भारती
मंदिरों को राज्य के नियंत्रण से मुक्त करने पर हिंदू हितों के लिए होगा संपत्ति का उपयोग

आशुचित्र- सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण से अधिक आवश्यक है मंदिरों का निजीकरण।

हाल की घटनाएँ एक सरल सत्य को रेखांकित करती हैं- ‘धर्मनिरपेक्ष’ भारतीय राज्य हिंदू धर्म को शक्तिहीन और इसकी मंदिर संपत्ति को नष्ट करने के लिए एक ढकोसला और घोटाला है। अगर इस संपत्ति का कोई उपयोग होगा तो वह हिंदू धर्म के शत्रुओं को लाभ पहुँचाने के लिए होगा।

पिछले कुछ सप्ताहों के दो समाचारों पर ध्यान दें- आंध्र प्रदेश स्थित तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी), जो सबसे धनी हिंदू मंदिर न्यास है, ने कुछ ‘अलाभकारी’ संपत्तियों को बेचने का निर्णय लिया था। हिंदुओं के मुखर विरोध ने इसप अभी रोक लगा दी है।

तमिलनाडु में राज्य सरकार के आदेश ने कोविड-19 राहत कार्य के लिए 47 मंदिरों से मुख्यमंत्री राहत कोष में राशि दान करने को कहा, हालाँकि उच्च न्यायालय में मामला जाने के बाद इसे वापस ले लिया गया।

कुछ महीने पहले, उत्तराखंड उच्च न्यायालय में भाजपा सांसद सुब्रमणियन स्वामी ने चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम 2019 को चुनौती दी थी जो चार धाम व 51 अन्य मंदिरों को राज्य के प्रबंधन के अधीन लाने की बात करता है।

जब हिंदू मंदिरों में हस्तक्षेप की बात आती है तो हर राजनीतिक पार्टी अवसरवादी बन जाती है।

टीटीडी बोर्ड के अध्यक्ष की नियुक्ति आंध्र प्रदेश सरकार करती है जिसका वर्तमान में नेतृत्व एक ईसाई मुख्यमंत्री वाईएस जगनमोहन रेड्डी कर रहे हैं। उनके चाचा वाईवी सुब्बा रेड्डी इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। रेड्डी के संबंधी अनिल कुमार राज्य में ईसाई धर्मांतरण के प्रणेता हैं। इसी बात से धर्मनिरपेक्षवादियों को चिंतित हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

तमिलनाडु सरकार चला रही अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) को भाजपा की सहयोगी के रूप में यदाकदा देखा गया है, हालाँकि केंद्र मे ये सत्ता साझा नहीं करते हैं। अन्नाद्रमुक द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) से टूटकर बनी है जो स्वयं ईवी रामास्वामी पेरियार की द्रविड़ कड़गम (डीके)- एक उग्र रूप से हिंदू-विरोधी दल- से टूटकर बनी थी। इस प्रकार अन्नाद्रमुक में डीके का अंश है।

उत्तराखंड सरकार आत्मस्वीकृत “हिंदू झुकाव” वाली भाजपा चला रही है जिसे पिछले विधान सभा चुनावों में भारी बहुमत मिला था।

इन तीनों मामलों में एक वास्तविकता है- कोई भी पार्टी सत्ता में हो, केवल हिंदू मंदिरों, हिंदू संसाधनों और हिंदू हितों को ही राजनीतिक हस्तक्षेप का निशाना बनाया जाएगा।

कारण सरल है- अगर आप किसी चरागाह को घेर देंगे तो भेड़ वहाँ चरने चली जाएगी जहाँ कोई घेराबंदी नहीं की गई है। धार्मिक स्थलों की संपत्ति और संसाधनों को नियंत्रित करने के मामले के केवल हिंदू मंदिर ही बिना घेराबंदी के हैं।

चर्च और मस्जिद राजनीतिक नियंत्रण के दायरे में नहीं हैं क्योंकि अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों के स्वामित्व और प्रशासन का अधिकार दिया गया है। हालाँकि अनुच्छेद 25 कहता है, “अंतःकरण की और धर्म की अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता का अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से दिया गया है”, लेकिन वास्तविकता में इस अधिकार से हिंदुओं को काफी हद तक वंचित रखा गया है।

सरकारों द्वारा मंदिरों का नियंत्रण अनुच्छेद 25 के उद्देश्य का पूर्ण रूप से खंडन करता है। कारण- हिंदुओं को अपने धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता तो है परंतु उसका ‘प्रचार’ करने से उन्हें रोका जा रहा है। प्रचार को संसाधनों की आवश्यकता होती है और हिंदुओं के संसाधन मंदिर में ही हैं।

