भारती
सर्वोच्च न्यायालय का काम नहीं कि राजनीतिक दलों को बताए कैसे प्रत्याशी चुने जाएँ

यह एक तथ्य है कि भारत के राजनीतिक दल आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रत्याशियों को दरकिनार न करके चुनावों को अपराध मुक्त नहीं कर पाएँ हैं। लेकिन फिर भी भारत के सर्वोच्च न्यायालय का बिना किसी समाधान के इस समस्या में उतरने का अधिकार नहीं बनता है। यह न्यायालय का काम नहीं है कि प्रत्याशियों की गुणवत्ता को ठीक करे।

गुरुवार (13 फरवरी) को निकले एक आदेश में न्यायाधीश रोहिन्टन नरीमन और एस रवींद्र भट की पीठ ने कहा कि राजनीतिक दलों को उनके द्वारा चुने गए प्रत्याशियों का विवरण समाचार-पत्रों, वेबसाइटों और सोशल मीडिया पर प्रकाशित करना चाहिए। प्रत्याशियों द्वारा किए गए अपराधों के विवरण के अलावा पार्टियों को यह भी बताना होगा कि उन्हें क्यों चुना गया है। आदेश में एक और बात लिखी है कि पार्टियाँ उन्हें चुनने का कारण उनकी जिताऊ क्षमता नहीं बता सकतीं।

बहुत संभावना है कि इस आदेश का राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशियों को चुने जाने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन फिर भी कुछ मौलिक प्रश्न हैं जिनका पूछा जाना आवश्यक है-

पहला, जब मतदाता के पास प्रत्याशियों को चुनने या नकारने का अधिकार है तो न्यायालय राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्याशियों को चुने जाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप क्यों करे। उदाहरण देखें कि राजनीति में परिवारवाद उतना ही हानिकारक है जितने आपराधिक मामले।

लेकिन क्या सर्वोच्च न्यायालय कांग्रेस पार्टी से पूछेगा कि वायनाड़ से लड़ने के लिए राहुल गांधी को ही क्यों चुना गया या राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने बारामती से लड़ने के लिए अजीत पवार को क्यों चुना, बजाय पार्टी के किसी गैर-पारिवारिक सदस्य के?

दूसरा, मान भी लें कि इस आदेश का इरादा नेक था तो क्या कोई तरीका है जिससे राजनीतिक दल इसका पालन करें? आपराधिक इतिहास वाले प्रत्याशियों को चुनने का कारण देना कहाँ कठिन है? क्या पार्टियाँ जन सामान्य पर प्रत्याशी की पकड़, अच्छे कार्यों में उसका योगदान या किसी आंदोलन में उसके नेतृत्व जैसे तुच्छ कारण नहीं देंगी?

तीसरा, क्या चुनाव आयोग द्वारा अनिवार्य घोषणा जैसे संपत्ति व आपराधिक मामलों का विवरण सार्वजनिक करवाने से मतदाताओं पर असर हुआ है? क्या ऐसी संभावना नहीं है कि पारदर्शिता लाने के लिए इस प्रकार के आदेशों को उसी प्रकार अनदेखा कर दिया जाएगा जैसे सिगरेट के पैकेट पर आँखों को अप्रिय लगने वाले चित्र के साथ लिखी कैंसर की चेतावनी को किया जाता है?

चौथा, क्या सर्वोच्च न्यायालय हमें कॉलेजियम चर्चाओं का विवरण देगा कि क्यों कुछ न्यायाधीशों को चुना जाता है व अन्य को नहीं? पारदर्शिता एक अच्छी चीज़ है, न सिर्फ राजनीति में, बल्कि न्यायपालिका में भी।

भारत न्यायाधीशों द्वारा शासित होने की राह में आगे बढ़ रहा है क्योंकि हम उम्मीद करते हैं कि राजनीति या समाज की हर समस्या का समाधान काले जामे वाले लोग करें। सर्वोच्च न्यायालय को उन मामलों से दूर रहना चाहिए जिन्हें मतदाता और राजनीतिक दलों को आपस में ही सुलझाना है।

यदि अंतिम संप्रभुत्व रखने वाला मतदाता अपनी समझ के बावजूद आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशियों को नकार नहीं रहा है तो यह सर्वोच्च न्यायालय का कार्य नहीं है कि उसकी ओर से निर्णय ले।