भारती
चीनी का बढ़ा मूल्य भारत के लिए व्यापार अवसर, अतिरिक्त भंडार से उठा सकता है लाभ

वैश्विक बाज़ार में चीनी का मूल्य आपूर्ति में कमी और अधिक माँग के भय से ढाई वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुँचकर प्रति पाउंड 15 सेंट बढ़ गया है। इस वर्ष की शुरुआत से ही मूल्य में 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है।

अंतर्राष्ट्रीय चीनी संगठन के अनुसार सफेद चीनी (45 आईसीयूएमएसए- गुणवत्ता जाँचने के लिए रंग का पैमाना) का प्रति टन दाम बढ़कर 429.75 डॉलर यानी 30,700 रुपये हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र की एक इकाई, खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का कहना है कि जनवरी में लगातार चौथे महीने में चीनी मूल्य सूचकांक में बढ़त दर्ज की गई। यह 200.7 अंक हो गया जो कि दिसंबर 2017 के बाद अधिकतम है।

बढ़े हुए दामों के चार कारण माने जा रहे हैं। पहला  यह कि भारत का चीनी उत्पादन तीन वर्षों के सबसे नीचे स्तर पर 2.6 करोड़ टन रहा। वहीं पिछले वर्ष नवंबर-अक्टूबर के मौम में यह 3.2 करोड़ टन रहा था। 2018 में गन्ने की बुआई के समय पड़े सूखे और 2019 में फसल क्षेत्र में हुए जल जमाव ने उत्पादकता पर प्रभाव डाला।

दूसरा  यह कि ब्राज़िल के सबसे बड़े उत्पादन क्षेत्र- दक्षिणी मध्य में उत्पादकता 66 प्रतिशत गिरी। चीनी उत्पादकता 14 वर्षों के न्यूनतम स्तर 2.5 करोड़ टन पर आ गई क्योंकि बड़ी मात्रा में गन्ने का उपयोग इथेनॉल उत्पादन के लिए किया गया।

तीसरा, मेक्सिको की उत्पादकता में 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। प्रतिकूल मौसम के कारण इस वर्ष भी उत्पादकता गिरने की संभावना है।

चौथा, थाइलैंड की चीनी उत्पादकता सूखे के कारण 25 प्रतिशत गिरी है। अनुमान लगाया जा रहा है कि उत्पादन 10 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर 80-90 लाख टन रहेगा। थाइलैंड के चीनी मिल मालिकों का कहना है कि पिछले पाँच वर्षों का यह उनका सबसे बुरा समय है।

एफएओ ने भी चीनी उत्पादन में गिरावट का अनुमान लगाया है लेकिन इसका कहना है कि केवल अतिरिक्त माल की मात्रा में गिरावट आएगी, जो अगले वर्ष के लिए बचाकर रखे जाते हैं। हालाँकि कुछ व्यापारी और विश्लेषक 50-80 लाख टन की चीनी की कमी का अनुमान लगा रहे हैं।

चीनी मूल्य में योगदान देने वाला एक छुपा हुआ कारक भी है- पाकिस्तान। पड़ोसी देश ने कुछ ऐसे प्रयास किए हैं जिनका प्रबाव बाज़ार पड़ रहा है।

10 फरवरी (सोमवार) को पाकिस्तान ने घरेलू मूल्यों पर लगाम लगाने के लिए चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। पाकिस्तान की खुदरा दुकानों पर चीनी लगभग 85 रुपये किलो मिलती है (भारतीय मूल्य में 40 रुपये)।

पहले पाकिस्तान ने 3 लाख टन चीनी के निर्यात के लिए प्रतिबद्धता जताई थी। अब यह निर्णय 1 लाख टन से कुछ अधिक का निर्यात करने के बाद आया है और इसका प्रभाव उन देशों पर पड़ेगा जो आपूर्ति के लिए पाकिस्तान पर निर्भर थे।

इसके अलावा पाकिस्तान ने न्यूनतम 3 लाख टन चीनी के आयात का निर्णय लेकर बाज़ार को थोड़ा कठिन कर दिया है। सितंबर से पाकिस्तान के अधिकारी आयात की बात कर रहे हैं। आठ वर्षों में यह पहली बार होगा जब पड़ोसी देश चीनी का आयात करेगा।

पाकिस्तान में चीनी की समस्या तब उत्पन्न हुई जब इमरान खान सरकार ने वर्तमान वित्तीय वर्ष के बजट में चीनी पर लगने वाले वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया था।

