भारती
अंतरिक्ष सुरक्षा के लिए शस्त्रीकरण और सैन्यीकरण- ‘नेत्र’ की निगरानी, ‘नाविक’ की दिशा

आशुचित्र- अंतरिक्ष सुरक्षा की दिशा में सैटेलाइट-रोधक मिसाइल के सफल प्रक्षेपण के बाद अब ‘नेत्र’ परियोजना और अधिक सैन्य उपग्रहों की तैयारी।

हाल में समाचार थे कि पंजाब के तरनतारन जिले में हथियारों, गोला-बारूद और जाली नोट गिराने के लिए पाकिस्तान ने सात से आठ बार जीपीएस युक्त ड्रोनों का प्रयोग किया। एक पुलिस जाँच में इस हफ्ते बुधवार (25 सितंबर) को यह जानकारी सामने आई।

पंजाब में पहली बार ऐसा मामला सामने आया है जब हथियार और संचार के उपकरणों एवं अन्य सामग्री गिराने के लिए सीमा पार से ड्रोन का उपयोग किया गया है। इस सिलसिले में कुछ लोगों की गिरफ्तारियाँ भी हुईं हैं और जाँच चल ही रही है। 

हाल में सऊदी अरब के दो तेल संयंत्रों पर हमले के बाद युद्ध में ड्रोनों की भूमिका को लेकर कुछ नई बातें सामने आ रहीं हैं। क्या आकाश की सुरक्षा पर हमें और ज्यादा ध्यान देना होगा?

हम जानते हैं कि आकाश की कोई सीमा नहीं है और दुनिया में ड्रोन केवल नीची उड़ान ही नहीं भरते। 50,000 फीट और उससे भी ज्यादा ऊँचाई तक उड़ान भरने वाले ड्रोन बन गए हैं और इस दिशा में लगातार विकास हो रहा है। 

पाकिस्तान की तरफ से आए ड्रोन से पंजाब में हथियार गिराने की घटनाओं पर सेना ने कहा है, हमारे पास इस तरह के ड्रोन की पहचान करने की क्षमता है। यदि कोई ड्रोन वायु सीमा का उल्लंघन कर भारतीय क्षेत्र में दाखिल हुआ, तो उसे मार गिराया जाएगा।

ये ड्रोन छोटे थे और इनकी क्षमता कम थी, पर यह भी तो संभव है कि यह परीक्षण किया गया हो? हम जानते हैं कि सामरिक तकनीक के मामले में पाकिस्तान की पीठ पर चीन का हाथ है। मूलतः यह प्रश्न हवाई सुरक्षा का है, जिसकी परिधि आकाश से बढ़कर अंतरिक्ष तक फैलती जा रही है। 

भारत का नेत्र

इस साल मार्च में जब भारत ने अपनी एंटी-सैटेलाइट क्षमता का प्रदर्शन किया था, तब कई तरह की बातें सामने आई थीं। हम अंतरिक्ष से सुरक्षा के बारे में विचार क्यों कर रहे हैं? क्या अंतरिक्ष से भी युद्ध संचालित हो सकता है? हमारे पास क्या अंतरिक्ष-युद्ध की तकनीक है, इत्यादि।

हाल में जब चंद्रयान-2 की गतिविधियों पर हमारी नजरें थीं, हमारा अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) एक और गतिविधि में लगा था। अंतरिक्ष की चौकीदारी के लिए इसरो ने प्रोजेक्ट नेत्र के नाम से एक नई प्रणाली को स्थापित करने का काम शुरू किया है। अंग्रेजी में नेटवर्क फॉर स्पेस ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग एंड एनालिसिस का संक्षिप्त नाम है नेत्र। 

अंतरिक्ष में हो रही गतिविधियों की सूचना देने वाली ऐसी प्रणाली अभी विकसित देशों के पास है। भारत भी इन देशों के कदम से कदम मिलाकर चल रहा है, क्योंकि आज नहीं तो कल हमें इसकी आवश्यकता होगी।