इस प्रकार ईसाइयों और मुस्लिमों को चर्च व मस्जिद के कोष का उपयोग धर्मांतरण के लिए करने की स्वतंत्रता है लेकिन राज्य द्वारा नियंत्रित संपत्ति के कारण अन्य मतों से हिंदू धर्म में धर्मांतरण कराने में समृद्ध मंदिर भी असक्षम हैं। परोक्ष रूप से राज्यों का मंदिर पर नियंत्रण धर्मांतरण कराने वाले मतों को लाभ पहुँचा रहा है क्योंकि राज्य हिंदू धर्म का प्रचार करके हिंदू धर्म में लोगों का धर्मांतरण नहीं करवा सकता।

पाँच दक्षिणी राज्यों के लगभग 1 लाख मंदिरों में से किसी भी मंदिर के पास धर्मांतरण या प्रचार गतिविधियों का लेखा-जोखा नहीं है जिसका अर्थ हुआ कि हिंदुओं को अपने हाथ बांधकर ही अपनी संख्या को बरकरार रखना होगा।

कोई तर्क दे सकता है कि ‘प्रचार’ का अर्थ धर्मांतरण का अधिकार नहीं हुआ लेकिन यदि ऐसा है तो चर्च और मस्जिदों को भी अपने श्रद्धालुओं की दान राशि का उपयोग धर्मांतरण के लिए करने से रोका जाना चाहिए। यह होता नहीं है इसलिए हिंदू धर्म से दूसरे मत में धर्मांतरण मंदिर नियंत्रण के कारण एक तरफा राह बनकर रह गई है।

स्पष्ट बात यह है कि केंद्र को एक कानून लाकर मंदिरों को राज्य के नियंत्रण से मुक्त करना चाहिए। मंदिरा चलाने का काम पुजारियों, भक्तों और हिंदू धर्म के अन्य हितधारकों का है, न कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ राज्य का। ज़्यादा से ज़्यादा राज्य मंदिर चलाने और प्रबंधन के लिए एक कानूनी संकचना बना सकते हैं।

दूसरी बात यह है कि मंदिरों पर राज्य का नियंत्रण हिंदू धर्म के मूल्य पर ईसाइयत और इस्लाम को परोक्ष बढ़ावा देता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक भी मुस्लिम या ईसाी संस्थान ने राज्य के नियंत्रण से मंदिरों को मुक्त कराने को समर्थन नहीं दिया है।

हिंदू-फोब (भयग्रस्त) मंदिरों का राज्य नियंत्रण से मुक्त न करने के तीन तर्क देते हैं।

पहला, इनमें से कई मंदिर कुप्रबंधन का शिकार थे (या हैं) इसलिए राज्य को नियंत्रण अपने हाथों में लेना पड़ा। यह बकवास है। चर्च व मस्जिद भी कुप्रबंधन का शिकार हो सकते हैं और चर्च का तो दशकों से बाल यौन शोषण और यौन दुराचार का ट्रैक रिकॉर्ड है लेकिन इसपर राज्य के नियंत्रण की कोई माँग नहीं उठी।

दूसरा, राज्य द्वारा नियुक्त अधिकांश मंदिर ट्रस्टी हिंदू होते हैं इसलिए उनपर श्रद्धालुओं के हितों की रक्षा का विश्वास किया जा सकता है। पुनः, यह एक संशयात्मक तर्क है। जब जगनमोहन रेड्डी के चाचा टीटीडी चला रहे हैं, भले ही वे हिंदू हों लेकिन इसपर कैसे विश्वास हो कि परिवारवाद से हुई इस नियुक्ति से हिंदुओं को लाभ पहुँचाया जाएगा, न कि उनके विस्तृत ईसाई परिवार को? साथ ही, जब नास्तिक कम्युनिस्ट केरल के देवास्वोम बोर्ड चलाने के लिए नियुक्त होते हैं तो यह ‘धर्मनिरपेक्ष’ भारत में स्वीकार भी कैसे किया जाता है?

