भारती
गयासुद्दीन तुगलक के सुलतान बनने के बाद तेलंगाना पर दो हमले, बंगाल में लूटमार (28)

वह 1321 का साल था। एक और खूनी जंग के बाद दिपालपुर से आया गाज़ी मलिक अब गयासुद्दीन तुगलक के नाम से दिल्ली का नया कब्ज़ेदार हुआ। उसे खिलजियों ने अपने कब्ज़े में हिस्सेदार बनाया था, जिनके बेमौत मारे जाने से उसे दिल्ली पर आँखें गड़ाने का मौका मिल गया। दिल्ली में इस्लाम का परचम एक बार फिर बुलंदी पर था। तुगलक ने हिंदू राज्यों की लूट की दौलत से दान के नए-नए कायदे बनाए।

बरनी इस समय दिल्ली में बड़े उत्साह से सक्रिय है। खुसरो खां के ताकतवर होने से वह सबसे ज्यादा मायूस था। वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि एक धर्मांतरित हिंदू अपने दूसरे हिंदू मददगारों की दम पर 125 साल पुरानी इस्लामी सत्ता का सत्यानाश कर दे। अब वह हमें तुगलक की दिलेरी पर बता रहा है

हमलों के लिए गईं इस्लामी फौजों के फतहनामे आने पर, बेटों की पैदाइश, उनके खतने और निकाहों के मौके पर वह इस्लामी तालीम में लगे लाेगों, सूफियों को उनकी ज़रूरत के मुताबिक तोहफे भेजे जाते हैं। वह बहुत बड़ी तादाद में लोगों को इनाम देता है और बार-बार देता है। इसका रिकॉर्ड तैयार किया जाता है। इससे पहले दिल्ली में किसी ने ऐसे कायदे नहीं बनाए। इस्लाम में उसका भरोसा इतना है कि वह इस्लाम में यकीन नहीं करने वालों से बात तक नहीं करता।

जाने-अनजाने में बरनी इस ब्यौरे से सूफियों का यह गौरतलब चेहरा उजागर कर रहा है। सूफी नाम का यह तबका न सिर्फ दिल्ली के लुटेरे हमलावर सुलतानों का दिल से हितैषी था बल्कि इस रूहानी मदद के लिए हिंदुओं से लूट के माल का हिस्सा उन्हें भी मिलता था। तुगलक ने तो इस बंदरबांट में उन्हें कायदे से शामिल कर लिया था। इससे ज़ाहिर है कि इस्लाम के इन तथाकथित संतों को इस्लामी हुकूमत में मचे कत्लेआम, हमले और लूट की सारी जानकारियाँ बखूबी हुआ करती थीं।

हमने खिलजी के समय देखा भी है कि किस तरह औलिया तेलंगाना की फतह की दुआएँ कर रहे थे। आज के ज्यादातर भारतीय सूफियों को इंसानियत के दूत मानकर पूजते हैं। चादरें चढ़ाते हैं। मन्नत मांगते हैं। उर्स के मौकों पर सेक्युलर भारत में सूफियों के कलाम कौमी एकता के तराने हैं। हममें से ज्यादातर को उनकी सुलतानों के साथ मिलीभगत की यह घिनौनी हकीकत का ज़रा भी पता नहीं है। सेक्युलर मुल्क के इतिहास की किताबों में उन्हें किस शातिर तरीके से छिपाया गया है।

दक्षिण भारत की ओर कूच

अब हम तुगलकों के कारनामों पर गौर करते हैं। दिल्ली में स्थापित नए निज़ाम में एक बार फिर हिंदू राज्यों की लूट का अगला चरण शुरू होता है। एक बार फिर समृद्ध दक्षिण भारत ही निशाने पर है। तेलंगाना पर हमले का जिम्मा गयासुद्दीन के बेटे मुहम्मद तुगलक को मिलता है, जिसे उलुग खां की उपाधि दी गई है।

यह वही मुहम्मद है, जो कुतबुद्दीन मुबारक के अस्तबल में घोड़े साफ किया करता था और उसके कत्ल के बाद दिल्ली से भागकर दिपालपुर अपने बाप से जा मिला था। अब उसके बाप गाजी मलिक यानी गयासुद्दीन तुगलक का ही राज था। दिल्ली में गयासुद्दीन ने एक नई बसाहट तुगलकाबाद के नाम से बसाई, जो तीन साल में तैयार हुई।

