भारती
सामाजिक सहयोग के लिए तत्पर व्यक्ति का धन भी औरों के काम आता है- कुरल भाग-7

सामाजिक सहयोग

1. पृथ्वी के प्राणियों ने आकाश के बादलों के लिए क्या किया है जो वे हमपर वर्षा करते हैं? उसी प्रकार आपको समाज सेवा करनी चाहिए, प्रतिफल में कुछ चाहे बिना।

2. अच्छे मनुष्य उद्योग स्थापित करते हैं और धन उत्पन्न करते हैं लेकिन स्वयं के लिए नहीं, समाज के लिए।

धन स्वभोग या लालच की पूर्ति के लिए नहीं कमाया जाना चाहिए। धन को परोपकार करने के एक साधन के रूप में देखना चाहिए। तमिल शब्द वेळण्मै  का अर्थ सिर्फ सहयोग नहीं है बल्कि कर्तव्य के भाव से किए गए सहयोग को वेळण्मै कहते हैं।

3. किसी की सहायता करने से मिलने वाले सुख इस संसार या किसी दूसरे संसार में मिलने वाले किसी भी सुख जितना बड़ा सुख नहीं है। इस दुर्लभ सुख के अवसर को न खोएँ।

4. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक सहयोगी की तरह जीने वाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में जीवन जी रहा है। जो इस कर्तव्य को नहीं समझता है, वह मृत व्यक्ति के समान है।

5. जब एक समझदार व्यक्ति, जो साथियों के प्रति अपने कर्तव्यों को समझता है, के पास संपन्नता आती है तो वह गाँव की टंकी में वर्षा का जल भरने के समान होती है।

जब गाँव की टंकी वर्षा के जल से भर जाती है तो यह पूरे समुदाय के लिए हर्ष का विषय होती है। टंकी पानी को व्यर्थ में बहने से रोकती है, साथ ही सूखे के समय का भी सहारा होती है और साल भर लोगों की प्यास बुझाती है। सरकार को ऐसी ही खुशी अनुभव करनी चाहिए जब कोई अच्छा व्यक्ति संपन्न होता है।

6. जब एक उदार-हृदयी व्यक्ति के पास धन आता है तो यह गाँव के वृक्ष में फल आने के समान होता है।

अपने गाँव के पेड़ पर पका फल मिलने का सुख एक उदार-हृदयी व्यक्ति के पास संपन्नता आने को दर्शाता है, जो यह सुख सबमें बाँटेगा क्योंकि उसके लिए यह संपन्नता एक अवसर के समान है।

7. यदि एक उदार-हृदयी व्यक्ति के पास धन आता है तो वह समाज के लिए एक औषधीय पौधे के समान होता है जो हर समस्या का समाधान कर देता है।

बुद्धिमान व्यक्ति सेवा भाव से धन संग्रहित करता है, उसी प्रकार जैसे गाँव की टंकी व्यर्थ बहते पानी को संग्रहित करती है। जैसे गाँव के पेड़ में फल लगते हैं, वैसे ही उदार हृदयी व्यक्ति अपनी संपत्ति को दूसरों की सहायता हेतु व्यय करता है।

औषधीय पौधा प्रकृति का एक अमूल्य रसायन-विद् है। इसके पत्ते, फल, छाल और जड़ पृथ्वी से उन तत्वों को खोज निकालते हैं जो हर प्रकार की बीमारी का समाधान दे देते हैं। उसी प्रकार जैसे भले मनुष्य की संपत्ति, हर प्रकार की समस्याओं के समाधान हेतु प्रयुक्त होती है। उसका ज्ञान और अनुभव उस रसायन-विद्वता की तरह काम करता है जो समाज के कल्याण के लिए संपत्ति को उपयोगी बनाती है।

8. जिन्हें जीवन कर्तव्यों का आभास होता है, निर्धनता उनको अपना कर्म करने से नहीं रोक पाती। वे परेशानी झेलते हुए ही समाज सेवा जारी रखते हैं।

सहायता करने के लिए धनवान होने की आवश्यकता नहीं है। कई तरीके हैं जिससे किसी भी परिस्थिति में रहते हुए सहायता की जा सकती है। समाज सेवा का कार्य मस्तिष्क से शुरू होता है।

हर बदली हुई परिस्थिति में एक नया कर्तव्य आवश्यक हो जाता है और उसे पूरा किया जाना चाहिए। इसलिए जब कोई व्यक्ति अपने भौतिक साधनों को खो देता है तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि उसने सामाजिक सहयोग की क्षमता खो दी है। तमिल शब्द ओप्पुरवु  का अर्थ सक्रिय सामाजिक सहयोग और इसमें निहित परोपकार की भावना हैं।

9. एक उदार-हृदयी व्यक्ति को निर्धनता में सबसे बड़ा कष्ट इस बात का होता है कि अब उसके पास दूसरों की सेवा करने के लिए संसाधन नहीं हैं, जिसकी उसे आदत थी।

10. यदि आपको लगता है कि सामाजिक सहयोग से आप खुद को बर्बाद कर रहे हैं तो सोचिए कि यह कार्य अपना सर्वस्व लुटैाने के योग्य है। यदि अपने आसपास के लोगों की सेवा के लिए आवश्यकता हो तो आपको स्वयं को दासता हेतु भी बेच देना चाहिए।

समाज के काम आने के लिए कितना भी मूल्य दिया जाए, वह कभी अतिरिक्त नहीं होगा।