भारती
शिहाबुद्दीन के ब्यौरों में देखें कुओं-झीलों में छुपाया गया सोना, दिल्ली में मुफ्तखोरी- भाग 31

आइए सीरिया की राजधानी दमिश्क में मुलाकात करते हैं शिहाबुद्दीन अल उमरी से। वह 1301 में पैदा हुआ था, लेकिन हिंदुस्तान कभी नहीं आया। दमिश्क और काहिरा में ही उसने पढ़ाई की। शिहाबुद्दीन 25 साल का होगा, जब दिल्ली मोहम्मद तुगलक के कब्ज़े में थी।

यह वह समय था जब दिल्ली में बाहरी मुसलमानों को कब्ज़ा किए हुए 125 साल गुज़र चुके थे। गुलामों और खिलजियों के बाद अब तुगलकों की सल्तनत थी और ये सारे ही सुल्तान बाहरी मुसलमानों को अतिरिक्त योग्य मानकर बहुत अहमियत दिया करते थे। दिल्ली आने पर उन्हें बेहिसाब तोहफे, पद और जागीरें मिलती थीं।

आप अरब, इराक और मिस्त्र से आए हैं, यही काफी है हिंदुस्तान के किसी न किसी इलाके पर कब्ज़ा जमाने के लिए! शिहाबुद्दीन अल उमरी 1348 तक ही जीवित रहा, लेकिन हमारे लिए उसके पास बेशकीमती जानकारियों का खजाना है।

दिल्ली में चारों तरफ से आ रहे लूट के माल को दरियादिली से बाँटने की ये चमचमाती खबरें दूर दमिश्क में बैठे शिहाबुद्दीन अल उमरी को भी मिल रही हैं। वह रोमांचित है। उसे दौलत से मालामाल हिंदुस्तान में इस्लामी हुकूमत से कमाल की खबरें उन कारोबारियों और यात्रियों ने लौटकर दीं, जो दिल्ली घूमकर गए और यहाँ हिंदुस्तान के अलग-अलग इलाकों को भी जाकर बेहद करीब से देखा।

वह दिल्ली से दूर दमिश्क में बैठकर गजब के ब्यौरे संकलित कर रहा है। ऐसे 12 प्रमुख लोगों के नाम भी उसने दर्ज किए हैं, जिनसे वह हिंदुस्तान के बारे में ढेर सारी जानकारियाँ जुटा रहा है। इन्हीं में एक शेख बुरहानुद्दीन अबू बक्र का नाम ऊपर है।

125 साल से लुटपिट रहे इस मुल्क में तब दक्षिण के दूरदराज हिंदू राज्य कितने समृद्ध थे और पीढ़ियों से जमा खजानों में क्या-क्या था, इसकी शानदार झलक भी उसके रिकॉर्ड में है। शिहाबुद्दीन अल उमरी ने अपनी डायरी में दर्ज किया है-

हिंदुस्तान के बारे में मैंने हिसाब लगाया है कि 3,000 साल से इन लोगों ने विदेशों को सोना निर्यात नहीं किया है। जो कुछ भी यहाँ आ गया है, वह बाहर नहीं जा सका है। कारोबारी शुद्ध सोना हिंदुस्तान लाते हैं और यहाँ से जड़ी-बूटियाँ और अरबी गोंद ले जाते हैं।

सोना जमा करने के लिए घरों में कुएँ

मोहम्मद तुगलक की एक महालूट का जिक्र भी उसके रिकॉर्ड में है। इसी के साथ वह आम हिंदुस्तानी लोगों के घरों में धन संग्रह और इसके तरीकों के बारे में जानकर हैरान है। उसी के शब्द-

मैंने सुना है कि इस सुल्तान ने एक फतह हासिल की और वहाँ से 13,000 बैलों पर सोना लदवाकर लाया। यह प्रसिद्ध है कि इस देश के लोग दौलत को जोड़कर बचाकर रखते हैं। उनमें से एक से पूछा गया कि उसके पास कितनी दौलत है। उसने जवाब दिया कि वह नहीं जानता। लेकिन “मैं दूसरी या तीसरी संतान हूँ, जो इस कुएँ में अपने दादा के धन को इकट्‌ठा कर रहा हूँ।

