भारती
मुंबई की मिठी नदी को स्वस्थ रहने के लिए सीवेज नेटवर्क की है आवश्यकता

प्रसंग- जयपुर की द्रव्यावती नदी को जीवंत किया जा चुका है, मुंबई की मिठी नदी का संघर्ष शेष है।

नदी केवल जल की धारा का नाम नहीं है, नदी को नदी बनाता है इसके आसपास का वातावरण। कई जीवनों को प्रभावित करती हुई, कई प्राणों को स्वयं में समेटे हुए नदी अपने आप में एक संसार है और इसलिए कई नदियों को जीवित प्राणी का दर्जा भी दिया गया है। लेकिन देश की ये जीवनवाहिनी नदियाँ स्वयं के जीवन के लिए संघर्षरत हैं। ऐसी ही कहानी है जयपुर की नदी द्रव्यावती की जिसे राजस्थान सरकार और टाटा प्रोजेक्ट्स के सकल प्रयास ने फिर से जीवित किया है।

कभी जयपुर शहर का गौरव रही द्रव्यावती नदी रख-रखाव के अभाव और बढ़ते शहर के अपशिष्ट जल को इसमें मिलाए जाने के कारण एक गंदा नाला बन गई थी। नदी के निकट से गुज़रते समय आप अपनी नाक ढँके बिना नहीं रह सकते थे। इससे भी अधिक चिंताजनक बात थी कि यह नदीं पारंपरिक रूप से सिंचाई का स्रोत रही है। इसके निकटवर्ती खेतों में सिंचाई का अन्य साधन नहीं है जिस कारण इस दूषित जल से ही सिंचाई हो रही थी।

सांगानेरी प्रिंट एवं डाई उद्योगों द्वारा छोड़े जा रहे सीवेज में नाइट्रेट, फोस्फेट जैसे तत्वों के अलावा हेवी मेटल भी था जिस कारण कई किसानों को उनके फल और सब्ज़ी बड़े आकार में तो मिले लेकिन बीमारी युक्त। कुछ रिपोर्ट में कहा गया कि ये किसान अपने उत्पाद का स्वयं उपभोग न करके बेच देते हैं और एक किसान ने कैंसर के कारण अपने पिता की मृत्यु की भी बात कही।

नदी की बुरी अवस्था, इसके आसपास का गंदा वातावरण और दूषित जल के दुष्प्रभावों ने राजस्थान सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया और तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने टाटा प्रोजेक्ट्स को नदी के पुनरोत्थान के लिए 1,676 करोड़ रुपये का अनुबंध दिया। 47 किलोमीटर लंबी इस नदी को इसके पुराने स्वरूप में लाने के लिए इसके आसपास 17,000 पेड़-पौधे लगाए गए।

नदी को लोगों से जोड़ने के लिए इसे मनरंजन गतिविधियों का भी केंद्र बनाया गया। नदी के दोनों किनारों पर लगभग 38 किलोमीटर तक साइकल और जॉगिंग ट्रैक बनाए गए हैं जिससे लोग नदी के निकट व्यायाम करके स्वस्थ जीवन का लाभ उठा सकें। सीकर मार्ग पर बर्ड पार्क, क्षिप्रा पथ पर लैंड्स्केप पार्क और बंबाला में बोटैनिकल गार्डन जैसे तीन उद्यान भी मनोरंजन केंद्र के रूप में विकसित किए गए हैं।

5 लाख स्क्वायर मीटर क्षेत्र में नदी किनारे नियोजित लैंड्स्केपिंग की गई है। इन क्षेत्रों में मुफ्त वाई-फाई की सुविधा भी दी गई है। लैंड्स्केप उद्यानों में आई-कियोस्क भी होगा। 45 स्थानों पर सार्वजनिक शौचालयों के साथ आपातकालीन परिस्थितियों के लिए घोषणा करने की व्यवस्था भी है। सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे व एलईडी स्ट्रीटलाइट भी लगाए गए हैं। साइकल उपलब्ध कराने के लिए ग्रीन राइड ऐप भी है जिसके द्वारा आप विभिन्न स्थानों से साइकल किराये पर ले सकते हैं।

लेकिन नदी के किनारों के सौंदर्यीकरण का कार्य तब तक प्रभावी नहीं होता जब तक नदी प्रदूषित रहती। अपशिष्ट जल से नदी को बचाने के लिए 170 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) क्षमता वाले मलजल उपचार संयंत्र (एसटीपी) पाँच विभिन्न स्थानों पर लगाए गए हैं। बस्सी सीतारामपुरा में 20 एमएलडी, देवरी में 15 एमएलडी, सांगानेर में 100 एमएलडी, बंबाला में 25 एमएलडी और गोनेर में 10 एमएलडी की क्षमता वाले एसटीपी लगाए गए हैं।