दिल्ली में मची खूनी उथलपुथल के समय वारंगल में हिंदू राजा रुद्रदेव का ही राज्य है, जो खिलजियों के समय से लुटना शुरू हो गया था। मुहम्मद बदायूं, चंदेरी और मालवा पर कब्ज़ा जमाए मुस्लिम हाकिमों की फौज लेकर दिल्ली से देवगिरि होते हुए वारंगल पर हमला करता है। रुद्रदेव इस बार हार मानने वाला नहीं है। बरनी की रिपोर्ट-

वारंगल के पत्थर और मिट्‌टी के किले में बड़ी तादाद में हिंदू इकट्‌ठे हो गए हैं। हर दिन शाही सेना भीतर वालों से युद्ध कर रही है। किले के भीतर से आग फेंकी जाती है। दोनाें तरफ से हत्याकांड हो रहे हैं।

राजा रुद्रदेव ने अचानक समझौते की बातचीत शुरू की है। सुलतान मुहम्मद की खिदमत में उसके लोग धन-दौलत लेकर हाज़िर हुए और हाथी, जवाहरात और बेशकीमती चीजें देने का वचन दिया है। ताकि जिस तरह कभी मलिक काफूर को बेहिसाब दौलत देकर लौटाया था, वैसे ही इस फौज को लौटा दिया जाए। मुहम्मद इस पर राजी नहीं है। वह रुद्रदेव काे बंदी बनाने के हक में है। रुद्रदेव के दूत लौटा दिए गए हैं।

वारंगल में हिंसक झड़पों को एक महीना हो चुका था। मुहम्मद इस बात से परेशान था कि इस दरम्यान दिल्ली से कोई खबर नहीं पहुँची थी। जबकि दिल्ली से चली लुटेरी हमलावर फौजों और दिल्ली में बैठे सुलतान के बीच नियमित तेज़ रफ्तार कम्युनिकेशन का इंतज़ाम ऐसा था कि हर हफ्ते दो-तीन फरमान आ ही जाते थे।

दिल्ली से सैकड़ों मील दूर तेलंगाना के समृद्ध इलाके में तुगलकों के समय यह पहला हमला था। दिल्ली की कोई खबर न आने से उसकी फौज में तरह-तरह की अफवाहें फैलने लगीं। मुहम्मद के करीबी दो शख्स उबैद कवि और शेखजादा दमिश्की ने यह अफवाह उड़ाना शुरू कर दिया कि दिल्ली में गयासुद्दीन तुगलक मारा गया है। किसी और ने कब्ज़ा जमा लिया है। इसी वजह से कोई फरमान नहीं आ रहे।

तुगलक के बैनर तले तेलंगाना में कहर बरपाने आई इस फौज में खिलजियों के समय की लूटपाट में शामिल कई तजुर्बेकार लुटेरे भी शामिल थे। इनके नाम हैं- मलिक तिमूर, अवध का मलिक तिगीन, मलिक मुल अफगान, मलिक गुल।

उबैद कवि और दमिश्की ने इनसे कहा कि तुम्हारा नाम उस सूची में लिखा जा चुका है, जिन्हें कत्ल कराया जाना तय है, क्योंकि खिलजी के समय के प्रतिष्ठित लड़ाका होने की वजह से मुहम्मद तुम लोगों को अपने रास्ते का काँटा समझता है। इस हलचल ने वारंगल के किले में भीतर से ही टक्कर देने में लगे रुद्रदेव का काम बैठे-ठाले आसान कर दिया। इस बार उसकी किस्मत अच्छी थी।

दिल्ली में सीरी के मैदान पर कत्लेआम

तुगलकी फौज में अफवाहों के गर्म बाज़ार ने खलबली मचा दी। खिलजियों के समय के सारे मलिक इकट्‌ठा होकर अलग हो गए। फौज बिखर गई। खाली हाथ मुहम्मद तुगलक जैसे-तैसे देवगिरि तक पहुँचा। मलिक तिमूर कुछ सवारों के साथ भागकर हिंदुओं के बीच जा पहुँचा था। वह वहीं मारा गया। तिगीन की हत्या हिंदुओं ने की।

