भारती
स्वच्छता और स्वास्थ्य के संबंध पर आईआईटी खड़गपुर के शोध-पत्र से क्या सीखे सरकार

स्वच्छता के स्वास्थ्य लाभ हम सभी को विदित हैं लेकिन पारिमाणिक रूप से इसे अभी तक सिद्ध नहीं किया जा सका है। यूनिसेफ ने एक रिपोर्ट अवश्य जारी की थी जिसमें उन्होंने खुले में शौच से मुक्त गाँवों (ओडीएफ) और गैर-ओडीएफ गाँवों में भूमिगत जल, संग्रहित जल और खाद्य पदार्थों में प्रदूषण की तुलना कर स्वच्छता के लाभ को स्थापित कर दिया था।

लेकिन इसका स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ा, उसका उल्लेख इस रिपोर्ट में नहीं था। इस रिपोर्ट और कुछ अन्य डाटा के अध्ययन से स्वराज्य  ने एक लेख में इसके स्वास्थ्य लाभ स्थापित करने का प्रयास किया था लेकिन एक पत्रकार पारिमाणिक स्तर पर तो इसे सिद्ध नहीं कर सकता।

इसके लिए आवश्यकता थी वैज्ञानिक सूझ-बूझ रखने वाले विशेषज्ञों की जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर के एक समूह ने प्राध्यापक अभिजीत मुखर्जी के नेतृत्व में कर दिखाया। हाल ही में उन्होंने “स्वच्छता और आर्थिक-सामाजिक स्थिति का भूमिगत जल प्रदूषण और स्वास्थ्य पर प्रभाव” नामक शोध-पत्र (रिसर्च पेपर) जारी किया है जो पारिमाणिक रूप से भी स्वच्छता के स्वास्थ्य पर लाभ बताता है।

इस अध्ययन में सहूलियत के लिए पानी से होने वाली बीमारियों में केवल एक्यूट डायरिया और बीमारी करने वाले कीटाणु में केवल फीकल कॉलिफोर्म को गिना गया है। अध्ययन की विशेष बात यह है कि इसमें शहरीकरण और बदली आर्थिक-सामाजिक स्थिति को समझने के लिए नाइटलाइट (सैटेलाइट द्वारा लिए गए चित्र में रात्रिकाल में प्रकाश की व्याप्ति) का उपयोग किया गया है।

7,010 प्रशासनिक ब्लॉकों से अध्ययन हेतु डाटा लिये गए। अध्ययन क्षेत्र में 2002 से 2017 के बीच कॉलिफोर्म कीटाणु में 33 एमपीएन प्रति 100 एमएल से घटने 25 एमपीएन पर 38.5 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। वहीं 1990 से 2016 तक डायरिया के मामलों में 79.3 प्रतिशत की गिरावट आई।

अध्ययन क्षेत्र

हालाँकि गिरावट हर क्षेत्र में समान नहीं रही जो स्वच्छता की दिशा में भारत के विभिन्न क्षेत्रों के प्रयासों की असमानता दर्शाती है। कॉलिफोर्म कीटाणु के संबंध में 3,000 ब्लॉकों में 90 प्रतिशत से अधिक सुधार हुआ, 1,600 ब्लॉकों में 70-90 प्रतिशत, 500 ब्लॉकों में 50-70 प्रतिशत और 1,700 ब्लॉकों में 50 प्रतिशत से कम। इन क्षेत्रों को इस आधार पर क्रमशः अ, ब, स और द नामक चार वर्गों में बाँटा गया।

2014 से स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत के साथ ही सुधार दर में वृद्धि भी देखी गई। पेपर कहता है कि भूमिगत जल की गुणवत्ता और स्वास्थ्य में तब से सुधार हुआ है क्योंकि स्वच्छता संरचनाओं पर अधिक ध्यान दिया गया।

अध्ययन काल में जहाँ कॉलिफोर्म की विसंगतियों के रेखाकार ट्रेंड के अनुसार यह 2.56 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से घटा, वहीं 2014 के बाद गिरावट दर 6.02 प्रतिशत हो गई। ऐसा ही डायरिया के लिए हुआ जो 1990 से 2016 के बीच कुल मिलाकर 2.93 प्रतिशत की दर से गिरा लेकिन 2014 से इसकी गिरावट दर 7.96 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही।

सभी कीटाणु संबंधित प्रदूषण कॉलिफोर्म से ही नहीं होते हैं लेकिन एलएलसी (लीड-लैग कोरीलेशन) हताहत टेस्ट दर्शाता है कि डायरिया का कॉलिफोर्म से सीधा संबंध है। इससे समझा जा सकता है कॉलिफोर्म में कमी से पानी से होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है।

