भारती
बोनलु- तेलंगाना का लोक त्यौहार जो अब विश्व में अपनी पहचान बना रहा है

हैदराबाद में मानसून का समय अपनी रमणीयता के लिए जाना जाता है। देश के दूसरे शहरों की तरह यहाँ आर्द्रता और कीचड़ नहीं होता और तापमान में गिरावट इसे ‘ठंड के दूसरे मौसम’ की तरह बना देता है, यहाँ तक कि कभी-कभी गर्म कपड़े भी पहनने पड़ जाते हैं।

इस जगह की विशेष बात है दिनभर बहने वाली हवा की ध्वनि और स्पर्श। और इसी हवा की आवाज़ के साथ कहीं दूर ढोल बजने की आवाज़ आती है। निश्चित ही यह उत्सव होता है।

इसी समय आषाढ़ माह में हर वर्ष तेलंगाना का बोनलु पर्व मनाया जाता है। महीने भर के इस पर्व में हर रविवार को माता के विशिष्ट मंदिर तक महाकाली जातरा होती है- पहले रविवार को गोलकोंडा दुर्ग में प्राचीन जगदंबा मंदिर में प्रार्थना की जाती है, दूसरे रविवार को ऐसा ही उत्सव सिकंदराबाद के महाकाली मंदिर और बलकमपेट के येलम्मा मंदिर पर होता है, तीसरे रविवार को पोचम्मा और कट्टा मैसम्मा मंदिर व पुराने शहर में चारमिनार के निकट लाल दरवाज़ा मंदिर पर। चौथे रविवार को इन सभी मंदिरों तक यात्रा निकलती है।

जातरा भले ही रविवार को निकाली जाती है लेकिन हर गुरुवार को भी प्रार्थना होती है। इस वर्ष का का पहला बोनम (भोजनम से बना शब्द जिसका बहुवचन बोनलु है) गुरुवार (4 जुलाई) को हुआ जहाँ गोलकोंडा दुर्ग की जगदंबा माता को प्रसाद चढ़ाया गया। इसके बाद 7, 14, 21 और 28 जुलाई पर पड़ने वाले रविवारों पर भी उत्सव होगा।

जातराएँ रंगों से भरपूर होती हैं जिसमें सैकड़ों महिलाएँ रंग-बिरंगे रेशम के कपड़े पहनकर स्टील या मिट्टी के बोनम (घड़े) अपने माथों पर लेकर जाती हैं और काली माता को अर्पित करती हैं। बोनम घड़ों में दही-गुड़-चावल का मिश्रण होता है। इन घड़ों को हल्दी, नीम की पत्तियों और सिंदुर से सजाया जाता है एवं इनके ऊपर दीप जलाकर रखा जाता है। बोनम के साथ देवी को साड़ी और चूड़ियाँ भी चढ़ाई जाती हैं। यह प्रार्थना देवी को धन्यवाद ज्ञापन के लिए होती है, साथ ही सुरक्षा, अच्छी वर्षा, अच्छी फसल और आपदाओं व बीमारियों से रक्षा की याचिका भी की जाती है।

छायांकन श्रेय- विद्यासागर एल

इन महिलाओं के साथ भयंकर दिखने वाले पुरुष होते हैं जो कसे हुए कपड़े, हल्दी से रंगी हुई छोटी धोती, पैरों में घूँघरू और मालाएँ पहनते हैं। ये पोताराजू (देवी के भाई) जिन्हें धर्मरक्षक की तरह पूजा जाता है। वे ढोल की ताल पर नृत्य करते हैं और नाटकीय रूप से खुद को चाबुक से मारते हैं। विशेष गाने और नृत्य इस यात्रा में एक अद्भुत उत्साह और ऊर्जा भर देते हैं। इस यात्रा की समाप्ति मंदिरों पर होती है जिन्हें हाल ही में रंगा, सजाया और आलोकित किया गया होता है।

श्रद्धालु मंदिर को कागज़ से बनी और बाँस की लकड़ी पर आधारित एक आकृति तोटेल्ला भी चढ़ाते हैं।

इन मुख्य मंदिरों के अलावा अक्कन्ना मदन्ना और मुत्यालम्मा मंदिर भी लोकप्रिय हैं। म्यासम्मा, दोक्कलम्मा, पेदम्मा, अंकलम्मा, पोलरम्मा, पोचम्मा, नूकलम्मा देवियों को भी बोनम का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इन सभी माताओं को शक्ति का रूप माना जाता है।