मलिक मुल अफगान, उबैद और अफवाहें फैलाने वाले दूसरे लोगों को पकड़कर मुहम्मद तुगलक के पास देवगिरि में लाया गया। उन्हें इस नाकामी और अफरा-तफरी की खबरों के साथ जिंदा ही दिल्ली भेजा गया। दक्षिण में लूट के इरादे से काबिल बेटे के नेतृत्व में भेजी गई तुगलक की पहली फौज लुट-पिटकर लौटी थी। इस नाकामी के लिए अपने ही कुसूरवार करीबी लोग बंदी बनाकर लाए गए थे। इन्हें सबक सिखाना ज़रूरी था।

गयासुद्दीन तुगलक दिल्ली में सीरी के मैदान में दरबार करता है। हमारे भरोसेमंद सूत्र बरनी और सिहरिंदी देख रहे हैं कि बंदी बनाकर लाए गए सारे लोग सूली पर चढ़ा दिए गए हैं। कुछ लोगों को उनकी औरतों और बच्चों के साथ ही हाथियों के पैरों तले कुचलवाया जाता है।

सीरी के मैदान के उस रक्तपात के आतंक से बहुत समय बाद तक लोगों की रूह कांपती रही। दिल्ली वाले कांप उठे। नृशंस तरीके से मारे गए ये ज्यादातर सरदार मुसलमान ही थे। खिलजियों ने भी इसी तरह बागी धर्मांतरित मुगलों के औरतों-बच्चों को सामूहिक रूप से मरवाया था। एक बार फिर वही कहानी दोहराई गई। मुसलमानों के हाथों मुसलमान बेरहमी से काट डाले गए।

औलिया के चेले उबैद की घिनौनी करतूत

याहया बिन अहमद सिहरिंदी नाम का हमारा एक और रिपोर्टर निजामुद्दीन औलिया के आसपास है। उसने कुछ अलग और मजेदार ब्यौरे दर्ज किए हैं- उबैद कवि शेखुल इस्लाम शेख निजामुद्दीन का मुरीद था, लेकिन वह अमीर खुसरो की बुराई किया करता था। इस वजह से औलिया उससे नाराज़ रहते थे।

इसी दौरान एक हिंदू आकर मुसलमान हो गया। निजामुद्दीन औलिया उसे तालीम देते थे। एक शेख ने उसे दो दातुन दिए। उस नए मुसलमान ने उबैद से पूछा कि इन दातुनों का इस्तेमाल कैसे किया जाए? उस दुष्ट ने सुझाया कि एक मुँह में करो, एक गुदा में। वह भला आदमी ऐसा करने भी लगा, यहाँ तक कि उसकी गुदा सूज गई।

एक दिन उसने निजामुद्दीन को दोनों दातुन के इस्तेमाल के अनुभव पर बात की तो शेख बहुत नाराज हुए और कहा कि तुझे यह इस्तेमाल किसने सिखाया? उसने जवाब दिया कि उबैद कवि ने। फौरन शेख ने कहा कि हे उबैद, तू लकड़ी से खेल करता है।”

एक दिन उसी उबैद को लकड़ी की ही सूली पर दिल्ली में उलटा लटकाया गया। निज़ामुद्दीन औलिया आज करोड़ों हिंदू और मुसलमानों के लिए पूजनीय सूफी हैं, जिनकी मान्यता संत के रूप में है। सूफी मतलब इस्लामी रंग का कोई संत। लेकिन उनके समय उबैद नाम के ऐसे छिछोरे मुसलमान उनके शागिर्द भी थे, जो औलिया के असर में हाल ही में एक धर्मांतरित हिंदू को औलिया के दिए तोहफे पर ऐसा घृणित मजाक कर सकते थे!