हिंदुस्तानी लोग अपने धन को जोड़कर रखने के लिए कुएँ खोदते हैं। इनमें से कुछ तो घरों में छेद बना लेते हैं और उसे हौज के रूप में बनाकर ऊपर से बंद कर देते हैं। सिर्फ एक छेद छोड़ दिया जाता है। यह लोग धोखे के भय से नक्काशी किया हुआ, टूटा हुआ या ईंट के टुकड़ों के रूप में सोना नहीं लेते। वे सिर्फ सोने के सिक्के ही लेते हैं।

समुद्री द्वीपों में ऐसे लोग भी हैं, जो घर की छत पर चिन्ह बनाकर रखते हैं। जब एक घड़ा सोने से भर जाता है तो वह चिह्न बना देते हैं। लोगों के यहाँ दस या इससे अधिक चिह्न होते हैं।

और अब जो विवरण वह बताने जा रहा है, उसे जानकर अलाउद्दीन खिलजी की देवगिरि की ऐतिहासिक लूट का रिकॉर्ड भी टूट जाएगा। जिस प्रांत का उसने जिक्र किया है वह स्थान संभवत: तेलंगाना ही है। यह विवरण भी उसे शेख बुरहानुद्दीन अबू बक्र से मिला है।

इसमें हम पहली बार इस रहस्य से रूबरू होते हैं कि प्राचीन समृद्ध हिंदू राज्यों के खजानों में किस तरह से सोना, चांदी और बेशकीमिती वस्तुएँ संग्रह करके रखी जाती थीं। उनके डिज़ाइन कैसे होते थे? जो विवरण उसने दिए हैं, उससे दक्षिण भारत की आँखें चौंधियाने वाली समृद्धि का एक शानदार परिचय हमें मिलता है।

ध्यान रखिए यह तब के ब्यौरे हैं जब दिल्ली के आसपास के राज्यों वर्तमान उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान का काफी कुछ हिस्सा कई-कई बार लूटे और रौंदे जाने के बाद स्थाई तौर पर तुर्क मुसलमानों के कब्जे में आ चुका था। गुजरात और बंगाल भी लगातार पिस रहे थे।

अब इन प्रांतों में तुर्क गुलाम ही मालिक (इन्हें मुक्ता कहा जाता था) बनाकर बैठा दिए गए थे, जो दिल्ली में काबिज सुलतान की आमदनी और लूट के लिए जाने वाली फुटकर फौज का नियमित जरिया बन गए। इन्हीं फुटकर फौजों को इकट्‌ठाकर दूरदराज इलाकों में लूट की जबर्दस्त मुहिमें भी लगातार जारी रहीं।

इन प्रांतों में काबिज सुलतान के भरोसेमंद तुर्क, नजदीकी रिश्तेदार या भाई-भतीजे अक्सर बगावत पर भी उतारू हो जाते थे और खुद को आज़ाद कर लेते थे। इनके बीच आपसी खूनखराबे से भरी जंगें भी होती रहीं। अब हिंदुस्तान की ज़मीन पर हिंदुस्तान के ही लूट के माल से लुटेरों के अलग-अलग झुंड आपस में भिड़ते रहे। मरने, लुटने और बरबाद होने के लिए हिंदुस्तान था, हिंदुस्तानी थे और वे हर सदी में थे।

जितना सोना चाहिए, ढोने वाले जानवर भेज दो

तेलंगाना की लूट के दौरान अंदर की खबर शिहाबुद्दीन अल उमरी से सुनिए- इस सुलतान ने अपनी सेना एक प्रांत में भेजी। यह प्रांत देवगिरि के पास उसकी सरहद के छोर पर है। यहाँ के लोग काफिर हैं। यहाँ का हर राजा राय कहलाता है।

जब सुलतान के फौजियों ने वहाँ पैर जमाए उसने एक दूत के जरिए युद्ध की बजाए धन देने का प्रस्ताव यह कहकर दिया कि सुलतान युद्ध न करे। इसकी एवज में धन के रूप में उसे जाे चाहिए दे दिया जाएगा। वह केवल बोझा ढोने वाले जानवर भेज दे, जितना धन वह ले जाना चाहता है।”

