भारती
दूरसंचार क्षेत्र को पुनर्जीवित करने के लिए न्यायालय नहीं, समझदार डॉट नीति आवश्यक

दूरसंचार विभाग (डॉट) की एक प्रमुख गलती रही कि वह समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) के भुगतान के मुद्दे को सर्वोच्च न्यायालय लेकर गया। 24 अक्टूबर को सुनाया गया न्यायालय का निर्णय डॉट के पक्ष में गया और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को जनवरी के अंत तक 1.43 लाख करोड़ रुपये की बकाया राशि जमा करने को कहा गया था।

अभी तक सभी दूरसंचार कंपनियाँ पूर्ण रूप से इस राशि का भुगतान नहीं कर पाई हैं। उन्होंने इस राशि में परिवर्तन के लिए न्यायालय में याचिका दायर की थी लेकिन इसे “न्यायालय की अवमानना होगी”, कहकर खारिज कर दिया गया। वहीं दूसरी ओर डॉट प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से दूरसंचार कंपनियों की सहायता करना चाहता है ताकि दिवालियापन के कारण कोई कंपनी (वोडाफोन आइडिया) बाज़ार से बाहर न निकल जाए।

डॉट ने बकाया राशि के नोटिस जारी करने में भी थोड़ी ढील दिखाई और यह तक लगा कि वह दूरसंचार कंपनियों द्वारा बकाया राशि के स्व-आँकलन के पक्ष में भी था लेकिन न्यायालय ने इस प्रस्ताव में रुचि नहीं दिखाई।

पिछले माह तो न्यायालय समय-सीमा के भीतर बकाया राशि न जमा करने के लिए दूरसंचार कंपनियों और डॉट, दोनों पर भड़क गया। न्यायालय ने डॉट और भुगतान न करने वाली दूरसंचार कंपनियों दोनों को अवज्ञा का नोटिस जारी करने की धमकी दी।

वोडाफोन-आइडिया और एयरटेल दोनों ही कंपनियों ने 23 जनवरी की तय समय-सीमा तक बकाया राशि नहीं भरी। इसपर न्यायाधीश अरुण मिश्रा की बेंच ने आश्चर्य भी प्रकट किया था। केवल जियो ने ही 195 करोड़ रुपये की अपनी बकाया राशि तय समय-सीमा में भरी।

न्यायालय ने दूरसंचार विभाग के प्रति भी क्रोध व्यक्त किया जिसने कंपनियों को बकाया राशि जमा करने में देरी करने की छूट दी। वोडाफोन आइडिया ने दो किश्तों में 2,500 और 1,000 करोड़ रुपये जमा किए। लेकिन उसके बाद दूरसंचार कंपनियाँ 20 वर्ष की अवधि में राशि जमा करने और पुनः आँकलन की अनुमति दिलवाने के लिए डॉट पर आश्रित थीं।

वोडाफोन-आइडिया

डॉट को पिछले माह ही न्यायालय के मनोभाव समझ लेने चाहिए थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 18 मार्च को हुई सुनवाई में न्यायाधीश अरुण मिश्रा के नेतृत्व वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ गुस्से में लाल-पीली बोकी हुई बोली, “क्या हम बेवकुफ हैं? पुनः आँकलन की अनुमति किसने दी? अगर पुनः आँकलन की अनुमति दी जाती है तो यह न्यायालय की धोखाधड़ी होगी। हम उन अधिकारिों को नहीं छोड़ेंगे जो बकाया राशि के पुनः आँकलन की अनुमति देंगे।”

भविष्य में भी न्यायालय असहायक ही रहेगा और डॉट ने दूरसंचार कंपनियों की सहायता के लिए इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाते हुए गलती कर दी है। इसे दीर्घावधि के लिए कोई ऐसी नीति सोचनी चाहिए जो दूरसंचार क्षेत्र के परस्पर प्रगति के मार्ग को प्रशस्त करे।

किसी भी नई नीति की घोषणा केवल खुले तौर पर करने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि संसद में भी इसपर बहस होनी चाहिए ताकि भविष्य में सरकार पर किसी दूरसंचार कंपनी को नुकसान पहुँचाकर दूसरे को लाभ पहुँचाने का आरोप न लग सके।

