भारती
तकनीक ही कोविड-19 उपरांत विजयी होगी, भारतीय हितों के संरक्षण के पाँच उपाय

आशुचित्र- तकनीकी मामले में भारत को राष्ट्र को प्राथमिकता देनी होगी। हमेशा के लिए हम तकनीक के कूली और सिपाही बनकर नहीं रह सकते।

धीरे-धीरे लॉकडाउन में ढील मिलने के साथ-साथ कई क्षेत्र उत्पादन और सेवाएँ प्रदान करना फिर से शुरू करेंगे। पूरी तरह से खुलने में तीन माहों से अधिक का समय लगेगा क्योंकि सार्वजनिक परिवहन जो कि आर्थिक गतिविधियों के सामान्य होने का सूचक हैं, अभी तक प्रतिबंधित हैं।

इससे हम देख सकते हैं कि कौन-से क्षेत्र कोविड-19 से सर्वाधिक लाभ कमा सकते हैं- ये वो क्षेत्र हैं जो लोगों के आवागमन के बिना लोगों के कार्य करने का साधन बनें।

इस परिभाषा के अधीन आने वाले दो क्षेत्र हैं- दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी। ये लॉकडाउन और लॉकडाउन खत्म होने पर भी लोगों के इधर-उधर जाने पर लगी पाबंदियों का सर्वाधिक लाभ उठा सकते हैं। लॉकडाउन के दौरान घर से काम करने, वीडियो सम्मेलन और वस्तुओं एवं सेवाओं की ऑनलाइन डिलीवरी का प्रचलन हो गया है।

जब हम सामान्य परिस्थिति में भी लौट जाएँगे तब भी दूरी बनाए रखने का प्रचलन जारी रहेगा ताकी संक्रमण न फैले। कार्य स्थलों को खाली करना, कर्मचारियों के लिए सुरक्षित परिवहन और निरंतर स्वास्थ्य जाँच कुछ ऐसे ही प्रचलन हैं जो जारी रहेंगे।

इससे सभी कंपनियों और संगठनों की लागत बढ़ेगी। ऐसे में लॉकडाउन के बाद भी कंपनियाँ तकनीकी समाधानों की तरफ ही रुख करेंगी। तकनीक को अधिक प्रभावी होने के लिए दूरसंचार की आवश्यकता होती है। दूरसंचार साधनों से ही तकनीकी सेवाएँ उपभोक्ताओं तक पहुँचाई जा सकती हैं। कर्मचारियों पर होने वाले खर्च को कम करने के लिए कंपनियाँ तकनीक का उपयोग करेंगी।

अगर वर्तमान में भारत लॉकडाउन के दौरान संभला हुआ है तो उसका एक कारण है वित्त का डिजिटीकरण और ई-कॉमर्स मंचों का आगमन जो द्वार तक उत्पाद और सेवाएँ पहुँचा सकें।

तकनीक और दूरसंचार पर आश्रित होने का नुकसान यह है कि आर्थिक संप्रभुता गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक ,अमेज़ॉन, उबर और कई चीनी मंचों से साझा करनी पड़ेगी।

इसका अर्थ हुआ कि नरेंद्र मोदी सरकार को न सिर्फ विदेशी तकनीकी मंचों का विनिमय करने की आवश्यकता है बल्कि भारतीय तकनीकी मंचों को भी विकसित करना होगा। केवल ऐसा करके ही भारत खुद के एक तकनीकी सिपाही बनने से रोक पाएगा।

इसके लिए पाँच अनिवार्य बातों पर ध्यान देना चाहिए।

पहली, डाटा के स्थानीयकरण को अनिवार्य करना होगा क्योंकि कोई देश विदेशी अधिकार-क्षेत्र में अपने नागरिकों का डाटा भेजकर संप्रभुता खोना नहीं चाहेगा। वैश्विक मंचों को नियम बनाकर भारतीय उपभोक्ताओं का डाटा विदेशी सरकारों से साझा करके रोका जाना चाहिए।

अपराधों का रोकने के लिए सरकार से सरकार के बीच कुछ डाटा साझा करना आवश्यक हो सकता है लेकिन डाटा संप्रभुता कुंजी है। अगर भारतीय पद्धति है कि डाटा पर ग्राहक का ही अधिकार हो तो इस अधिकार पर निर्णय भारतीय न्यायालयों में भारतीव विधान से ही होना चाहिए।

दूसरी, स्टार्ट अप निवेश के लिए सरकार को कंपनियों का सहयोग करने की बजाय मंचों के सहयोग पर ध्यान देना चाहिए। अपने पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने स्टार्ट अप को वित्तपोषित करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये के निवेश का वादा किया था। लेकिन इस पहल की कम आवश्यकता है क्योंकि स्टार्ट अप विविध भारतीय व विदेशी पूंजी एवं निजी इक्विटी कंपनियों से वित्तीय सहायता ले सकते हैं।

जिस चीज़ की भारत को सच में आवश्यकता है, वह है खुद का अमेज़ॉन, खुद का उबर, खुद का सोशल मीडिया और खुद के भुगतान मंच। इनमें से आखिरी चीज़ एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई), आधार आधारित पहचान और रूपे कार्ड के माध्यम से हो चुकी है।