बोनलु को लेकर कई विश्वास हैं। एक मन्यता है कि इस माह में महिलाएँ अपने मायके जाती हैं। माना जाता है कि इस माह में महिलाओं में देवी का वास होता है और मंदिर में प्रवेश से पहले इस आक्रामक स्वरूप को शांत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं।

सोमवार (29 जुलाई) को एक भविष्यवाणी संस्कार रंगम होगा जिसमें एक महिला स्वयं में देवी महाकाली का आह्वान कर भविष्यवाणी करेगी। इसके बाद हर मंदिर से एक तांबे के घड़े को देवी की तरह सजाकर एक हाथी पर बैठाकर गलियों में घुमाया जाता है और अंततः इसे मूसी नदी में विसर्जित कर दिया जाता है।

तेलंगाना के कई स्थानों पर मनाए जाने वाले इस माह-भर लंबे उत्सव का विस्तार आषाढ़ और श्रावण मासों तक होता है।

तेलंगाना राज्य और आईटी संगठन के समय में बोनलु

ग्रामीणों द्वारा मनाए जाने वाले ग्राम देवता नामक उत्सव ने बोनलु के नाम से बहुत लोकप्रियता पाई है। इसका विस्तार और इसकी लोकप्रियता वर्ष दर वर्ष बढ़ रहे हैं।

2014 में तेलंगाना के गठन के बाद टीआरएस राज्य विशिष्ट बातों को बढ़ावा दे रही है ताकि यह सीमांध्रा और रायलसीमा से भिन्न अपनी पहचान बना सके। बोनलु और बतुकम्मा को राज्य त्यौहार घोषित कर दिया गया और मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने प्रति वर्ष इसके आयोजन के लिए 15 करोड़ रुपये भी आवंटित किए हैं।

इसके बाद मुख्यमंत्री राव की बेटी कविता द्वारा संचालित सांस्कृतिक पुनरोत्थान के लिए कार्य कर रही गैर-सरकारी संस्था तेलंगाना जागृति के निवेदन पर पिछले वर्ष ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में बोनलु और बतुकम्मा दोनों ही शब्दों को सम्मिलित किया गया।

राज्य सरकार के संस्कृति विभाग कई उत्सवों में भेजे जा रहे कलाकारों से बोनलु भी कई स्थानों तक पहुँच रहा है। उदाहरण के लिए दिल्ली में द्वि-दिवसीय उत्सव का आयोजन हुआ था जिसमें सोने और चांदी के बोनलु चढ़ाए गए थे और तेलंगाना भवन के निकट के मंदिर से इंडिया गेट तक यात्रा निकाली गई थी। 200 सदस्यों का प्रतिनिधि मंडल हैदराबाद से आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा तक कनकदुर्गा मंदिर को चढ़ावा चढ़ाने गए। टीटा (तेलंगाना आईटी असोसिएशन) के कारण अब बोनलु यूएसए, मेक्सिको और ऑस्ट्रेलिया में मनाया जा रहा है।

इसके अलावा पिछले वर्ष दिल्ली के गणतंत्र दिवस समारोह में तेलंगाना के सांस्कृतिक आइकन को दर्शाने के लिए बोनलु का प्रयोग किया गया था। “तेलंगाना के सभी त्यौहारों की जननी है बोनलु।”, एक आयोजक कहते हैं। इसकी महत्ता को इससे समझा जा सकता है कि इसे सर्वांगीण कल्याण का द्योतक माना जाता है, दूसरा यह कि यह अपनी सरलता और सार्वभौमिकता के कारण सबको समावेशित करने में सक्षम है और तीसरा यह कि इस पर्व की अवधि महीने भर की होती है।

त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाने की परंपरा के कारण ही औज इन त्यौहारों को वृहद रूप से मनाया जा सकता है। विवाहित नारियों को एक सप्ताह के लिए उसके माता-पिता के घर बुलाया जाता और फिर वे अपने क्षेत्र की देवी को साथ मिलकर बोनम चढ़ाते हैं। अगले सप्ताह यह संस्कार उसके ससुराल में किया जाता है, जहाँ उसके माता-पिता को भी आमंत्रित किया जाता है और वे सभी साथ मिलकर बोनम चढ़ाते हैं। इस प्रकार कई हफ्तों और कई क्षेत्रों में प्रार्थना करने की प्रथा बन गई।