दूरसंचार कंपनी को अधिक से अधिक बकाया राशि भरने के लिए अधिक समय दिया जा सकता है लेकिन अब तक यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि उन्हें एजीआर के पुनः आँकलन की अनुमति नहीं मिलेगी। बकाया राशि को 1.43 लाख करोड़ बताा जा रहा है लेकिन वास्तविक मूल्य इससे काफी कम होंगे क्योंकि इस राशि को दूरसंचार कंपनियाँ तरलीकरण या बेचकर भी भर सकती हैं।

जिस विधि से दूरसंचार कंपनियों की बकाया राशि और लाइसेंस शुल्क तय किया गया है, उस एजीआर के साथ समस्या यह है कि सकल राजस्व में किसे जोड़ा जाए। संदेह यह था कि क्या केवल मूल दूरसंचार राजस्व को जोड़ा जाए या आय के सभी साधनों को मिलाकर राशि बताई जाए।

अक्टूबर में सुनाए गए निर्णय में न्यायालय ने कहा कि सकल का अर्थ ही है सब कुछ और इसलिए दूरसंचार कंपनियों के हर प्रकार के राजस्व को जोड़ा जाना चाहिए और न कि मात्र दूरसंचार सेवा प्रदान करने से इकट्ठा हुए राजस्व को।

इसे ऐसे समझें कि अगर अपने कार्यालय के पुराने अखबार बेचकर भी किसी दूरसंचार कंपनी ने 1,000 रुपये की आय की है तो उसे इस राजस्व पर भी स्पेक्ट्रम शुल्क देना होगा।

यह हास्यास्पद लग सकता है लेकिन जब यह सब चल रहा था तो डॉट इस परिभाषा से प्रसन्न था और इसलिए दूरसंचार कंपनियों द्वारा गणना किए गए एजीआर का विरोध करने के लिए इसने न्यायालय का द्वार खटखटाया था।

इस न्यायिक प्रक्रिया से बाहर निकलकर डॉट को इस समस्या पर विचार करना चाहिए और पारदर्शी नीति परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। न्यायालय अपना निर्णय सुना चुका है और वह स्पष्ट है। अब यह डॉट का दायित्व है कि दीर्घ अवधि के लिए समझदारी भरी नीति का निर्माण करे।

दूरसंचार कंपनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने जो शॉर्टकट निकाले हैं, वे प्रश्न के घेरे में आ सकते हैं और वह भी उन लोगों द्वारा जो वास्तविक 2जी घोटाले के भागीदार थे। 18 मार्च को संसद में 2008 के 2जी घोटाले के मुख्य आरोपी ए राजा ने एजीआर बकाया राशि पर प्रश्न करते हुए कहा, “ऑपरेटरों को छूट किसने दी”।

ए राजा

यह उलटा चोर कोतवाल को डाँटे जैसा है लेकिन इसका समाधान डॉट को ही निकालना होगा। दूरसंचार कंपनियों के लिए कोई अस्थाई निदान संभव नहीं है। आगे की राह स्पष्ट होनी चाहिए।

पहला, न्यायालय को लंबी अवधि में एजीआर बकाया राशि के भुगतान के लिए मनाया जाए। न्यायालय के समक्ष यह मामला पहले से है लेकिन क्षेत्र की भावी नीति का निर्णय संसदीय हस्तक्षेप से होना चाहिए।

दूसरा, कमतर स्पेक्ट्रम शुल्क की नई प्रणाली बनाई जाए। साथ ही एजीआर की परिभाषा स्पष्ट हो जो केवल दूरसंचार राजस्व को ही गिने। एजीआर के स्थान पर एजीटीआर लाया जाना चाहिए यानी समायोजित सकल दूरसंचार राजस्व।

तीसरा, भविष्य की स्पेक्ट्रम नीलामियों के लिए आरक्षण शुल्क कम हो, 5जी नीलामियों में भी इस बात का ध्यान रखा जाए।

किसी भी समझदारी पूर्ण नीति के निर्माण के लिए एक केंद्रीय प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी से प्रतिदिन अंडा लेना है यानी स्वस्थ दूरसंचार उद्योग से लंबे समय तक राजस्व कमाना है या ढेर सारे अंडे एक बार में पाने के लिए मुर्गी को मार देना है यानी शुल्क के रूप में दूरसंचार उद्योग को भार बढ़ाकर कंपनियों को क्षेत्र छोड़ने के लिए विवश करना है।

इस प्रश्न का उत्तर आसानी से समझा जा सकता है और आशा है कि डॉट भी इसे समझेगा।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।