भारती
स्वच्छ भारत अभियान से कितना स्वस्थ हुआ भारत- कुछ डाटा, कुछ अनुमान
स्वच्छ भारत मिशन आगरा

प्रसंग- हाल ही में आई यूनिसेफ की रिपोर्ट जहाँ हमें स्वच्छ भारत अभियान के पर्यावरण पर प्रभाव बताती है, वहीं हमें इसके स्वास्थ्य लाभों के विषय में सोचने के लिए प्रोत्साहित भी करती है।

स्वच्छ भारत मिशन का सामाजिक प्रभाव बढ़-चढ़कर बोला। चुनावों के समय स्वराज्य  की ग्राउंड रिपोर्टों में पाया गया कि स्वच्छ भारत में मिले शौचालयों के कारण ग्रामीण महिलाएँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में उतरकर आईं। एक ओर जहाँ स्वच्छ भारत मिशन ने महिलाओं का लज्जा रक्षण किया, वहीं दूसरी ओर शौचालय का प्रयोग न करने वाले को ग्रामीणों ने लज्जित कर ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। विवाह से पहले ससुराल में शौचालय महिलाओं की एक माँग बन गई, इससे प्रेरित एक फिल्म टॉयलेट भी आई। शौचालय निर्माण के लिए सरकार ने धनराशि भी दी जिसके फलस्वरूप भारत पूर्ण रूप से खुले में शौचमुक्त होने जा रहा है।

गेट्स फाउंडेशन  की रिपोर्ट में कहा गया कि इस योजना के अंतर्गत आए व्यवहारिक परिवर्तन का मूल्यांकन किया जाए तो यह 22,000-26,000 करोड़ रुपये के समतुल्य होगा। शौचालय के प्रयोग को मात्र एक दायित्व या कर्तव्य नहीं समझा गया बल्कि इसके साथ गर्व की अनुभूति भी की गई। स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण का डैशबोर्ड कहता है कि 94 प्रतिशत गाँव खुले में शौचमुक्त हो गए हैं और 100 प्रतिशत लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महात्मा गांधी की 150वीं जयंती (2 अक्टूबर 2019) की तिथि तय की गई है।

पर्यावरण दिवस (5 जून 2019) के अवसर पर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने गेट्स फाउंडेशन की रिपोर्ट के साथ ही यूनिसेफ की रिपोर्ट भी साझा की थी जो स्वच्छ भारत मिशन के पर्यावरण प्रभावों पर प्रकाश डालती है। भारत में इसपर कम ही चर्चा हुई है लेकिन स्वच्छ भारत मिशन की आवश्यकता बताने और लोगों को खुले में शौच न करने के लिए अधिक संकल्पबद्ध करने के लिए इस रिपोर्ट की जानकारी का प्रसार आवश्यक है।

इस रिपोर्ट के लिए तीन राज्यों- बिहार, ओडिशा व पश्चिम बंगाल- में हुए सर्वेक्षण में एक गाँव से 30 नमूने लिए गए। हर राज्य में आठ गाँव चुने गए- चार खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) और चार जो अभी शौचमुक्त नहीं हुए हैं (नॉन-ओडीएफ)। इस प्रकार इस पूरी रिपोर्ट में 30X(4+4)X3= 720 नमूनों का प्रयोग कर निष्कर्ष निकाला गया है। इस रिपोर्ट की विशेषता यह है कि यह सीधे रूप से ओडीएफ और नॉन-ओडीएफ गाँवों के पर्यावरण की तुलना करने में सक्षम है। यदि कुल गाँवों की संख्या के समकक्ष नमूनों की संख्या की अल्पता पर प्रश्न भी किया जाए तो भी अंतर इतना बड़ा है कि पर्यावरण प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता, विशेषकर भूमिगत जल के लिए।

80 प्रतिशत से अधिक भारतीय पेयजल के लिए भूमिगत जल पर निर्भर करते हैं। ऐसे में जब यूनिसेफ की रिपोर्ट कहती है कि नॉन-ओडीएफ गाँवों में भूमिगत जल के प्रदूषित होने की संभावना खुले में शौचमुक्त गाँवों से 11.25 गुना अधिक है तो यह हमारे लिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। खुले में शौच के कारण पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों पर डायरिया का खतरा सबसे अधिक मंडराता है। एक्यूट डायरिया मुख्यतः अस्वच्छ जल से फैलता है और इस बीमारी का प्रमुख कारक एशेरेशिया कोलाई नामक बैक्टीरिया होता है जो मनुष्य के शौच में पाया जाता है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल के 13वें संस्करण में दिए गए इन तीन राज्यों के 2016 और 2017 में एक्यूट डायरिया मामलों की स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत शौचमुक्त हुए गाँवों की तुलना करने से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।