नेत्र की आवश्यकता अंतरिक्ष में विचरण कर रही वस्तुओं पर नजर रखने की है। इनमें काफी पुराने निष्क्रिय उपग्रह और उनके उपकरण हैं तथा अंतरिक्ष से आई दूसरी वस्तुएँ। इनसे हमारे उपग्रहों और पृथ्वी को संभावित खतरों पर नजर रखने का काम यह प्रणाली करेगी। 

वस्तुतः इस प्रणाली का उद्देश्य पृथ्वी की रक्षा है, पर यह प्रणाली हमारे देश पर दागे गए प्रक्षेपास्त्रों और दूसरे प्रकार के अंतरिक्ष-अस्त्रों पर भी नज़रें रखेगी। यह प्रणाली सुदूर संवेदी उपग्रहों, उनके साथ जुड़े रेडारों, टेलिस्कोपों, डेटा प्रोसेसिंग इकाइयों और नियंत्रण केंद्रों से जुड़कर बनेगी। हमारे सुदूर संवेदी उपग्रह पहले से काम कर रहे हैं, उनकी उपयोगिता का क्षेत्र-विस्तार हुआ है और उनका नेटवर्क बनाया जा रहा है। 

नाविक को मान्यता

संयोग से इसी हफ्ते एक और खबर इसी संदर्भ में सामने आई है। हम जीपीएस के उपयोग के बारे में जानते हैं। यह अमेरिकी प्रणाली है। इसरो के स्वदेशी जीपीएस यानी नाविक (नेवीगेशन विद इंडियन कांस्टिलेशन) को अंतरराष्ट्रीय संस्था 3जीपीपी (थर्ड जेनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट) मान्यता दे दी है। अब अंतरराष्ट्रीय और देसी मोबाइल सेवा प्रदाता नाविक का उपयोग कर पाएँगे। 

इसरो प्रमुख डॉ के सिवन ने बताया कि नाविक के लिए हमारे 8 उपग्रह अंतरिक्ष में तैनात हैं। सात सैटेलाइट नेवीगेशन के लिए और एक सैटेलाइट मैसेजिंग के लिए है। यह तकनीक जितनी नागरिक संचार के लिए उपयोगी है, उससे ज्यादा उसका राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्व है।

विदेशी जीपीएस के साथ गोपनीयता से जुड़े खतरे हैं, जबकि स्वदेशी प्रणाली विश्वसनीय है। सैनिक और असैनिक विमानों की उड़ाने से लेकर ड्रोनों के संचालन, मिसाइलों के दिशा निर्देश और जमीन पर सेना की गतिविधियों के संचालन के लिए यह प्रणाली जीवन रेखा है। 

मार्च में जब भारत ने ए-सैट (एंटी सैटेलाइट) मिसाइल का परीक्षण किया था, तब तक अमेरिका और चीन ने ही इस प्रकार के परीक्षण किए थे। शीतयुद्ध के समय सोवियत संघ ने भी उपग्रह-रोधी अस्त्रों की क्षमता का प्रदर्शन किया था, पर उसकी तकनीक भिन्न थी।

अब रूस ऐसे मिसाइल ए-235 या नुदोल का विकास कर रहा है और संभावना है कि शीघ्र ही वह इसका परीक्षण करेगा। उपग्रह-रोधी क्षमता हासिल करने के पीछे भारत का एक बड़ा कारण है नाभिकीय शस्त्र परिसीमन संधि (एनपीटी) का अनुभव। 

उपग्रह-रोधी क्षमता क्यों?

