भारती
क्यों इस बार का स्वच्छता सर्वेक्षण पिछले संस्करणों से बेहतर और व्यापक है

स्वच्छता की कार्यविधि ऊपर से नीचे नहीं बल्कि नीचे से ऊपर की होती है। स्वच्छता की और कोई भी बड़ा कदम उठाने के लिए ज़मीनी स्तर से काम शुरू करना पड़ता है और इसी कारण स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत नगरपालिकाओं और पंचायतों को सक्रिय किया गया।

2016 में पहली बार आयोजित किए गए स्वच्छता सर्वेक्षण का उद्देश्य था कि एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से शहरों को एक-दूसरे से बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। इसके बाद विभिन्न वर्गों में कई तरह के स्वच्छता शीर्षक निकाले गए जिनसे सम्मानित होने की आकांक्षा से नगरपालिकाएँ काम करें।

स्वच्छता सर्वेक्षण का विस्तार

स्वच्छता सर्वेक्षण ने नगरों को प्रतिस्पर्धात्मक तो बनाया लेकिन अल्प समय के लिए। प्रायः नगरपालिकाओं को तब ही सक्रिय देखा गया जब सर्वेक्षण दल के आने का समय निकट था। इसने निवासियों को शहर में वर्ष भर स्वच्छता का अनुभव करने से वंचित रखा।

संभवतः नीतिनिर्माताओं ने भी इस बात को समझा जिसके फलस्वरूप स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 में अंतर देखने को मिलता है। 6 जून 2019 को केंद्रीय शहरी मामले मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्वच्छता सर्वेक्षण लीग 2020 की शुरुआत की। इसके तहत सर्वेक्षण को एक वार्षिक प्रक्रिया की बजाय त्रैमासिक बनाया गया।

ये तीन तिमाहियाँ- अप्रैल से जून, जुलाई से सितंबर और अक्टूबर से दिसंबर हैं। पिछले वर्ष 5,000 अंकों के सर्वेक्षण के विपरीत कुल 6,000 अंकों वाले इस सर्वेक्षण में इन तिमाही अंकों की 25 प्रतिशत भागीदारी होगी। हर तिमाही के लिए 2,000 अंक आवंटित किए गए हैं जिन्हें 12 सेवा स्तरीय सूचकों में सुधार के आधार पर आँका जाएगा।

नागरिकों की भूमिका

कूड़ा संग्रहण व परिवहन, कूड़ा प्रसंस्करण व निस्तारण, जागरूकता एवं सूचनाओं का संचार, क्षमता वृद्धि, नवाचार, सर्वश्रेष्ठ प्रयास, नियमों का पालन आदि सेवा स्तरीय सूचक हैं। स्वच्छता सर्वेक्षण ने नागरिकों की प्रतिक्रिया को सदैव सम्मिलित किया है और इस वर्ष यह सेवा सूचकों में सुधार पर नागरिकों की सीधी प्रतिक्रिया से सुनिश्चित किया जा रहा है।

31 दिसंबर 2019 को केंद्रीय मंत्री पुरी ने पहली दो तिमाहियों के परिणाम की घोषणा की और पिछले तीन बार की तरह इंदौर ने पहला स्थान प्राप्त किया। इंदौर नगर निगम दावा कर रहा है कि स्वच्छता की हैट्रिक लगाने के बाद वे इस बार चौका लगाएँगे। नागरिकों की प्रतिक्रिया लेने का अभियान चलाया जा रहा है।

वहीं पहली तिमाही में तीसरा स्थान प्राप्त करने वाला गुजरात का सूरत दूसरी तिमाही में गिरकर 20वें स्थान पर आ गया। इसके बाद सूरत नगर निगम सक्रिय दिखाई दे रहा है और नागरिकों की प्रतिक्रिया की सहायता से अपने स्थान में सुधार का प्रयास कर रहा है। यदि आप इसके ट्विटर हैंडल पर जाएँगे तो विभिन्न नागरिक प्रतिक्रिया अभियानों के चित्र देख सकेंगे।

नागरिक प्रतिक्रिया अभियान का 16 जनवरी को डाला गया चित्र

स्वच्छता सर्वेक्षण की रूपरेखा

4 जनवरी से 31 जनवरी के बीच होने वाले स्वच्छता सर्वेक्षण की वार्षिक प्रक्रिया की शुरुआत परिणामों की घोषणा के साथ ही हुई। 6,000 में से 1,500 अंक तीनों तिमाही के औसत पर आधारित होंगे। 1,500 नागरिकों की प्रतिक्रिया, 1,500 प्रत्यक्ष अवलोकन और 1,500 उन शीर्षक प्रमाण-पत्रों के अंकों के होंगे जिनकी बात हमने पहले की है।

