भारती
गाँवों के लिए कूड़ा प्रबंधन के दिशानिर्देश स्पष्ट और सटीक लेकिन कैसे होंगे प्रभावी

शहरों में स्वच्छ भारत अभियान हर दृष्टि से शहर स्वच्छता को सुनिश्चित करने के लिए रहा, जहाँ कूड़ा प्रबंधन और निस्तारण से लेकर सार्वजनिक स्थानों की सफाई और मलजल उपचार तक ध्यान दिया गया। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण स्वच्छ भारत का केंद्रबिंदु केवल गाँवों को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) करना ही रहा।

ऐसा नहीं है कि सर्व-समावेशी स्वच्छता उनका लक्ष्य नहीं थी लेकिन यह उस प्रकार युद्ध स्तर पर नहीं किया गया जैसे ओडीएफ अभियान चलाया गया। संभवतः ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि कोई निश्चित मानदंड नहीं थे। लेकिन अब राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (एनआईआरडीपीआर) ने ग्राम पंचायतों के लिए कूड़ा प्रबंधन के लिए एक दिशानिर्देश तैयार किए हैं।

इन दिशानिर्देशों में ग्रामीणों, स्वच्छता कर्मचारियों व ग्राम पंचायतों, सभी के दायित्व उल्लेखित हैं। और यह कोई सैद्धांतिक तौर पर तैयार किए गए दिशानिर्देश नहीं बल्कि व्यवहार्य दिशानिर्देश हैं क्योंकि इनका प्रेरणास्रोत रहें हैं वे ग्राम जिन्होंने अपने यहाँ एक कुशल प्रणाली को लागू करके दिखाया है।

स्वच्छता के प्रति सबसे पहला कदम जागरूकता का होता है। सभी गाँव जिनका अध्ययन किया गया, वहाँ जागरूकता के बाद ही स्वच्छता आई। दिशानिर्देश लोगों को जागरूक करने का दायित्व ग्रामीण प्राधिकरणों को सौंपते हैं। ग्राम जल एवं स्वच्छता समिति नियुक्त की जाएगी जो ग्राम पंचायतों के साथ मिलकर लोगों को नियुक्त सफाईकर्मियों को ही कचरा देने और कचरा पृथक्करण के प्रति जागरूक करेगी।

एक तरफ पंजाब के चाकर और हरियाणा के कुरक जागीर में जहाँ ग्राम सभाओं में चर्चा और गाँवों के अप्रवासी भारतीयों के प्रभाव के कारण जागरूकता लाई गई, वहीं हरियाणा के झाटीपुर गाँव में 2016 में निर्वाचित एक उच्च शिक्षा प्राप्त सरपंच गाँव में जागरूकता लेकर आए। पंजाब के खादूर साहिब में यह जागरूकता एक धर्मगुरु पद्मश्री बाबा सेवा सिंह के माध्यम से आई।

इस प्रकार हम पाते हैं कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों के माध्यम से जागरूकता अभियान का कार्य जल्दी हो सकता है। संत बलबीर सिंह सीचेवाल ऐसी जागरूकता पंजाब और हरियाणा के कई गाँवों में लेकर आए। वे 2013 तक स्वयं पंजाब के सीचेवाल गाँव के सरपंच रहे थे।

संत बलबीर सिंह सीचेवाल

दूसरी बात जो दिशानिर्देश कहते हैं, वह यह है कि शहरों की भाँति ही गाँवों में घरों/दुकानों से कचरा इकट्ठा किया जाएगा और सड़कों की निर्धारित अवधि में सफाई होगी। साथ ही वे कूड़ा निस्तारण के लिए जैविक कचरे से खाद बनाने, पुनर्चक्रण (रिसाइक्लेबल) कूड़े को रिसाइकल कर बेचकर राजस्व इकट्ठा करने और बचे हुए कूड़े को स्वच्छ लैंडफिल स्थल पर नियमित रूप से फेंकने के निर्देश देते हैं।

ऐसा झाटीपुर गाँव में किया गया जहाँ गाँव के 600 घरों को मुफ्त में कचरे का डिब्बा दिया गया। वहाँ ई-रिक्शा के माध्यम से कचरा इकट्ठा किया जाता है और रिक्शा सफाईकर्मी का वेतन भुगतान रिसाइकल वस्तुओं से प्राप्त राशि से होता है।

झाटीपुर गाँव की वर्मी कम्पोस्ट इकाई

गाँव के बाहरी क्षेत्र में ही जिला उपायुक्त की सहायता से कूड़ा उपचार संयंत्र लगाया गया और मनरेगा के माध्यम से वर्मी-कम्पोस्ट की दो इकाइयाँ भी शुरू की गईं। खेत की स्वास्थ्य जाँच के बाद किसानों को उपयुक्त मात्रा में यह खाद बाँटा गया। गाँव से दूर संयंत्र सीचेवाल में भी स्थापित किया गया है और जैविक कचरे के खाद का उपयोग भी ग्रामीणों ने किया।

