भारती
कैसे तमिलनाडु का अनुबंध खेती कानून किसानों और खरीददारों को लाभ पहुँचाएगा

पिछले सप्ताह अनुबंध खेती पर कानून लागू कर तमिलनाडु ऐसा करने वाला पहला राज्य बना। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कृषि उत्पाद और पशुधन अनुबंध खेती और सेवा (प्रचार व सुविधा) अधिनियम पर अपनी मुहर लगा दी जिसे तमिलनाडु विधान सभा ने इस वर्ष 14 फरवरी को पारित किया था।

तमिलनाडु सरकार के अनुसार इस अधिनियम को राजपत्र में दर्ज किया जा चुका है। राज्य सरकार का कहना है कि यह कानून किसानों को पूर्व निर्धारित शुल्क पर अपने उत्पाद को बेचने या खाद्य प्रसंस्करणों को देने में सहायता करेगा।

किसान या किसान समूह कृषक उत्पादक संघ (एफपीओ) के अधीन खरीदने वाली कंपनी या एजेंट या प्रसंस्करण के साथ खेती अनुबंध कर सकते हैं। इसके अंतर्गत पशुधन व पशु उत्पाद भी आएँगे।

यह अधिनियम उत्पादक को अनुबंध पर हस्ताक्षर होने के दिन से एक निर्धारित आय मिलना सुनिश्चित करता है। इसमें एक और चीज़ है- इस अनुबंध को क्षेत्रीय कृषि व कृषि बाज़ार के प्रभारी अधिकारी से पंजीकृत कराना होगा।

यह अनुबंध किसान या उत्पादक की उपस्थिति में पंजीकृत किया जा सकेगा। तमिलनाडु सरकार के अनुसार अनुबंध खेती उत्पादकों को अत्यधिक लाभ पहुँचाएगी। एक लाभ यह है कि अनुबंध खेती से किसान नुकसान से बच सकेंगे जब अधिक उत्पादन या प्रचुरता के कारण मूल्य गिर जाते हैं।

अनुबंध करने से किसान को धन या संपत्ति की कोई हानि नहीं होगी और इस प्रकार किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिलना सुनिश्चित किया जा सकेगा, ऐसा तमिलनाडु सरकार का मानना है। वहीं दूसरी खाद्य प्रसंस्करण अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद और कच्चा माल सीधा किसानों से अनुबंध खेती के माध्यम से पा सकेंगे।

खाद्य प्रसंस्करण कारखाने का प्रतीकात्मक चित्र

इससे किसानों और कृषि-संबंधी उद्योगों के मध्य बेहतर सामंजस्य स्थापित हो सकता है। इससे किसानों और अंतिम उपभोक्ता के बीच भी भविष्य में बेहतर समन्वय होगा।

बुआई के पहले ही मूल्य निर्धारित हो जाएगा तो इससे किसान आधुनिक तकनीक अपनाकर उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इससे किसानों की आय वृद्धि भी सुनिश्चित की जा सकेगी।

अगर खरीदने वाली या प्रसंस्करण कंपनी अनुबंध के अनुसार नहीं चलती तो सभी सुरक्षा नियम हैं जो किसानों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं और उन्हें अनुबंध के अनुसार ही मूल्य मिल जाएगा।

राज्य सरकार राजस्व मंडलों, जिलों और राज्य के स्तर पर पैनल का गठन करेगी जो अनुबंध लागू करने में आने वाली सभी समस्याओं का निवारण करेंगे। इस अधिनियम से यह भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कोई भी उत्पाद या वस्तु जो केंद्र द्वारा प्रतिबंधित है, राज्य में अनुबंध खेती के तहत न उगाई जाए।

मूल रूप से अनुबंध खेती कटाई के बाद बाज़ार की अनिश्चितताओं जैसे खतरों का भार उत्पादक से खरीददार पर डाल देती है। एक बार किसान या उत्पादक ने एफपी पर हस्ताक्षर कर खेती अनुबंध-पत्र पर सहमति जताई तो निश्चित हो जाता है कि उन्हें उनका निर्धारित मूल्य मिलेगा।

सिर्फ यह ही नहीं, इससे खरीदने वाली या प्रसंस्करण कंपनियाँ अच्छी खेती की ज़िम्मेदारी लेने के लिए भी आगे आएँगे। इसका अर्थ हुआ कि किसान तकनीक, फसल सुरक्षा, कटाई के बाद फसल सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर में इन खरीददारों की सहायता की अपेक्षा कर सकते हैं।

