भारती
दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की प्रारंभिक कमी का खरीफ फसल पर क्या हो रहा प्रभाव

प्रसंग- अल नीनो के प्रभाव और जीडीपी में खेती के दुर्बल योगदान के कारण दक्षिणी-पश्चिमी मानसून पर निगाहें टिकी हुई हैं।

देश में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के प्रवेश को एक माह से अधिक हो गया है और यह समय है भारतीय कृषि परिदृश्य में झाँकने का। इस वर्ष में मानसून पर इतना ध्यान दिए जाने के एक से अधिक कारण हैं।

पहला यह कि अनुमान लगाया गया था कि इस वर्ष मानसून पर अल नीनो का प्रभाव रहेगा। अल नीनो एक मौसमी घटना है जो वर्षा को प्रभावित करती है और प्रशांत महासागर में समुद्री तल के तापमान के बढ़ने के कारण सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न करती है।

दूसरा कारण है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में भारतीय कृषि का अदिक योगदान नहीं रहा है, विशेषकर पिछले दो वर्षों में जहाँ इसका योगदान 3 प्रतिशत से भी कम रहा।

किसानों के लिए सुखद समाचार यह है कि सरकार ने मुख्य फसलों जैसे अनाज, मोटे अनाज, तेल बीज, दाल और कपास के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि की घोषणा की है। 3 जुलाई को कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने फसलों के एमएसपी में 1 से 9 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की थी। केंद्र ने उन अनाजों को प्रोत्साहन का संकेत दिया है जो कम पानी की लागत में उगाए जाते हैं जैसे मोटे अनाजों की एमएसपी वृद्धि दर अधिक है।

इन परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि समय पर वर्षा से मानसून किसानों की सहायता करे। जुलाई के प्रथम सप्ताह तक वर्षा सामान्य से 14 प्रतिशत कम रही थी लेकिन इसने देर से ही सही, गति पकड़ी है। 10 जुलाई तक देश में 28 प्रतिशत अतिरिक्त वर्षा हुई थी।

भारतीय कृषि के साथ समस्या यह है कि 36 में से 14 मौसमी उपखंडों में वर्षा कम हुई है। हालाँकि पिछले सप्ताह से यह स्थिति बेहतर है जब 26 उपखंडों में कम वर्षा हुई थी। दुर्भाग्यवश किसी भी उपखंड में अतिरिक्त वर्षा नहीं हुई है जो दर्शाता है कि इस वर्ष अल नीनो कैसे मानसून को प्रभावित कर रहा है।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, तमिलनाडु और दक्षिणी गैर-तटवर्ती कर्नाटक में वर्षा में 40 प्रतिशत से अधिक की कमी देखी गई है। सौराष्ट्र, गुजरात के कच्छ, मराठवाड़ा और महाराष्ट्र के विदर्भ में भी कम वर्षा से चिंता की स्थिति बनी हुई है।

राज्यों की बात करें तो केवल एक स्थान- दादर और नागर हवेली में सामान्य से अधिक वर्षा हुई है, वहीं चार राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश, दमन और दीऊ एवं अंडमान द्वीपसमूह में सामान्य वर्षा हुई है। अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा, सिक्कीम, बिहार उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, ओडिशा, गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में भी सामान्य वर्षा हुई है। अन्य 17 राज्यों में कम वर्षा हुई है।

वर्षा के अभाव के कारण देश के 91 प्रमुख जलाशयों का भंडारण स्तर 10 वर्षों के औसत से नीचे चला गया है। 161.99 अरब क्यूबिक मीटर (बीसीएम) की क्षमता के समकक्ष भंडारण में केवल 35.018 बीसीएम जल ही है, यानी कि क्षमता का 21.7 प्रतिशत। पिछले वर्ष यह स्तर 1 प्रतिशत से अधिक 37.221 बीसीएम था, वहीं 10 वर्षों का औसत 37.114 बीसीएम है।

महाराष्ट्र के कम से कम चार जलाशयों में क्षमता के 30 प्रतिशत से कम जल है और यह लाइव स्टोरेज के स्तर से कम है। नागार्जुन सागर में भी जल लाइव स्टोरेज स्तर से नीचे है, वहीं ऐसी ही परिस्थिति तमिलनाडु के अलियार में भी है। कर्नाटक के दो जलाशयों में क्षमता के 30 प्रतिशत से कम जल है। देश के कुल 15 जलाशयों में भंडारण स्तर 30 प्रतिशत से कम है।