प्रत्यक्ष अवलोकन के अंक स्वच्छता सर्वेक्षण दल के विचारों पर आधारित होंगे। 1,500 में से रहवासी और सार्वजनिक स्थलों पर सफाई को 240 और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई को 240 अंक दिए गए हैं। बाज़ारों और परिवहन स्थलों की स्वच्छता को 150-150 अंक आवंटित किए गए हैं। शहर सौंदर्यीकरण के आधार पर 200 और हवा में धूल की कमी पर 125 अंक मिलेंगे।

इन शीर्षकों में ओडीएफ, ओडीएफ+, ओडीएफ++, वॉटर+, कचरा मुक्त शहरों की स्टार रेटिंग जैसे प्रमाण-पत्र सम्मिलित हैं। शहरी मामले सचिव मिश्रा ने बताया कि 937 शहरों को ओडीएफ+ का दर्जा प्राप्त है और 328 शहर ओडीएफ++ प्रमाणित हैं। स्टार रेटिंग के विषय में बताया गया कि 57 शहर 3-सितारा और चार शहर 5-सितारा हैं।

विभिन्न शीर्षकों के लिए आवश्यक योग्यताएँ

25 कूड़ा प्रबंधन मानकों के आधार पर स्टार रेटिंग तय की जाती है। पिछले वर्ष जनवरी में लॉन्च किए गए इस कार्यक्रम में सबसे उच्च प्रशस्ति 7-सितारा की है। 1-सितारा, 2-सितारा और 4-सितारा के लिए शहर स्वघोषणा कर सकता है लेकिन तीसरी पार्टी की जाँच के बाद ही उसे 3-सितारा, 5-सितारा और 7-सितारा की उपाधि दी जाएगी।

स्टार रेटिंग के लिए द्वार से कूड़ा संग्रहण, स्रोत पर कचरे का पृथक्करण, सार्वजनिक व रहवासी क्षेत्रों में सफाई, कचरा पात्र, कचरा गाड़ियों, कूड़ा प्रसंस्करण, लैंडफिल, सेवा शुल्क और जुर्माना, प्लास्टिक पर प्रतिबंध, नागरिक शिकायत व्यवस्था, कचरे की मात्रा में कमी और शहर के सौंदर्य जैसे पैमानों को परखा जाएगा।

3-सितारा या उससे ऊपर की रेटिंग ओडीएफ शहर को ही दी जा सकती है। ओडीएफ दर्जे के लिए आवश्यक है कि किसी भी दिन एक भी व्यक्ति खुले में शौच करता हुआ न पाया जाए व हर व्यक्ति की पहुँच के दायरे में घर में अथवा सामुदायिक या सार्वजनिक शौचालय हो। ओडीएफ से ऊपर दो और स्तर हैं।

ओडीएफ+ के दर्जे के लिए इन सभी आवश्यकताओं के अलावा एक और बात जुड़ जाती है कि सभी सामुदायिक व सार्वजनिक शौचालय क्रियाशील और कुशल रख-रखाव के अधीन होने चाहिए। सार्वजनिक स्थलों के निकट शौचालय, जनसंख्या के अनुपात में शौचालयों की संख्या, किसी समारोह की स्थिति में मोबाइल शौचालय की व्यवस्था और मोहल्ले व रहवासी क्षेत्रों के स्तर पर शौचालय भी आवश्यक हैं।

स्वच्छ भारत मिशन की ओडीएफ पुस्तिका में ओडीएफ++ दर्जे के लिए ओडीएफ+ की आवश्यकताओं को पूरा करने के अलावा सीवेज के सुरक्षित व कुशल प्रबंधन और निस्तारण की बात कही गई है। इसके तहत सीवेज को खुले स्थानों या जल निकायों में बिना उपचार के नहीं डाला जाना चाहिए। वॉटर+ नियम भी कुछ ऐसा ही बताता है।

प्लास्टिक के विरुद्ध प्रयास है

निर्माण कार्य में प्लास्टिक के उपयोग को बढ़ावा सड़क परिवहन मंत्रालय से भी मिलता रहा है लेकिन इसे अनिवार्य नहीं किया गया है। वहीं स्टार रेटिंग इसे भी प्रोत्साहित करती है। 5-सितारा रेटिंग के लिए आवश्यक है कि नगर निगम के 10 प्रतिशत निर्माण कार्यों में प्लास्टिक का उपयोग हो। वहीं 7-सितारा रेटिंग के लिए 10 प्रतिशत से अधिक निर्माण कार्यों में प्लास्टिक का उपयोग करना आवश्यक है।

केंद्रीय मंत्री पुरी ने यह भी बताया कि सड़क निर्माण में प्लास्टिक के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सीमेंट विनिर्माण संघ और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के साथ साझेदारी की गई है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि 5-सितारा या 7-सितारा प्राप्त करने के लिए एकल-उपयोग प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध आवश्यक है।