ये एसटीपी सीवेज के अपशिष्ट जल को साफ करके नदी में छोड़ देते हैं जिससे नदी में जल का प्रवाह बना रहता है और साथ ही खेती के लिए उपयोग किए जा रहे जल के साफ होने से बीमारियों का भी खतरा नहीं रहता। जागरूकता अभियान चलाकर आसपास रह रहे लोगों को नदी में कचरा फेंकने से भी रोका गया। नदी के आसपास से कई अतिक्रमणों को भी हटाया गया और जिस भूमि की आवश्यकता नहीं थी, उसकी नीलामी करके सरकार परियोजना का खर्च भी निकालना चाह रही है।

नदी पर स्थित चार बांधों- मज़ार, सीकर मार्ग, गुल्लर और रामचंद्रपुरा को साफ करके पुनर्स्थापित किया गया। हर 200-300 मीटर पर चेक बांध बनाए गए हैं और पानी भूमिगत जल से मिले इसके लिए झरझरे कॉन्क्रीट की पट्टी डाली गई है। नदी की लंबाई के 30 किलोमीटर भाग के किनारों पर कॉन्क्रीट भी डाला गया है।

कहा जाता है कि यह परियोजना गुजरात के साबरमती रिवरफ्रंट से प्रेरित है। इसी प्रकार मुंबई भी अपनी मिठी नदी को बचाने के लिए इस परियोजना से प्रेरित हुआ है। टाटा प्रोजेक्ट्स के सीओओ सत्यानारायण के ने बताया कि उन्होंने बृहनमुंबई नगर निगम (बीएमसी) से भी इसपर चर्चा की है लेकिन अभी किसी निर्णय पर नहीं पहुँचा गया है।

महाराष्ट्र की सबसे प्रदूषित नदी में मिठी नदी का नाम है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) के अनुसार 2018 में इसमें मानव और पशु मल सुरक्षित मात्रा से 15 गुना था। विहार और पवई झील से शुरू होकर माहिम खाड़ी द्वारा अरब सागर से मिलने वाली यह नदी 17.84 किलोमीटर लंबी है।

महाराष्ट्र पर्यावरण विभाग के अनुसार इस नदी के जीर्णोद्धार के लिए 2,136.89 करोड़ रुपये की आवश्यकता है। इस परियोजना के तहत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी), सीवेज चैनल, समुद्री जल को घुसने से रोकने के लिए मेढ़ और नदी के किनारों पर 10 पीट ऊँची दीवार भी बनाई जाएगी। नदी के किनारे साइडवॉक भी बनाए जाएँगे।

कहा जा रहा है कि पवई, साकीनाका, अंधेरी और कुरला क्षेत्रों के अनुसार इस परियोजना को चार चरण में विभाजित किया जाएगा। जून में बीएमसी ने युवा सेना प्रमुख आदित्य ठाकरे और पर्यावरण मंत्री रामदास कदम को इस परियोजना पर प्रस्तुति (प्रेज़ेंटेशन) भी दी। अतिक्रमण हटाने, नदी के चौड़ीकरण और सफाई से नदी की अवस्था 2005 के बाद बेहतर हुई है लेकिन मलजल प्रबंधन अभी भी सबसे बड़ी समस्या है।

एमपीसीबी के अनुसार मुंबई शहर में प्रतिदिन 2,671 मिलियन लीटर मलजल बनता है जिसमें से 665 एमएलडी मिठी नदी में जाता है और फिर अरब सागर से मिल जाता है। शहर के पास 2,595 एमएलडी सीवेज उपचार करने की क्षमता है लेकिन सीवेज नेटवर्क के अभाव में अधिकांश मलजल प्लांट तक आने की बजाय सीधे समुद्र में चला जाता है।

नदी की सफाई को कोई फल नहीं मिलेगा जब तक इसे प्रदूषित करने वाले स्रोतों को रोका नहीं जाएगा। बीएमसी को तत्काल आवश्यकता है सीवेज नेटवर्क निर्माण की। इसके बाद नदी के सौंदर्यीकरण के लिए काम किया जा सकता है। मिठी नदी के जीर्णोद्धार में पहले ही बहुत देर हो चुकी है, अब और विलंब अनुचित होगा।

ये तो सिर्फ दो नदियों की कहानी थी जहाँ एक नदी अपनी बुरी अवस्था से उबर गई और एक अभी संघर्षरत है लेकिन देश में जाने कितनी ही ऐसी नदियाँ होंगी जो अभी तक अपनी अवस्था पर प्रशासन का ध्यान आकर्षित भी नहीं कर पाई होंगी।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।