तीसरा, सबसे बेतुका तर्क जिसके झाँसे में कई हिंदी भी आ जाते हैं कि भारत की 80 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू है। ऐसे में जनसांख्यिकी को लेकर उन्हें भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है, भले ही कुछ हिंदू अब्राह्मिक मतों में धर्मांतरित हो जाएँ।

सच्चाई अलग है। यह सर्वविदित बात है कि कई अनुसूचित जाति (एससी) के ईसाई अपने धर्मांतरण को आधिकारिक रूप से रिपोर्ट नहीं करते हैं ताकि उनको मिलने वाले लाभ उनसे न छीन जाएँ। टाइम्स नाऊ  पर हाल में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सांसद रघु रामकृष्ण राजू ने कहा कि आधिकारिक रूप से ईसाई तेलुगु जनसंख्या में 2.5 प्रतिशत से कम हो सकते हैं लेकिन वास्तविक जनसंख्या 25 प्रतिशत के निकट हो सकती है।

25 प्रतिशत ईसाी जनसंख्या के इस दावे को सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं है लेकिन निस्संदेह ही यह जनसंख्या उतनी नहीं है जितनी अविभाजित आंध्र प्रदेश के 2011 की जनगणना (1.34 प्रतिशत ईसाई) में कही गई थी।

इसी जनगणना ने आदिवासियों की संख्या 8.6 प्रतिशत बताई थी। अधिकांश ईसाई मत की प्रचार संस्थाएँ इसी जनसांख्यिकी के धर्मांतरण पर ध्यान केंद्रित करती हैं, विशेषकर इसलिए क्योंकि अनुसूचित जनजातियों के धर्मांतरण पर उन्हें आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जाता। देशभर में कुल 2.3 प्रतिशत जनसंख्या ईसाई है, यह आँकड़ा स्पष्ट रूप से गलत है।

यह अकारण ही नहीं है कि धर्म-भेद किए बिना दलितों को आरक्षण मिलने के लिए ईसाई आंदोलन कर रहे हैं। अगर यह होता है और सर्वोच्च न्यायालय इस मामले को जाँचने को इच्छुक भी है तो ईसाई जनसंख्या आँकड़ों में तेज़ी से बढ़ती हुई दिखेगी। अगर एससी वर्ग में आने वाले केवल कुछ ही अघोषित ईसाई होते तो आरक्षण लाभ के लिए ऐसी माँग न उठती।

इस प्रकार हिंदू-विरोधी समूह दोनों हाथों में लड्डू चाहते हैं- वे जातिगत भेदभाव के नाम पर हिंदू धर्म को खराब बताकर सदस्यों को हिंदू धर्म के प्रति निरुत्साही करेंगे और परोक्ष रूप से धर्मांतरण के बाद भी दलित मुस्लिम और ईसाई की श्रेणी में डालकर उन्हें समान नहीं मानेंगे।

हिंदू जनसंख्या में गिने जाने वाले लोगों का एक बड़ा भाग संभवतः हिंदू नहीं होगा क्योंकि नास्तिक और हिंदू-विरोधियों (कम्युनिस्ट से द्रविड़ एक्टिविस्ट और हिंदू-जैसे नाम रखने वाले धर्मांतरित लोग) भी बहुसंख्यकों में ही गिना जाता है। जनगणना के आँकड़े चुनौती देने योग्य हैं।

हिंदू बहुसंख्या को वास्तविकता में परखना चाहें तो भारतीय उप-महाद्वीप की जनसांख्यिकी देखें जो एक समय पर अविभाजित इकाई था। सीमा छिद्रयुक्त हैं, विशेषकर बांग्लादेश के तरफ की। पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश को मिलाकर हिंदू जनसंख्या 64-65 प्रतिशत है और भारत की 79.6 प्रतिशत हिंदू जनसंख्या को बांग्लादेश से मुस्लिमों के प्रवेश ने काफी कम किया होगा, इसपर रिपोर्ट न किए हुए धर्मांतरण और जोड़ लें।

मीडिया में ईसाई टिप्पणीकार अपनी संख्या कम बताते हैं ताकि हिंदू प्रतिरोध न हो और धर्मांतरण-विरोधी कानून की माँग तेज़ न हो। लेकिन कम ही लोग मानते हैं कि ीसाी धर्मांतरण तेज़ नहीं हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार को केंद्रीय कानून लाकर मंदिरों को राज्य के नियंत्रण से मुक्त करके उन्हें पुनः हिंदुओं को सौंपने में देरी नहीं करनी चाहिए। एक यही तरीका हो सकता है जिससे हिंदुओं को अपने हितों की रक्षा का एक अवसर मिल सके और वे अगले कुछ दशकों तक बहुसंख्यक बने रह सकें।

सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के निजीकरण से अधिक आवश्यक है मंदिरों का निजीकरण। इससे भारतीय संस्कृति की आत्मा बची रहेगी जबकि पीएसयू निजीकरण से बजट की कमी को पूरा किया जा सकेगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।