इस कारण खरीफ की बुआई में 9 प्रतिशत की गिरावट हुई है। कृषि मंत्रालय के अनुसार खरीफ की बुआई 41.33 मिलियन हेक्टेयर (एमएच) क्षेत्र में हुई है जबकि पिछले वर्ष इस समय यह आँकड़ा 45.23 एमएच का था। यह एक सामान्यीकृत डाटा है।

बुआई आँकड़ों को देखकर पता लगता है कि मूँगफली और कपास के अलावा सभी खरीफ फसलों की बुआई कम हुई है। चावल उगाने वाले राज्यों की बढ़ती संख्या के बीच हरियाणा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख राज्यों में इसकी बुआई कम हुई है। कुल मिलाकर इस वर्ष 1.2 एमएच कम क्षेत्र में चावल उगाए गए हैं, वहीं सामान्य आवृत्त क्षेत्र 2.35 एमएच का रहता है।

वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक दाल की बुआई भी पिछले वर्ष की तुलना में 1.15 एमएच कम है। चिंता का विषय दाल के मुख्य राज्यों- कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में आवृत्त क्षेत्र की कमी है। अरहर या तूर दाल की बुआई 0.34 एमएच कम हुई है। उड़द दाल की बुआई पिछले वर्ष की तुलना में 0.3 एमएच कम हुई है।

मोटे अनाजों की बुआई में 0.5 एमएच की कमी है जिसमें से जोवार में सबसे अधिक 0.2 एमएच और इसके बाद बाजरे में 0.14 एमएच की गिरावट हुई है। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और बिहार जैसे प्रमुख राज्यों से भी कम बुआई रिपोर्ट की गई है। तेल बीजों में से सोयाबीन की बुआई सबसे कम हुई है। पिछले वर्ष की तुलना में इसकी बुआई 1.21 एमएच कम हुई है। भारत के सोयाबीन केंद्र मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी सोयाबीन की बुआई कम हुई है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे अन्य मुख्य राज्यों में भी कम बुआई रिपोर्ट की गई है। गुजरात में मूँगफली की बुआई 0.5 एमएच अधिक हुई है।

सूखे जैसी स्थिति में अपेक्षा थी कि गन्ने की खेती में गिरावट आएगी। अपेक्षानुसार इसकी बुआई 0.2 एमएच कम हुई है और महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे प्रमुख राज्यों में भी कमी देखी गई है।

कपास के क्षेत्र में वृद्धि हुई है क्योंकि अक्टूबर 2018 से सितंबर 2019 तक कम फसल उगाई गई जिसने दामों को बांधा रखा। इसके परिणामस्वरूप फाइबर फसल का क्षेत्रफल 20,000 हेक्टेयर से बढ़ गया है। राजस्थान, पंजाब, मध्य प्रदेश, गुरात और हरियाणा में क्षेत्रफल बढ़ा है, वहीं महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में यह घटा है।

आशा है कि चावल सामान्य बुआई तक पहुँच जाएगा। पिछले वर्ष भी शुरुआत में धान की बुआई सामान्य से कम थी लेकिन यह बढ़ी और सरकार के अनुमान के अनुसार रिकॉर्ड 114 मिलियन टन की बुआई हुई थी। लेकिन, सोयाबीन और दालों जैसी फसलें कम बुआई से बढ़कर सामान्य स्तर पर पहुँच पाएँ, इसकी संभावना कम है। मोटे अनाज का क्षेत्रफल बढ़े इसकी भी संभावना है क्योंकि प्रायः सरकार मौसम के अंत में इन फसलों की बुआई को प्रोत्साहित करती है क्योंकि वे कम पानी सोखते हैं।

कुल मिलाकर, कम वर्षा के कारण खरीफ फसल कठिन समय का सामना कर रही है। हालाँकि, अच्छा समाचार यह है कि अल नीनो का प्रभाव कम हो रहा है और आने वाले सप्ताहों में वर्षा अधिक होगी। संभवतः देर से हुई वर्षा के कारण रबी फसल, जो नवंबर से बोई जाती है, को नमी युक्त मिट्टी मिलेगी। यह संभवतः किसानों को खरीफ के नुकसान की पूर्ति करने का अवसर देगी।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani द्वारा ट्वीट करते हैं।