इससे चीनी के दाम और जमाखोरी बढ़ी। पाकिस्तानी प्राधिकारियों ने जमाखोरी रोकने के लिए तलाशी अभियान चलाए। बिज़नेस रिकॉर्डर  के अनुसार पाकिस्तान में प्रायः ऐसा देखा जाता है कि जब भी सरकार जमाखोरी रोकने के लिए कड़े कदम उठाती है या किसी वस्तु का मनमाना मूल्य तय करती है तो वह वस्तु बाज़ार से गायब हो जाती और काला बाज़ार में ग्राहकों को उसी वस्तु के लिए अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है।

वहीं दूसरी ओर भारत में उत्पादन में कमी के बावजूद 1.45 करोड़ टन का अतिरिक्त सामान उपस्थित है। उद्योग पर नज़र रखने वालों का कहना है कि भारत ने ऐसी ही समस्या का सामना चार वर्षों पहले किया ता लेकिन सरकार की नीतियों के कारण इसका अधिक प्रभाव नहीं रहा था।

वर्तमान में विभिन्न राज्यों के घरेलू थोक बाज़ारों में चीनी का मूल्य 34-38 रुपये प्रति किलो है। चीनी मिलें जीएसटी समेत प्रति क्विंटल का दाम 3,281-581 रुपये लगा रही हैं।

दूसरी ओर निर्यात के लिए सफेद चीनी (150 आईसीयूएमएसए) की प्रति टन बोली 24,000 रुपये (लगभग 375 डॉलर) लग रही है और 100 आईसीयूएमएसए की सफेद चीनी के लिए 24,500 रुपये (लगभग 382 डॉलर)।

100 आईसीयूएमएसए चीनी

भारत में चीनी का पर्याप्त भंडार है और केंद्र 6 लाख टन तक की शिपमेंट पर प्रति टन 10,500 रुपये का लाभ देता है। इस प्रकार यह घरेलू लाभ प्रदान करता है। भारत के अतिरिक्त भंडार को देखते हुए इंडोनेशिया जैसे देश चीनी खरीदने के लिए आगे आए हैं, हालाँकि जकारता अपने ताड़ समूह तेलों के अनुकूल शुल्क चाहता है।

साथ ही भारत को इंडोनेशिया को आवश्यक गुणवत्ता वाली चीनी पहुँचाने में समस्या है। अधिकांश रूप से इंडोनेशिया 1200 आईसीयूएमएसए चीनी का उपयोग करता है लेकिन भारत इसका उत्पादन नहीं करता। इसलिए अब जकारता 600 आईसीयूएमएसए वाली चीनी खरीदने पर विचार कर रहा है (600 आईसीयूएमएसए चीनी 1200 आईसीयूएमएसए चीनी से बेहतर होती है)।

इंडोनेशिया थाइलैंड की कच्ची चीनी का सबसे बड़ा क्रेता रहा है। लेकिन बदले मौसम के कारण इस बात पर संदेह है कि इंडोनेशिया की माँग पूरी हो पाएगी।

इंडोनेशिया के चीनी संगठन ने कह दिया है कि वे कम से कम 14 लाख टन कच्ची चीनी का आयात करना चाहते हैं ताकि अगले वर्ष के लिए उनके पास 13 लाख टन का भंडार हो। संघ को स्थानीय रूप से चीनी के दामों के बढ़ने की भी चिंता है।

मलेशिया की नज़र भी भारत की चीनी पर है और संभवतः यही कारण हो सकता है कि प्रधानमंत्री महातिर बिन मोहम्मद ने 5 फरवरी को इमरान खान से हुई द्विपक्षीय बैठक में कश्मीर का मुद्दा क्यों नहीं उठाया।

मलेशियाई प्राधिकरणों ने कह दिया है कि वे और अधिक चीनी का आयात करेंगे, विशेषकर भारत द्वारा तेड़ तेल के आयात पर प्रतिबंध लगाने के बाद। पिछले माह भारत ने नियमों में परिवर्तन किए थे जिसके बाद परिष्कृत ताड़ के तेल के आयात के लिए विदेशी व्यापार के महानिदेशक की अनुमति लेनी होगी।

मलेशिया ब्राज़िल और थाइलैंड से चीनी खरीदता है लेकिन वहाँ हुए कम उत्पादन के बाद इसे दूसरे विकल्पों पर विचार करना होगा। यही वह समय है जब भारत अपने अतिरिक्त भंडार का लाभ उठा सकता है।

वैश्विक रूप से व्यापारी इस माह भारतीय चीनी के निर्यात में उछाल देख रहे हैं। इस प्रकार भारतीय चीनी उद्योग को रात मिलने की संभावना है।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।