भारत ने अपने नाभिकीय परीक्षण में कुछ देरी की, इस कारण उसे नाभिकीय शक्ति सम्पन्न देश नहीं माना गया। न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत के प्रवेश में अड़ंगा लगाने में चीन एनपीटी वाली शर्त का हवाला देता है। इसीलिए भारत ने अपनी ए-सैट क्षमता का प्रदर्शन समय से करने का निर्णय लिया, क्योंकि यदि इस मामले में अंतर-राष्ट्रीय संधि हो तो भारत को क्षमतावान देश माना जाएगा।

उपग्रह-रोधी मिसाइल

राष्ट्रीय सुरक्षा के परिप्रेक्ष्य में इस साल अनेक बड़ी घटनाएँ हुईं हैं। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने हाल में कहा था कि भारत परिस्थितियाँ आने पर नाभिकीय अस्त्रों का पहला प्रहार न करने (नो फर्स्ट यूज़) नीति पर पुनर्विचार भी कर सकता है। 

नई सरकार के आने के पहले और एंटी-सैटेलाइट परीक्षण के बाद अप्रैल के महीने में देश की डिफेंस स्पेस एजेंसी (डीएसए) की स्थापना हो गई थी, जो अंतरिक्ष-सुरक्षा का काम देखेगी। इसके बाद जून में डिफेंस स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (डीएसआरओ) की स्थापना की गई। फिर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति की घोषणा की गई।

इसके अलावा अगले पाँच से सात साल में सेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए 130 अरब डॉलर के परिव्यय से एक दीर्घकालीन कार्यक्रम चलाने की घोषणा भी की गई। स्पष्ट है कि बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में भारत के उदय के साथ-साथ उसे सामरिक महाशक्ति के रूप में भी उभरना होगा। और यह शक्ति केवल जमीन पर ही नहीं आसमान पर भी नज़र आनी चाहिए। 

असैनिक से सैनिक कार्यक्रम

रूस, चीन और अमेरिका ने पहले मूलतः यह ताकत सैन्य तकनीक के रूप में प्राप्त की और फिर उसके असैनिक उपयोग को बढ़ाया, पर भारत ने इस मामले में पहले असैनिक और सैनिक उपयोग का रास्ता अपनाया है।

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम मूलतः असैनिक कार्यक्रम है, पर उसके भीतर से ही अब राष्ट्रीय रक्षा का कार्यक्रम उभर कर सामने आ रहा है। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के एरियान रॉकेटों को छोड़ दें, तो रूस अमेरिका और चीन के ज्यादातर प्रक्षेपकों का विकास मिसाइलों से हुआ है।

भारत में पहले स्पेस लॉन्च वेहिकलों का विकास हुआ और फिर उनसे मिसाइल बनाए गए। देश में सैनिक उपग्रह भी सन 2012 के बाद विकसित हुए हैं। नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए हमले के बाद इस दिशा में प्रगति हुई। सन 2010 में रक्षा मंत्रालय ने इंटीग्रेटेड स्पेस सेल बनाने की घोषणा की थी, जिसके जिम्मे अंतरिक्ष सुरक्षा का काम था।   

अक्तूबर 2014 में भारतीय सेना के वरिष्ठ कमांडरों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरिक्ष के महत्व को समझने की सलाह दी। पिछले एक साल में इस दिशा में बड़े कदम उठाए गए हैं। डिफेंस स्पेस एजेंसी (डीएसए) की स्थापना नरेश चंद्रा समिति की सिफारिश पर की गई है, जिसने सन 2012 में सलाह दी थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा की नई चुनौतियों का सामना करने के लिए स्पेशल ऑपरेशंस और सायबर सुरक्षा के लिए अलग कमानों के साथ-साथ स्पेस कमांड का गठन करना चाहिए। 

स्पेस कमान

डीएसए एक अलग डिवीज़न स्तर की संरचना है। इसका नेतृत्व वायुसेना के एक अधिकारी के जिम्मे और इसका मुख्यालय बेंगलुरु में होगा। तीनों सेनाओं से जुड़ी सारी स्पेस मशीनरी की कमान इसके पास होगी। इसके अंतर्गत एंटी-सैटेलाइट (ए-सैट) क्षमता भी होगी, जिसका इस्तेमाल शत्रु के स्पेस में मौजूद उपग्रहों तथा अन्य उपकरणों को नष्ट करने के लिए किया जा सकेगा।