और उस अभागे हिंदू की आस्था देखिए कि औलिया के हाथों से तोहफे में मिली दो दातुन को बेशकीमती मानकर वह उनके इस्तेमाल के बारे में औलिया के ऐसे बेहूदे चेले की राय पर आँख बंद करके किस यकीन से अमल करने लगा! हम नहीं जानते कि यह धर्मांतरित हिंदू कौन था, कहाँ का था, किस कारण से मुसलमान बना और बाद में उसका क्या हुआ?

उबैद नाम के एक घटिया शागिर्द की ऐसी हरकत के कारण मजहब बदलने वाला वह अनाम हिंदू शख्स इतिहास में दर्ज हो गया। इस वाकये ने औलिया के समय होने वाले धर्मांतरण और औलिया की मंडली में शामिल एक मसखरे की हल्की सी झलक पेश की है।

वारंगल का नया नाम सुलतानपुर

दिल्ली में दक्षिण भारत की लूट का आकर्षण गजब था। एक बार नाकाम होकर लौटने के सिर्फ चार महीने बाद ही गयासुद्दीन ने फिर वारंगल को लूटने के लिए मुहम्मद को भारी-भरकम फौज के साथ दिल्ली से रवाना किया। इस बार बीदर के किले पर कब्ज़ा होता है। रास्ते के दूसरे किले भी कब्ज़े में आते हैं।

राजा रुद्रदेव एक बार फिर अपने सभी रायों के साथ वारंगल के किले में हैं, जिन पर इस बार मुहम्मद तुगलक की फतह होती है। वारंगल का नाम बदलकर सुलतानपुर रखा गया है। पूरा तेलंगाना तुगलकों के कब्ज़े में आ गया है। एक साल का टैक्स जमकर वसूला गया है।

दिल्ली में फतह की यह खबरें एक नए जोश से भर देती हैं। दिल्ली में जश्न का माहौल है। ढोल बजाए जा रहे हैं। दरवाज़े सजाए गए हैं। मस्जिदों के मिंबर से फतहनामे पढ़े जा रहे हैं। वारंगल पर जीत के बाद वहीं से मुहम्मद तुगलक जाजनगर (उड़ीसा) पर हमले के लिए आगे बढ़ जाता है, जहाँ से 40 हाथी और लूट का माल दिल्ली भेजा गया है। जियाउद्दीन बरनी इस रौनक में सबसे ज्यादा खुश है।

अब बंगाल पर हमले और लूट की बारी

खिलजियों के समय ज्यादातर हमले और लूट देवगिरि और दक्षिण भारत पर केंद्रित रहे। वे लाहौर और मुल्तान में मुगलों के झपट्‌टों से भी जूझते रहे और हमने देखा कि बंगाल की तरफ बख्तियार खिलजी के बाद हमलावरों ने तेज़ी से कब्ज़े किए। वे कभी दिल्ली के मातहत बने रहे, कभी आज़ाद रहे।

एक अरसे बाद अब बंगाल को लूटने की बारी आई। पहले हिंदू राज्यों पर तुर्क हमलावरों की लूटमार चली। जब तुर्क हमलावर ही कब्जे कर बैठे तो अब दिल्ली से एक लुटेरी हुकूमत बंगाल की दूसरी लुटेरी हुकूमतों पर हमले और लूट करने वाली हैं। दोनों हुकूमतों में मुसलमान हैं। दोनों बाहरी हमलावर हैं। दोनों तरफ से पिसने और लुटने-पिटने वाली ज्यादातर अवाम हिंदू है। उसे इस मारकाट और लूट का सवा सौ साल का तजुर्बा हो चुका है।

गयासुद्दीन ने मुहम्मद को तेलंगाना से बुलवाया और खुद दिल्ली से लखनौती पर हमले के लिए निकला। इस लूट की खबरें भी पहले की तरह दिल्ली की मस्जिदों के मिंबर से पढ़कर सुनाई गईं। लखनौती, सतगांव और सुनार को स्थानीय कब्ज़ेदार सुलतान नासिरुद्दीन को ही दे दिया गया। बहादुर शाह नाम के सुनार के स्थानीय शासक की गर्दन बांधकर दिल्ली लाया गया। वह तुगलक के सामने झुकने को तैयार नहीं था। मुकाबला कर रहा था। उसे बांधा गया।