तेलंगाना के गठन से हर वर्ष बोनलु के आयोजन की भव्यता और गतिविधियों में बढ़त देखी गई है। इस वर्ष 15 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ दो शहरों में 3000 मंदिरों को आयोजन के लिए वित्तीय सहायता दी गई है। भव्यता बढ़ने के साथ-साथ लघु चलचित्रों और सैकड़ों कलाकारों की प्रस्तुतियों से इसे प्रचारित किया जा रहा है। आयोजन के लिए विशेष बसें चलाई जाती हैं, सड़क सुधार होता है, निरंतर बिजली-पानीआपूर्ति, सैनिटेशन सुवाधाएँ, पुलिस बंदोबस्त, निगरानी कैमरे और 3डी मैपिंग भी की जाती है। लगभग 15 लाख लोग बर वर्ष बोनलु में सहभागिता दर्ज करते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

संस्कृति मंत्रालय का धर्मस्व विभाग कलाकारों की प्रस्तुतियों को वित्तीय सहायता देता है और टीटा के साथ साझेदारी में इस आयोजन को भव्य बनाता है। टीटा के सहयोग से त्यौहार का आयोजन तो भव्य हुआ ही है, साथ ही इसे एक ब्रांड पहचान भी मिली है। यह संगठन लगातार छह वर्षों से आईटी कॉरिडोर में यह त्यौहार मना रहा है जिसमें 4000 आईटी व्यवसायी, प्रतिनिधि, मंत्री, राजनेता, मीडिया और अन्य एक भव्य आयोजन हेतु चिन्ना पेदम्मथल्ली मंदिर पर एकत्रित होते हैं। टीटा के सदस्यों ने ब्रांड प्रचारक बनकर बोनलु को विदेशों तक पहुँचाया है।

जो पर्व कभी स्थानीय देवी को प्रसन्न और धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए था, वह आज “वैश्विक शांति” की प्रार्थना के लिए बन गया है। प्रथाओं की सरलता, उत्साहवर्धक संगीत और नृत्य, भोजन और सजावट इसे एक सामाजिक आयोजन बनाते हैं।

बोनलु मनाते विदेशी नागरिक, छायांकन श्रेय- विद्यासागर एल

टीटा सदस्य बनाते हैं कि सभी धर्मों के लोग इस आयोजन में सम्मिलित होते हैं। वे बताते हैं कि कभी यह पर्व अन्य जातियों का होता था जिसमें सवर्ण और ज़मीनदार भाग नहीं लेते थे लेकिन अब कई जातियों, धर्मों और देशों में इसे वैश्विक शांति और प्रार्थना के पर्व के रूप में मनाया जाता है। “तकनीक ने इसमें सबको एकत्रित किया है! धर्म से ज़्यादा बोनलु समाज का अहसास दिलाता है।”

धीरे लेकिन निश्चित रूप से यह लोगों को लुभा रहा है। इसकी शुरुआत तेलंगाना के गौरव और अपनेपन के रूप में हुई लेकिन नृत्य-संगीत, आमोद-प्रमोद, मनोरंजन और भोजन की वजह से यह लोकप्रिय हुआ है।

इसमें निहित तर्क

वर्तमान में बोनलु की मुद्रा और प्रचार इसे गैर-ब्राह्मणवादी पर्व बताते हैं जो सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से प्रभावित नहीं होता जबकि विद्वान कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में यह देवी का महीना होता है। पूरे भारत में आषाढ़ माह में किसी न किसी रूप में देवी पूजन होता है जैसे आषाढ़ नवरात्रि, गुप्त नवरात्रि, असम के कामाख्या मंदिर का बंद होना और कई। उज्जैनी महाकाली के लिए भी माना जाता है कि इस माह में जो उनके दर्शन करता है, उनपर माता की कृपा दृष्टि बनी रहती है।

देवी-स्मरण के कई साधन हैं। जो मंत्र या विशिष्ट प्रार्थनाएँ नहीं जानते हैं, वे बोनलु की परंपरा से तपस कर सकते हैं- बोनम को ढोकर मंदिर तक ले जाना और रक्षा के लिए प्रार्थना करना- यह सब एक तपस्या ही है।

कुछ लोग बताते हैं कि सिकंदराबाद में देवी को चढ़ावे के लिए पशु बलि की तांत्रिक प्रथा का अनुसरण किया जाता है। इस रक्त को चावल से मिलाकर प्रसादम बनाया जाता है और नगर की गलियों में बिखेरा जाता है।

