भारती
कूड़ा प्रबंधन को बल देंगे केंद्र के पदार्थ पुनः प्राप्ति और लैंडफिल सुधार के लिए परामर्श

विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) पर केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कूड़ा प्रबंधन पर तीन परामर्श जारी किए थे जिनमें से दो इस बात पर केंद्रित हैं कि आपके घर से कूड़ा जाए, उसके बाद उसका उचित प्रबंधन कैसे हो। हम समझेंगे कि कूड़े से आवश्यक पदार्थ को पुनः प्राप्त करने और लैंडफिल (जहाँ कूड़ा निस्तारित किया जाता है) स्थल पर सुधार के लिए जो परामर्श दिए गए हैं, वे कैसे सहायक हैं।

2016 में कूड़ा प्रबंधन के नियम जारी किए गए थे जिसमें पदार्थ पुनः प्राप्ति सुविधा (एमआरएफ) की स्थापना को अनिवार्य बताया गया था लेकिन इन सुविधाओं की संरचना और क्रियान्वयन का विवरण नहीं था, वह समझाने के लिए अब यह परामर्श जारी किया गया है।

इसी प्रकार लैंडफिल की बायो-माइनिंग और बायो उपचार की भी बात की गई थी लेकिन बहुत कम शहरी निकायों ने इसपर कार्य किया है। अब यह परामर्श समझाता है कि अलग-अलग शहरों में क्या कार्यशैली अपनाई जाए। साथ ही नियोजन, टेंडरिंग और ठेकेदार चुनने पर भी सलाह देता है।

पदार्थ पुनः प्राप्ति सुविधा

एमआरएफ का अर्थ ऐसी सुविधा से है जहाँ थोड़े समय के लिए अजैविक कूड़े को रखा जा सके और वहाँ पृथक्करण करके उसे रीसाइकल करने योग्य अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा जाए। प्रसंस्करण के पश्चात इन वस्तुओं के पुनः उपयोग या अन्य उद्योगों को कच्चे माल के रूप में बेचने का लक्ष्य रहता है जो राजस्व का स्रोत बन सके।

बड़े स्तर पर अलग-अलग प्रकार के एमआरएफ हो सकते हैं- मिश्रित जहाँ मिश्रित कूड़ा आता है और फिर इसका पृथक्करण होता है, सूखा एमआरएफ जहाँ रीसाइकल होने योग्य कूड़ा ही आता है और फिर इसे विभिन्न श्रेणियों के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है।

मोटे तौर पर कूड़े को छाँटने के बाद यांत्रिकी प्रक्रियाओं के माध्यम से वर्गीकरण किया जाना चाहिए। इलेक्ट्रोमैग्नेट की सहायता से लोहे के टुकड़े अलग किए जाते हैं, वहीं ज़िंक, एलुमिनियम, ताबें, सीसा जैसे दूसरे धातुओं को  बिजली प्रवहकत्व के आधार पर अलग किया जाता है।

परामर्श के अनुसार एमआरएफ को सड़क के पास और शहरी क्षेत्र में ही होना चाहिए। यदि यह संभव नहीं हो पाता है तो एमआरएफ को औद्योगिक क्षेत्र या लैंडफिल स्थल के निकट होना चाहिए परंतु बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में यह न हो इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।

शहर के आकार के अनुसार एमआरएफ की संरचना तय की जानी चाहिए। जैसे 50,000 से कम की जनसंख्या तीन से पाँच एमआरएफ स्थापित किए जाएँ जिनकी क्षमता 1/2/5 टन प्रतिदिन हो। ऐसा डुंगरपुर में हुआ है लेकिन वहाँ 10 टन प्रतिदिन की क्षमता वाला एक ही केंद्रीकृत एमआरएफ है।

डुंगरपुर; बाएँ- छोटा संयंत्र होने के कारण हाथों से ही कूड़े की छँटाई करती महिलाएँ; दाएँ- वर्गीकृत गत्ता

0.5-1 लाख की जनसंख्या वाले शहरी निकायों को 1/2/5/10 टन प्रतिदिन की क्षमता वाले तीन से पाँच एमआरएफ स्थापित करने चाहिए। ऐसा राजपुरा में किया गया है जहाँ पाँच ज़ोनों को मिलाकर कुल 20 टन की क्षमता वाले संयंत्र हैं। यह सितंबर 2019 से क्रियाशील है।

1-5 लाख की जनसंख्या वाले शहरी निकायों को परामर्श 50/75/100 टन प्रतिदिन की क्षमता वाले दो से पाँच एमआरएफ स्थापित करने का सुझाव देता है। इसी प्रकार 5-10 लाख की जनसंख्या वाले शहरों को 100-100 टन प्रतिदिन की क्षमता वाले दो से पाँच एमआरएफ लगाने चाहिए।