बंगाल पर गयासुद्दीन तुगलक का यह पहला हमला आखिरी भी साबित होने वाला था। लूट की दौलत के साथ वह अपनी फौज लेकर दिल्ली लौटता है। वह थोड़े से सवारों के साथ दो-दो मंजिलें एक बार में पार करके जल्द ही दिल्ली आता है। तुगलकाबाद से 3-4 कोस की दूरी पर अफगानपुर में उसके इस्तकबाल के लिए उसका बेटा मुहम्मद तुगलक एक छोटा महल बनवाता है ताकि गयासुद्दीन रात में वहाँ रहे और दूसरे दिन ठाटबाट से तुगलकाबाद कूच करे।

गयासुद्दीन वहीं ठहरा है। दावत होती है। खास भोजन के बाद अचानक वह महल धराशायी हो जाता है। अपने बेटे के हाथों दो बार तेलंगाना और खुद बंगाल लूटने में कामयाब रहा गाजी मलिक नाम का यह गयासुद्दीन तुगलक मलबे में ही ढेर हो जाता है। उसकी लाश ही बाहर आती है। एसामी ने इस हादसे में मुहम्मद तुगलक की साजिश का पर्दाफाश इन शब्दों में किया है

धूर्त शहज़ादे ने मलिक अहमद बिन अयाज के साथ मिलकर तय किया था कि वह नए महल के निर्माण में ऐसा तिलिस्म रचे कि जैसे ही सुलतान वहाँ बैठे, वह छत बिना किसी कोशिश के धराशायी हो जाए। सुलतान की मौत के बाद उसे वज़ीर बना दिया जाएगा।

चार साल और कुछ महीने ही दिल्ली पर काबिज रहे गयासुद्दीन की मौत के तीन बाद तक शोक की रस्में की गईं। आखिरकार जश्न के माहौल में मुहम्मद तुगलक की ताजपोशी होती है। सोने का ताज उसके सिर पर रखा जाता है। वह खुद को अबुल मुजाहिद की उपाधि देता है। वादे के मुताबिक अहमद बिन अयाज़ वज़ीर बनते हैं।

लोगों को खुश करने के लिए दिल्ली में खजाने में जमा हिंदू राज्यों से लूटकर लाई गई दौलत हमेशा की तरह लुटाई जाती है। बंगाल से कैद करके लाए गए बहादुर शाह के अच्छे दिन लौट आते हैं। उसे बाइज्जत सुनार की हुकूमत में लौटा दिया जाता है। मुहम्मद तुगलक के निजाम में एक बार फिर दक्षिण और मुलतान की तरफ लूटमार और हमले शुरू होते हैं।

मुहम्मद बिहामद खानी नाम का एक नया सूत्र हमारे संपर्क में आया है। तुर्कों के कब्ज़े के बाद उसके बाप मलिक बिहामद खां को आज के बुंदेलखंड की अक्ता दे दी गई थी। वह भी हमलों और लूट में हिस्सा लेने वाला एक इस्लामी फौजी था, लेकिन बाद में एक सूफी की संगत में आकर मजहबी हो गया। नए तुगलक की ताजपोशी का नजारा उसने इन शब्दों में लिखा है

ताजपोशी के 40 दिन बाद वह दिल्ली में दाखिल हुआ। सोने के दीनार और चांदी के दिरहम हाथियों के हौदों पर रखवाकर हर गली और मोहल्ले में न्यौछावर किए गए। पुराने लोग सहमत थे कि इससे पहले इतना न्यौछावर किसी ने नहीं किया था। लोग मालामाल हो गए। पहले अगर सुलतान खजाने से दौलत दान करते थे तो तुगलक खजाना ही दान कर देता था। उसने संजर बदखशानी को 80 लाख तनके दिए हैं।

अगले भाग में हम मुहम्मद बिन तुगलक की बेरहमी को बहुत नजदीक से देखेंगे। उसके महल के सामने लाशों के ढेर लगेंगे। दिल्ली के जल्लाद मरे हुए लोगों की खालें खींचने में पसीना बहाएँगे। मौत के नंगे नाच के लिए इस्लाम के इस राज्य में चार मुफ्तियों की खास नियुक्तियाँ की जाती हैं।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com