पंजाब के खादूर साहिब में ट्रैक्टर-ट्रॉली के द्वारा कचरा इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद विभिन्न वर्गों में कूड़े का पृथक्करण होता है। जैविक कचरे को खेतों के लिए किसानों को दिया जाता है। इसी प्रकार कुरक जागीर में साइकल रिक्शा से कचरा इकट्ठा किया जाता है और बासमती चावल उगाने वाले इस गाँव को वर्मी कम्पोस्ट के खाद ने लाभ भी पहुँचाया है।

दिशानिर्देश की कुछ बातें ऐसी भी हैं जो इन अध्ययन का विषय रहे गाँवों में नहीं देखी गई हैं जैसे बायो-मीथेनेशन या कम्पोस्ट बनाने के लिए घरों में ही व्यवस्था हो। इससे यह होगा कि स्रोत पर ही कचरे का निस्तारण हो जाएगा और परिवहन व प्रसंस्करण का खर्च बचेगा। इसे गृह की बजाय सामुदायिक स्तर पर भी किया जा सकता है।

स्थानीय निकायों के अधीन आने वाले बाग-बगीचों के लिए निर्देश है कि अगले दो वर्षों में वे रसायनिक खाद से पूर्णतः मुक्त होकर मात्र कचरे से बनी जैविक खाद का ही उपयोग करें। लैंडफिल में कुल कचरे का 10-15 प्रतिशत से अधिक न फेंका जाए, यह सुनिश्चित करने का दायित्व भी स्थानीय निकायों का ही होगा।

कूड़ा प्रसंस्करण के लिए सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने का कार्य स्थानीय निकायों को ही निजी क्षेत्र या किसी एजेंसी की सहायता से करना होगा। इसका उत्कृष्ट उदाहरण हम झाटीपुर गाँव में देख सकते हैं जहाँ उन्होंने गाँव के निकट स्थित औद्योगिक क्षेत्र का लाभ कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के माध्यम से उठाया। सीएसआर कोष के द्वारा वहाँ वर्षा जल संचयन और ई-शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराई गई।

इस व्यवस्था को वित्तीय रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए उपभोक्ता शुल्क वसूलने का भी सुझाव दिया गया है। साथ ही स्वच्छता नियमों का उल्लंघन करने वालों से जुर्माना वसूलने का अधिकार भी ग्राम स्वच्छता समिति का होगा। उपरोक्त अध्ययनों में से केवल कुरक जागीर गाँव में ही शुल्क वसूला जाता था, जहाँ हर उपभोक्ता को मासिक रूप से 30 रुपये देने होते हैं।

उपभोक्ता का दायित्व है कि वह अपने स्तर पर ही कचरा पृथक करे लेकिन इसके बावजूद भी कुछ उपभोक्ता ऐसा नहीं करते। दिशानिर्देश कहते हैं कि ऐसे उपभोक्ताओं से अतिरिक्त शुल्क लिया जाए क्योंकि उनके कारण सफाईकर्मियों का कार्यभार बढ़ता है।

बचे हुए खाने को जानवरों का देने का सुझाव दिया गया है लेकिन यदि यह सहज न हो तो लोगों के लिए निर्देश है कि वे हरा निशान लगाकर कागज़ में लपेटकर वह सफाईकर्मियों को दें। लाल निशान के साथ ऐसा ही विशिष्ट ढेर सैनिटरी पैड, डायपर और कॉन्डम के लिए भी बनाया जाए क्योंकि ये हानिकारक कचरे हैं और इनका पृथक रहना आवश्यक है।

गाँवों में प्रायः समारोहों के बाद कूड़ा निस्तारण का प्रबंध नहीं रहता है। इसके लिए नियम है कि 100 से अधिक लोगों का समारोह स्थानीय निकाय को तीन दिन पूर्व जानकारी दिए बिना न हो। समारोह के आयोजक का ही दायित्व रहेगा कि वह कचरे का पृथक्करण सुनिश्चित करे और नियुक्त सफाईकर्मी को सौंपे।

इस प्रकार एनआईआरडीपीआर द्वारा जारी ये दिशानिर्देश सर्व-समावेशी प्रतीत होते हैं जहाँ सभी के दायित्वों के साथ-साथ कार्य प्रणाली और मानदंडों का भी विवरण है। लेकिन एक समस्या यह है कि इसमें सर्वेसर्वा ग्राम पंचायत ही है। कुछ प्रावधान ऐसे होने चाहिए जो सुनिश्चित करें कि ग्राम पंचायत इन दिशानिर्देशों का पालन करे। तभी हमें गाँवों में उत्कृष्ट व्यवस्था को फलीभूत होता देख पाएँगे।