स्वच्छता संरचनाओं (जैसे शौचालय) के निर्माण से पानी में कॉलिफोर्म की मात्रा में कमी आने का संबंध समझने के लिए अध्ययन हेतु सभी 7,010 ब्लॉकों के शौचालय के आँकड़े लिये गए। यह हमारे अध्ययन क्षेत्र में 1990 में 6.03 करोड़ से बढ़कर 2017 तक 10.4 करोड़ पाए गए। लेकिन सभी क्षेत्रों में शौचालय की वृद्धि दर भी समान नहीं रही।

कुल मिलाकर विसंगतियों के रेखाकार ट्रेंड के अनुसार 2.63 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि दर से शौचालयों की संख्या बढ़ी लेकिन 2014 से 2017 के बीच यह वृद्धि दर 15.15 प्रतिशत की हो गई। जब शौचालय संख्या वृद्धि को डायरिया और कॉलिफोर्म के आँकड़ों से मिलाया गया तो इनके बीच प्रबल परस्पर-संबंध (कोरीलेशन) मिला जो हमारे विचार की पुष्टि करता है।

इसके बाद अध्ययन क्षेत्र का नाइटलाइट डाटा भी लिया गया जो 4.26 प्रतिशत प्रतिवर्ष की औसत से 1992 से 2013 के बीच 89.6 प्रतिशत बढ़ा। हमने ऊपर जो चार वर्गों की बात की है, उनमें क्रमशः नाइटलाइट 92.2 प्रतिशत, 81 प्रतिशत, 62.3 प्रतिशत और 19.4 प्रतिशत बढ़ी जो स्वच्छता विकास तथा आर्थिक प्रगति में संबंध स्पष्ट करता है।

अंततः हम पाते हैं कि नाइटलाइट और शौचालयों में वृद्धि से पानी की बढ़ती गुणवत्ता समझी जा सकती है। वहीं शौचालय बनने से डायरिया मामलों में कमी आई लेकिन इसे नाइटलाइट से स्पष्ट रूप से नहीं जोड़ा जा सकता है। जब एलएलसी टेस्ट से देखा गया तो पाया कि जिन क्षेत्रों में अधिक सुधार हुआ है, वहाँ नाइटलाइट और शौचालय से डायरिया का संबंध स्थापित किया जा सकता है लेकिन कम सुधार वाले क्षेत्रों में नहीं।

शहरीकरण और स्वच्छता विकास मात्र से ही पानी की गुणवत्ता नहीं बढ़ाई जा सकती है। जिन क्षेत्रों में कम सुधार हुआ, वहाँ अन्य कारक भी प्रभावी रहे होंगे जैसे लोगों का व्यवहार। शौचालयों के उपयोग और लोगों की साक्षरता का एक अलग डाटा निकाला गया। इससे पाया गया कि जहाँ नाइटलाइट और डायरिया में स्पष्ट संबंध नहीं मिला, वहाँ मानवीय व्यवहार का नकारात्मक प्रभाव था।

इन परिणामों से इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया कि हर ब्लॉक की अपनी विशेषता है और सभी को स्वच्छ जल पहुँचाने के लिए नीति निर्माताओं को स्थान विशेष योजना बनानी होगी। जब मोदी सरकार ने हर घर जल योजना से 2024 तक हर व्यक्ति को स्वच्छ पेयजल का वादा किया है तो सरकार के लिए इस अध्ययन पर ध्यान देना आवश्यक है।

केवल शौचालय निर्माण से ही काम नहीं चलेगा, अन्य अप्रत्यक्ष कारक इसमें बाधा बन सकते हैं। जैसे इस अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली के आसपास के क्षेत्र जहाँ पिछले कुछ वर्षों में प्रवासन से अचानक जनसंख्या बढ़ गई है, वहाँ पानी की गुणवत्ता अच्छी रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहता है।

इस अध्ययन के माध्यम से कम विकसित और अधिक बीमारियों की संभावना वाले क्षेत्रों को चिह्नित किया जा सकता है और उनके लिए विशेष रणनीतियाँ बनाई जा सकती हैं। जैसे जो क्षेत्र मानवीय व्यवहार के कारण डायरिया सुधार में पीछे हैं, वहाँ व्यवहार परिवर्तन के लिए विशेष अभियान चलाए जा सकते हैं।

सरकार केवल संरचनाएँ बना सकती है लेकिन किसी भी योजना को सफल बनाते हैं उससे जुड़े लोग। स्वच्छ भारत अभियान की सफलता में भी व्यवहार परिवर्तन की भूमिका रही थी। गेट्स फाउंडेशन की रिपोर्ट कहती है कि यदि योजना के अंतर्गत आए व्यवहारिक परिवर्तन का मूल्यांकन किया जाए तो यह 22,000-26,000 करोड़ रुपये के समतुल्य होगा।

आईआईटी खड़गपुर का यह अध्ययन महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह प्रयासों के सीधे प्रभावों को रेखांकित कर सरकारी संस्थाओं को प्रोत्साहित करता है। साथ ही स्थान विशेष नीतियों का परामर्श नियोजनकर्ताओं के लिए एक सीख है।