उदाहरण स्वरूप- कुछ वर्षों पहले राज्य के तिरुवन्नमलाई जिले में स्वीडन की प्रमुख कृषि तकनीक सिन्जेन्टा टेगरा बीजरोपण पद्धति को अपनाने के लिए जो तैयार हुए थे उन्हें तब तक परामर्श दी गई जब तक उनके धान की कटाई नहीं हो गई।

अनुबंध खेती से सबसे ज्यादा लाभ छोटे और मध्यम किसानों को होगा और उनके कल्याण की चिंता अब खरीददार करेंगे। खरीदने वाली एजेंसियाँ और खरीददरा किसानों की सहायता करेंगे और उनके कल्याण के बारे में सोचेंगे ताकि उन्हें कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति होती रहे।

अनुबंध खेती अब कुछ समय से तमिलनाडु में है। कावेरी डेल्टा में केला उगाने वाले किसान अनुबंध खेती की ओर रुख करते हैं। ऐसी ही अनुबंध खेती गन्ने और कपास के लिए भी तमिलनाडु में प्रचलित है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अनुबंध खेती में कुछ समस्याएँ देखने को मिली हैं।

कोयंबतूर क्षेत्र में एक कपड़ा मिल ने 15 वर्षों पहले कपास उगाने वाले किसानों के साथ अनुबंध किया था। लेकिन कुछ मौसमों के बाद ही इसे समस्याओं का सामना करना पड़ा क्योंकि कपास उगाने वाले कामचोर निकले।

किसान कई बार चिंता करने लगते हैं और समझौते में सुधार की मांग करते हैं जब बाज़ार मूल्य अनुबंधित मूल्य से अधिक हो जाते हैं। इस विषय पर विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों से, एक निर्धारित मूल्य या कटाई के समय बाज़ार मूल्य में से जो भी अधिक हो, का अनुबंध किया जाना चाहिए।

किसानों का साथ काम करने में आईटीसी लिमिटेड ने एक उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है। कुछ अन्य कंपनियाँ जो कृषि उत्पादों का उपयोग करती हैं, वे भी किसानों के साथ काम करने के लिए आगे आई हैं।

उदाहरण स्वरूप- यूनाइटेड ब्र्यूअरीज़ राजस्थान में किसानों को जौ उगाने के लिए प्रोत्साहित करती है ताकि शराब बनाई जा सके। मध्य प्रदेश और गुजरात में कुछ आलू के चिप्स बनाने वाली कंपनियों ने किसानों से अनुबंध कर रखा है।

आईटीसी के मामले में मिर्ची और गेहूँ किसानों को अच्छी गुणवत्ता का उत्पादन करके अधिक कमाई करने में सहायता मिली है। सिर्फ इतना ही नहीं, यदि किसान मानक पद्धतियों से खेती करें तो कंपनी उन्हें बाज़ार शुल्क पर अधि-शुल्क भी देती है।

अन्य खरीददारों की भी ऐसी ही पहल न सिर्फ अनुबंध खेती को बल देगी, बल्कि उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ किसान की आर्थिक स्थिति को भी सुधारेगी। तमिलनाडु सरकार के इस निर्णय पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं जहाँ कुछ किसान इसका स्वागत कर रहे हैं तो कुछ विरोध।

लेकिन इसके विरोध का कारण आधारहीन भय और आशंकाएँ हैं। कुछ भय ऐसे हैं कि कॉर्पोरेट किसानों के बीज पर भी अधिकार जमाएँगे या खेती पर कब्ज़ा कर लेंगे। ये भय आधारविहीन हैं।

जैसा कि हमने पेप्सिको के मामले में देखा है कि कंपनी ने आलू की विशेष प्रजाति पर अपना एक छत्र अधिकार जमाया था लेकिन बाद में कंपनी ने यह दावा वापस ले लिया था। यह मामला अच्छा उदाहरण है कि कैसे किसानों के अधिकारों की रक्षा की गई, विशेषकर पौधों के प्रकार और किसान अधिकार सुरक्षा अधिनियम, 2001 से।

यदि किसान स्वयं अनुबंध खेती के लाभ देख पाएँगे तो वे यह भी देख पाएँगे कि उनमें भय फैलाने वाले एक खेल खेल रहे हैं। तमिलनाडु सरकार, किसानों, खरीददारों और प्रसंस्करण कंपनियों सभी के लिए यह लाभ का सौदा है।