इसके पीछे का विज्ञान- हल्दी, नीम, चूना और सिंदुर जो घड़ों और लोगों के हाथ-पैरों पर लगाया जाता है, वह यात्रा के दौरान हवा में मिलता है और यह बीमारी करने वाले कीटाणुओं को मारता है। इस प्रकार मौसमी बीमारियों जैसे आँख आना (कंजक्टिवाइटिस), निमोनिया और अन्य एलर्जियों को रोका जा सकता है।

हैजा (कोलेरा) के समय पूजन और उससे पूर्व

इस त्यौहार को मनाए जाने के कारण के पीछे लोकप्रिय मान्यता है कि यह 1813 में हैदराबाद में हैजा फैलने के बाद मनाया जाने लगा। सैन्य टुकड़ी में एक मिस्त्री सुरीति अप्पय्या का स्थानांतरण हैदराबाद से उज्जैन हो गया था और वह देवी महाकाली का भक्त बन गया था। उज्जैन में अपने अभियान के लिए धन्यवाद ज्ञापन करने के अलावा उसने अन्य चीज़ों की प्रार्थना भी की जैसे यदि वे उसके नगर को हैजा से बचाएँगी तो वह अपने शहर में भी उन्हें स्थापित करेगा। 1815 में वह देवी महाकाली की लकड़ी से बनी मूर्ति लेकर आया और उसे स्थापित किया जिसे आज सिकंदराबाद के उज्जैनी महाकाली मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस देवस्थानम को अब राज्य का धर्मस्व विभाग संचालित करता है और 1947 से मंदिर में पूजा-पाठ के लिए एक ब्राह्मण को नियुक्त किया गया है।

इस त्यौहार के उद्भव की और भी लोक-कथाएँ हैं। कुछ कहते हैं कि गोलकोंडा  में ककतियाओं और मुस्लिमों के राज से पहले जब वहाँ चरवाहे रहते थे, तब से यह उत्सव मनाया जाता है। पहाड़ी पर स्थित जगदंबा मंदिर जो अब गोलकोंडा दुर्ग के अंदर है, 500 वर्ष पुराना है।माना जाता है कि देवी अपनी दृष्टि के दायरे में पड़ने वाली भूमि की रक्षा करती हैं। इसलिए यह उत्सव यहाँ चढ़ावा चढ़ाने से शुरू होता है।

कुछ लोग यह तक मानते हैं कि यह त्यौहार प्रागैतिहासिक है।

भले ही हैदराबाद और सिकंदराबाद में इस उत्सव की भव्यता सर्वाधिक है लेकिन वारंगल, मेडक, निज़ामाबाद, करीमनगर और तेलंगाना के अन्य जिलों में भी यह त्यौहार मनाया जाता है। राज्य त्यौहार घोषित करने के बावजूद इन दो शहरों से ज़्यादा स्थानों पर इस पर्व को मनाने के लिए बहुत अल्प प्रयास हुए हैं। यहाँ तक कि के. कविता से शिकायत भी की गई थी कि उन्होंने सिकंदराबाद के महाकाली मंदिर में बोनलु मनाया लेकिन अपने संसदीय क्षेत्र निज़ामाबाद में नहीं।

इस त्यौहार को मिलने वाला महत्त्व, ध्यान और राशि, साथ ही नियमों में परिवर्तन जैसे अब तक सुरक्षा कारणों से प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी इसका मनाया जाना- यह सब तेलंगाना के गौरव को बनाए रखने के लिए है। तेलंगाना के लोगों का मानना है कि अब वे अपने शासन के साथ-साथ आत्म-गौरव और आत्मविश्वास के साथ रह सकते हैं।

तेलंगाना के नागरिक मानते हैं कि यह त्यौहार और इसकी लोकप्रियता उन्हें इस बीन भावना से उभरने में सहायता करेगी जिसके शिकार वे अविभाजित तेलंगाना में थे। उस समय उनकी संस्कृति, उनकी बोली और अन्य चीज़ों का सीमांध्रा के लोग उपहास उड़ाते थे। अब समय है स्वयं को और अपनी संस्कृति को सही स्थान पर स्थापित करने का। यह भावना और इस त्यौहार का नैसर्गिक आकर्षण बोनलु की लोकप्रियता को और बढ़ाएगा।