10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरों को 100/200/300 टन प्रतिदिन की क्षमता वाले दो से सात एमआरएफ स्थापित करने चाहिए। इंदौर ने 300 टन प्रतिदिन की क्षमता वाला एमआरएफ लगाया है जो पूर्ण रूप से स्वचालित और मशीनीकृत है।

25 करोड़ रुपये के पूंजी निवेश और क्रियान्वयन पर प्रति माह 70-80 लाख रुपये के खर्च के साथ यह संयंत्र सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) मॉडल पर आधारित है और सितंबर 2019 से क्रियाशील है। यहाँ ऑप्टिकल पृथक्करण तकनीक और रोबोटिक्स के माध्यम से रीसाइकल योग्य कूड़े को 13 श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है।

लैंडफिल सुधार

बायो उपचार के लिए पुराने कचरे के ढेर का उपचार और निपटान करना होगा। स्थल का इतिहास, कूड़े की सामग्री, भूमि और भूमिगत मिट्टी एवं पानी तथा वर्षा, वायु दिशा जैसी जानकारी कार्य शुरू करने से पहले हमारे पास होनी चाहिए।

बायो उपचार के लिए कूड़ा स्थल पर कार्य करने की जगह व उपचार के बाद बनने वाले उत्पादों को खपाने का विकल्प उपलब्ध होना चाहिए। जहाँ संसाधन, कार्य करने की जगह और उपचार पश्चात के उत्पादों को खपाने का विकल्प न हो, वहाँ कैपिंग की जाती है।

इसमें कूड़े के ढेर को मिट्टी से ढक दिया जाता है, सतही नालियों, कूड़े के नीचे से बहकर निकलने वाले पानी (लीचेट) और गैस संग्रहण का प्रबंधन किया जाना चाहिए। इसे हरित स्थल बनाया जा सकता है लेकिन इसमें हानि यह है कि न भूमि उपयोगी बन पाती है न वित्तीय लाभ है।

इसमें अधिक पर्यावरण अनुमतियों की आवश्यकता नहीं होती लेकिन समय-समय पर इसकी निगरानी करनी पड़ती है। यह कार्य जल्दी और कम लागत पर पूरा हो सकता है लेकिन लीचेट और गैस का संग्रहण एक समस्या रहती है।

बायो उपचार में ढेर के लगभग 50-60 प्रतिशत कूड़े को निकालकर प्रसंस्कृत किया जाता है और आवश्यक वस्तुओं को बेच दिया जाता है, वहीं निष्क्रिय वस्तु से स्थल को ढक दिया जाता है। यह प्रक्रिया भूमि को फिर से उपयोगी बनाने की प्रक्रिया से सस्ती और त्वरित है। साथ ही इससे कूड़े को भी कम कर दिया जाता है।

वहीं यदि हम भूमि को पुनः प्राप्त करने का लक्ष्य कर रहे हैं तो पूरे ढेर का ही प्रसंस्करण करके आवश्यक वस्तुओं को उसमें से निकाल लेना चाहिए। लेकिन यह प्रक्रिया अधिक लागत वाली, भारी मशीनों और अधिक समय की माँग करने वाली है। साथ ही इसके लिए विशेषज्ञ ठेकेदारों की भी कमी है।

इस काम को करने के लिए नगर निगमों के पास तीन मॉडलों का विकल्प है- पूर्ण रूप से ठेके पर दिया जाना जिसमें संयंत्र से लेकर कूड़े निपटान का पूरा दायित्व ठेकेदार का ही होता है। ऐसा तिरुपति में हुआ जहाँ रामपुरम कचरे के ढेर का बायो-माइनिंग के माध्यम से सुधार करने के लिए 18.64 करोड़ का अनुबंध ज़िग्मा ग्लोबल एन्वायरन सॉल्यूशन्स प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था जिसे इसी वर्ष 12 जुलाई तक पूरा करना है।

दूसरे विकल्प में पूरा कार्य नगर निगम करता है और केवल आवश्यक मशीनों को किराए पर लिया जाता है। अहमदाबाद नगर निगम ने स्वयं 84 एकड़ के क्षेत्र में फैले पीराना के 80 लाख टन कचरे के ढेर की बायोमाइनिंग शुरू की। अब तक 10 लाख टन कूड़े का प्रसंस्करण करके 8.85 एकड़ भूमि को पुनः उपयोगी बनाया जा सका है। तीसरे विकल्प के तहत नगर निगम और निजी संचालक मिलकर काम कर सकते हैं।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।