बेंगलुरु का चयन इसलिए किया गया, क्योंकि यहाँ इसरो का मुख्यालय है, जहाँ से देश के हर तरह के अंतरिक्ष कार्यक्रमों का संचालन होता है। इसे डिफेंस स्पेस रिसर्च एजेंसी (डीएसआरए) का समर्थन मिलेगा, जिसे स्पेस युद्ध की शस्त्र-प्रणालियाँ और तकनीक विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई है। इस एजेंसी को वैज्ञानिकों की एक टीम उपलब्ध कराई जाएगी, जो सैनिक अधिकारियों के समन्वय में काम करेगी। डीएसए में तीनों सेनाओं के सदस्य होंगे। 

इस साल जुलाई में इंडस्पेसएक्स नाम से एक विशेष आयोजन रक्षा मंत्रालय ने किया था। इस कार्यक्रम में स्पेस से संभावित खतरों का सैनिक नज़रिए से आँकलन और भारत की वर्तमान क्षमताओं का जायज़ा लिया गया था। इसमें अमेरिका, रूस और चीन के अंतरिक्ष वाहनों का जायज़ा भी लिया गया। इसमें सैनिक प्रतिनिधियों के अलावा रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ), इसरो, आईआईटी-मुंबई, ओआरएफ जैसे थिंकटैंक और निजी उद्योगों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।

इंडस्पेसएक्स कार्यक्रम का छायाचित्र

डायरेक्टरेट ऑफ इंडियन डिफेंस यूनिवर्सिटी (आईडीयू) स्पेस वॉरफेयर और तकनीक विषय पर मध्य स्तरीय अधिकारियों को प्रशिक्षण दे रहा है। इसमें अंतरिक्ष के शस्त्रीकरण और सैन्यीकरण, स्पेस ऑपरेशंस में आत्मरक्षा के लिए तैयारियाँ और उच्चस्तरीय तकनीक, अंतरिक्ष नवाचार और तकनीकी ज्ञान, इनर्शियल नेवीगेशन सिस्टम्स और सेंसर और अंतरिक्ष के सैनिक इस्तेमाल से जुड़े कानूनी पक्षों को शामिल किया गया है।  

विशेषज्ञता की दिशा में

देश के प्रारंभिक उपग्रहों का उद्देश्य असैनिक था, पर उनका उपयोग सेना भी करती थी। लेकिन सन 2013 में भारत ने अपना पहले सैनिक उपग्रह रुक्मिणी-जीसैट-7 का प्रक्षेपण किया। इसके बाद पिछले वर्ष दिसंबर में दूसरे सैनिक उपग्रह जीसैट-7ए का प्रक्षेपण किया।

इन दो के अलावा एक दर्जन के आसपास ऐसे उपग्रह और हैं, जो निगरानी रखने का काम कर रहे हैं और अंतरिक्ष से छायाचित्र भेज रहे हैं। जीसैट-7ए मुख्यतः वायुसेना के लिए और आंशिक रूप से थलसेना के लिए काम करेगा। एक संचार उपग्रह लाइव फीड उपलब्ध कराता है और सैकड़ों किलोमीटर दूर उड़ान भर रहे विमान के साथ संपर्क बनाए रखने में मददगार होता है। 

रुक्मिणी का इस्तेमाल नौसेना करती है। यह उपग्रह अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और मलक्का जलडमरूमध्य के संकरे मार्ग पर नज़र रखता है। जीसैट-7ए वायुसेना के विभिन्न ग्राउंड रेडार स्टेशनों, ग्राउंड एयरबेस आकाश में उड़ान भर रहे एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंट कंट्रोल (अवॉक्स) विमानों को जोड़कर रखता है।

इस वर्ष इसरो ने सामरिक महत्व के पाँच उपग्रहों के प्रक्षेपण की योजना बनाई है। इनमें चार उपग्रह रिसैट सीरीज के और एक कार्टोसैट-3 होगा, जिसका प्रक्षेपण संभवतः अक्तूबर में ही होगा। रिसैट सीरीज के एक उपग्रह का प्रक्षेपण मई में हो चुका है। इसका भी सैनिक और असैनिक उपयोग संभव है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।