लेकिन आज या कल सरकार को घरेलू मंचों में निवेश करके प्रोत्साहित और सुरक्षित करना होगा या समर्थ मंचों में घरेलू पूंजी का निवेश प्रोत्साहित करना होगा। सार्वजनिक क्षेत्र की खरीदों के लिए सरकार की ऑनलाइन खरीद वेबसाइट गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जेम) ऐसा ही एक मंच है। अगर इसे सार्वजनिक-निजी साझेदारी में रूपांतरित कर दिया जाए तो इसका विस्तार कर इस नागरिकों के लिए लाभकारी बनाया जा सकता है।

वाहन चालकों को लाभ पहुँचाने के लिए सरकार के स्वामित्व या समर्थन वाली टैक्सी सेवा की आवश्यकता है। उबर और ओला अपने हित में अनुबंध करते हैं जिससे चालकों के लिए जीविका चलाना कठिन हो जाता है। सरकार की ऐसी ऐप सब्सिडी पर सेवा दे सकती है और चालकों के लिए भी हिताकारी हो सकती है।

रेलवे टिकट मंच आईआरसीटीसी यात्रा और पर्यटन का मानक मंच बन सकता है यदि रेलवे से आगे इसका विस्तार किया जाए। अगर एक सरकारी संगठन की तरह ही इसे चलाया जाएगा तो यह संभव नहीं है। रेलवे टिकट में इसके एकाधिकार का लाभ इसे बड़ा मंच बनाने में उठाया जा सकता है।

आईआरसीटीसी का मुखपृष्ठ

तीसरी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए भारत को भारी निवेश करने की आवश्यकता है विशेषकर सार्वजनिक प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में। स्वास्थ्य डाटा प्रबंधन, रक्षा और बिना निजता से समझौता किए नागरिकों को सेवा पहुँचाने के क्षेत्र में इसका बड़े स्तर पर उपयोग होना चाहिए।

सरकार ऐसा कैसे कर पाएगी वह महत्त्वपूर्ण है। भारत में कोविड-19के संक्रमण को नियंत्रित करने व ट्रैक करने के लिए जारी आरोग्य सेतु ऐप इस निजता संरक्षण के पैमाने पर खरी नहीं उतरती है। लेकिन महामारी की लहर के गुज़रने के बाद इस समस्या से निपटा जा सकता है।

चौथी, विनिर्माण, आईटी और वित्तीय सेवाएँ मध्यम-वर्गीय नौकरियों के बड़े स्रोत नहीं रहेंगे। इसका अर्थ हुआ कि अधिकांश नौकरियाँ अर्धकालिक या उच्च योग्यता की माँग करने वाली होंगी। इससे उच्चतर वेतन के लिए उच्च योग्यताओं को प्राप्त करना होगा और ऑनलाइन शिक्षा मंचों के विस्तार के बिना यह संभव नहीं हो पाएगा।

ऑनलाइन शिक्षा के लिए सरकार का अपना मंच है स्वयं जो मुफ्त या सस्ते शुल्क पर उपलब्ध है लेकिन यह अधिक ध्यान आकृष्ट नहीं कर पाया है। यहाँ नई सोच की आवश्यकता है जैसे निजी क्षेत्र के नवाचार और पहल।

स्वयं का मुखपृष्ठ

ऑफलाइन सामग्री प्रदान करने वाले ऑनलाइन शिक्षा को अधिका प्रोत्साहित नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनके राजस्व में ही घाटा होगा। इसे परिवर्तित करना होगा। सभी शैक्षिक संस्थानों को कुछ छात्रों से अधिक शुल्क वसूलने की बजाय लाखों छात्रों से थोड़ा-छोड़ा शुल्क वसूलने के राजस्व मॉडल के साथ ऑनलाइन शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के प्रशस्ति-पत्रों को रोजगार के लिए ऑफलाइन डिप्लोमा और डिग्री के समतुल्य माना जाना चाहिए।

पाँचवी, लघु स्तर के उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उपयोगी तकनीक और दूरसंचार के विस्तार की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, कोई कारण नहीं है कि सहस्रों छोटे उद्योग 3डी प्रिंटिग तकनीक पर आधारित व्यापार विकसित न करें।

सहस्रों कर्मचारियों वाली बड़ी कंपनियाँ रोजगार उत्पन्न नहीं करेंगी बल्कि ऑनलाइन तकनीक का उपयोग करके कुछ कर्मचारी वाले छोटे स्थानीय उद्योग रोजगार के अवसर देंगे। आत्मनिर्भर ग्रामों का महात्मा गांधी का स्वप्न केवल चरखों से पूरा नहीं होगा बल्कि तकनीकी मंचों और उच्च तकनीक को आत्मसात करके पूरा होगा।

तकनीकी मामले में भारत को राष्ट्र को प्राथमिकता देनी होगी। बड़ी तकनीकी कंपनियाँ यूएस और चीन के अधीन और नियंत्रित हैं। वे हमारी शर्तों के अनुसार नहीं चलेंगी। आवश्यकता है अपनी रक्षा खुद करने और तकनीकी विजेताओं को विकसित करने की। हमेशा के लिए हम तकनीक के कूली और सिपाही बनकर नहीं रह सकते।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।