भूमिगत जल के अलावा घरों में संग्रहित जल की जाँच में भी पाया गया कि नॉन-ओडीएफ गाँवों में ओडीएफ गाँवों की तुलना में इनके प्रदूषित होने की संभावना 2.68 गुना अधिक है। साथ ही खाद्य सामग्री की भी मनुष्य के शौच से प्रदूषित होने की संभावना नॉन-ओडीएफ गाँवों में 2.16 गुना अधिक थी।

इसी प्रकार 2017 में बिल एंड मेलिंदा गेट्स फाउंडेशन ने पाँच राज्यों- कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में एक अध्ययन में ओडीएफ और नॉन-ओडीएफ गाँवों की तुलना की थी। जहाँ यूनिसेफ की रिपोर्ट में नमूनों को एकत्रित कर जाँच करने के बाद निष्कर्ष निकाला गया, वहीं इस रिपोर्ट में 5 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों की माताओं से जानकारी प्राप्त कर निष्कर्ष निकाला गया।

लगभग 5000 बच्चों पर किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि नॉन-ओडीएफ गाँवों में खुले में शौचमुक्त गाँवों से डायरिया का फैलाव डेढ़ गुना अधिक था। खुले में शौच से सिर्फ बीमारी ही नहीं फैलती, बल्कि यह बच्चों के पोषण में भी बाधक होता है। 2015 में पहली बार सैनिटेशन और पोषण के बीच संबंध को सुदृढ़ करते हुए यूनिसेफ, यूसैड और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शोध प्रकाशित किया।

नीति आयोग के डाटा अंक इस शोध में पाए गए डाटा से संरेखित हैं, हालाँकि यह मेल नहीं खाते क्योंकि गेट्स फाउंडेशन के अध्ययन में एक जिले से मात्र 10 गाँवों में सर्वेक्षण किया गया था। 15 जनवरी 2018 को नीति आयोग द्वारा सार्वजनिक किए गए इस डाटा को हम 2017 का डाटा मानकर ओडीएफ एवं नॉन-ओडीएफ जिलों में पोषण की तुलना करते हैं। कुपोषण के तीन सूचकों का आँकलन किया गया है- स्टन्टेड यानी अपनी आयु के अनुसार कम लंबाई, वेस्टेड यानी अपनी आयु के अनुसार कम चौड़ाई और अल्प-भार (अंडरवेट)। इस तुलना के लिए गेट्स फाउंडेशन द्वारा चुने गए जिलों की ही तुलना करने का कारण है कि इस संस्था ने सामाजिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय समानताओं वाले जिलों को चुना था जिससे तुलना सटीक हो।

स्वच्छ भारत अभियान के पर्यावरण पर प्रभाव को जहाँ यूनिसेफ की रिपोर्ट ने उजागर किया, वहीं स्वास्थ्य पर इसके असर को हमने कई डाटा बिंदुओं से प्रभावशाली पाया। 2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक अध्ययन कर अनुमान लगाया कि स्वच्छ भारत अभियान से कितने लोगों के जीवन को बचाया जा सका/सकेगा। इस रिपोर्ट का कहना था कि यदि स्वच्छ भारत अभियान अपना लक्ष्य पूरा करने में सफल हुआ तो इसकी शुरुआत से 2019 तक कुल 3,05,000 जानें बचाई जा सकेंगी।

आने वाले एक-दो वर्षों में हमें स्वच्छ भारत मिशन के प्रभाव के संबंध में और डाटा प्राप्त होगें। तब जाँचा जा सकेगा कि जो अनुमान लगाया गया है, वह सटीक है या नहीं। डायरिया और कुपोषण के आगामी डाटा भी हमें बताएँगे कि पूर्व रूप से शौचमुक्त होने के बाद भी इस देश में यह समस्या कितने विस्तार से है और तब इसमें सुधार के लिए अन्य प्रयासों को खोजने की आवश्यकता होगी। लेकिन एक बात निश्चित है कि भले ही स्वच्छ भारत अभियान 2 अक्टूबर 2019 को समाप्त हो जाएगा लेकिन इस पहल का प्रभाव बनाए रखने के लिए हमें निरंतर निगरानी रखनी होगी। यह देखना रोचक होगा कि इस योजना को जारी रखने के लिए सरकार की भावी रूपरेखा क्या होगी।