाना अकबर शाह खान ने पंडित मदन मोहन मालवीय को सार्वजनिक चुनौती दी थी कि ‘पानीपत का चौथा युद्ध’ आयोजित करें। उसमें यहाँ की तात्कालिक जनसंख्या अनुपात से 700 मुस्लिम रहें और 2200 हिंदू। मौलाना ने बाघमंड यहाँ तक कहा कि वे लड़ाई के लिए साधारण मुसलमान लाएँगे, पठान या अफगान नहीं, जिनसे हिंदू ‘प्रायः आतंकित रहते हैं।’ मौलाना के अनुसार 700 मुस्लिम 2,200 हिंदुओं को यूँ ही हरा देंगे।

लगभग उसी समय बड़े आलिम, सूफी और निजामुद्दीन दरगाह के प्रमुख ख्वाजा हसन निजामी ने कहा, ‘‘मुसलमान कौम ही भारत के अकेले बादशाह हैं। उन्होंने हिंदुओं पर सैकड़ों वर्षों तक शासन किया और इसलिए उन का इस देश पर अक्षुण्ण अधिकार है। हिंदू संसार में एक अल्पसंख्यक समुदाय हैं। उन्हें आपसी लड़ाइयों से ही फुरसत नहीं है। वे गांधी में विश्वास करते हैं और गाय की पूजा करते हैं। वे दूसरे के यहाँ पानी पीकर अपवित्र हो जाते हैं। हिंदू स्वायत्तशासन की न इच्छा-शक्ति रखते हैं और न उन के पास इस के लिए समय ही है। उन्हें आपसी लड़ाइयाँ ही लड़ने दें। दूसरे लोगों पर शासन करने की उन की क्षमता ही क्या है? मुसलमानों ने शासन किया है और मुसलमान ही शासन करेंगे।’’

यही मुस्लिम राजनीति की बुनियादी मानसिकता है। विभाजन के बाद बचे स्वतंत्र भारत में भी हिंदू नेताओं ने इसे खत्म करना ज़रूरी नहीं समझा। वरना, काशी, अयोध्या, मथुरा और भोजशाला मंदिरों पर बर्बर इस्लामी अतिक्रमण के प्रतीक ध्वस्त मात्र करके ही हिंदुओं पर इस्लामी साम्राज्यवादी दबदबे को सदा के लिए खत्म करने का संदेश दिया जा सकता था। अन्य सरल उपाय भी थे। पर कुछ न किया गया।

फलतः मुस्लिम नेताओं ने इसे पुनः अपनी ताकत का भय समझा। एक बार सैयद शहाबुद्दीन ने धमकाया कि ‘अरब देशों से कहकर भारत को तेल-आपूर्ति बंद करा देंगे।’ फिर कश्मीर से पूर्णतः और केरल में अंशतः हिंदू मारे-भगाए गए। सिद्धांत और व्यवहार, दोनों में मुस्लिम नेता दबंगई की राजनीति करते रहे हैं। उन्होंने हिंसा और धमकी बल पर भारत को तोड़कर पाकिस्तान भी बनवा लिया। पर हिंदू नेता इतने भोले साबित हुए कि अलग देश बना कर दे देने के बाद भी फिर मुसलमानों को मनमर्जी यहीं रहने की छूट व मजहबी विशेषाधिकार भी दे दिए! फिर भी हिंदुओं को ही दुनिया में बदनाम किया जाता है!

अधिकांश मुस्लिम नेता और आलिमों के अनुसार हिंदू लोग बनिया-दिमाग, भीरू, संकीर्ण हैं, इसलिए उन्हें हराकर मुसलमान फिर राज कर सकते हैं। दुनिया भर में दशकों से मुस्लिम ब्रदरहुड, लश्करे तोयबा, अल कायदा, इस्लामी स्टेट, आदि की भयंकर करतूतें भी उन्हें ‘ताकत’ का अहसास देती रही हैं।

सारा खेल इस मानसिकता को खुली छूट मिले रहने का है। वरना वे जानते हैं कि चीन, रूस या सिंगापुर उन जैसों के साथ क्या करता है। चीन में मस्जिदें ढहा दी जाती है, मदरसे बंद कर दिए जाते हैं। बच्चों के नाम इस्लाम, क़ुरान, आदि रखने पर प्रतिबंध है। बुर्का मना है। फिर भी उसी चीन के सामने पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देश झुके रहते हैं!

दरअसल जिन देशों को इस्लामी राजनीति के प्रति कोई गलतफहमी नहीं, वे उसके साथ वैसे ही पेश आते हैं जैसे आना चाहिए। लेकिन जिन देशों ने उदारता, मानवीयता की गलत समझ में इस्लामी ऊल-जूलूल को भी सिर पर बिठाया, उन्हें तबाह करने का कोई मौका मुस्लिम नेता नहीं छोड़ते।

दिल्ली से लेकर बर्लिन, लंदन तक यही नजारा है। अधिकांश मुस्लिम नेता मानते हैं कि वे दुनिया को हराकर इस्लामी राज बना लेंगे। क्योंकि दूसरे लोग अपनी सुख-सुविधाओं के खतरे में पड़ने से डरते हैं, और इसलिए अनुचित माँगे भी मानते जाते हैं ताकि लड़ना न पड़े। यही गैर-मुस्लिमों की कमजोर नस है, जिस कारण मरने-मारने पर फख्र करने वाले मुस्लिम उन्हें अंततः खत्म कर देंगे।

यह तर्क अपने-आप में गलत भी नहीं। हालाँकि जिस ताकत का घमंड मुस्लिम नेताओं को है, ठीक उसमें भी वे दरअसल कहीं नहीं हैं। आज लड़ाई छुरे, कट्टे, से नहीं लड़ी जाती। उससे केवल निरीह लोगों को मार सकते हैं। पर संगठित युद्ध के सारे आधुनिक हथियार गैर-मुसलमानों ने विकसित किए हैं। यह उनकी भलमनसाहत है कि आतंकियों से निपटते हुए वे आम मुस्लिम नागरिकों की फिक्र करते हैं। कश्मीर में यही होता रहा है। वरना, वैसे जिहादी या पत्थरबाज चीन या रूस में भी दिखते!

दुर्भाग्यवश भाजपा नेताओं में हिंदू चेतना नहीं, बल्कि गाँधी-नेहरूवाद का गहरा असर है। मुस्लिम नेताओं के झकझोड़ने पर भी उन की आत्मा नहीं जगती। इस का हर्जाना आम हिंदुओं को भरना पड़ता है, जिन्हें गाँधी से लेकर आज तक अपने नेताओं ने ही अधर में छोड़ दिया। उसी कारण ओवैसी ठसक दिखा रहे हैं।