गौर कीजिए। हिंदू काफिर राजा एक तरह से खाली चेक पर दस्तखत करके दे रहा है कि जितनी रकम चाहे भर लीजिए। बस युद्ध मत कीजिए। सेनापति ने यह सूचना सुलतान को दी। सुलतान यह ऑफर पाकर हैरान हो गया। पहली ही बार कोई ऐसी दरियादिली दिखा रहा था कि जितना माल ले जा सकते हो ले जाओ।

जब वह राजा सुलतान के समक्ष हाजिर हुआ तो सुलतान ने उसे बड़ी इज्ज़त दी। वह बातचीत शिहाबुद्दीन ने शेख से सुनकर रिकाॅर्ड की है। आप भी सुनिए, सुलतान और राजा के बीच क्या तय हुआ। यह आंखें चौंधियाने वाला विवरण है-

सुलतान- “मैंने ऐसी बात पहले कभी नहीं सुनी, जो तुमने कही है। तुम्हारे पास कितनी दौलत है, जो तुमने मुझे कहला भेजा कि जितना धन मैं ले जाना चाहता हूँ उतने बोझा ढोने वाले जानवर भेज दूँ?

राय- “मुझसे पहले सात राय इस देश में हो चुके हैं। उनमें से हर एक ने धन की 70,000 बाईं संचित की हैं। वह सब मेरे पास अब भी है।

 एक ‘बाईं’ मतलब क्या? इसका डिजाइन कैसा माना जाए? राय ने बताया कि बाईं एक बहुत विस्तृत हौज होता है, जिसमें उतरने के लिए चारों तरफ से सीढ़ियाँ होती हैं। यह ब्यौरा सुनकर तो सुलतान हैरत में पड़ गया। उसने बाइंयों को अपने लिए सुरक्षित रखने के लिए अपने नाम की मुहर लगाने का हुक्म दिया। आखिर में वे सुलतान के नाम से मुहरबंद कर दी गईं।

इसके बाद उसने राय को हुक्म दिया कि वह इस प्रदेश में अपना प्रतिनिधि शासक नियुक्त कर दे, स्वयं दिल्ली में रहे और मुसलमान हो जाए। लेकिन उस राय ने इस्लाम कुबूल नहीं किया। आखिरकार सुलतान ने उसकी धर्म की स्वतंत्रता बनाए रखी। उस राय ने अपना प्रतिनिधि शासक नियुक्त कर दिया और स्वयं दिल्ली में सुलतान के दरबार में रहने लगा।

सुलतान ने उसे ऐसे सेवक दिए, जो उस जैसे राय की हैसियत के अनुकूल थे। सुलतान ने बाइंयों को किसी तरह हाथ नहीं लगाया। उनपर केवल अपने नाम की मुहर लगाकर उसी हालत में रहने दिया। सुलतान ने उसके देश को बहुत धन दान के रूप में लोगों को बाँटने के लिए यह कहकर भेजा कि अब वे लोग भी उसकी सल्तनत का हिस्सा हो गए हैं।

शिहाबुद्दीन अल उमरी ने यह विवरण शेख बुरहानुद्दीन अबू बक्र के हवाले से दर्ज करते हुए यह लिखा है कि शेख अपनी सच्चाई के लिए मशहूर है। जो कोई भी इसके विषय में अधिक जानकारी लेना चाहता है, वह ले सकता है।

हमें यह पता नहीं चलता कि उस राय का बाद में क्या हुआ? क्या वह कभी अपने राज्य में लौट पाया? उसके प्रतिनिधि शासक कब तक उस संचित दौलत को बचाकर रख पाए? वह राय दिल्ली में और वह प्रतिनिधि शासक अपना धर्म कब तक बचाकर रख पाए? क्या उन्होंने कभी इस्लाम कुबूल किया?

ये सारे सवाल इतिहास के अंधेरे में हैं, क्योंकि ये विवरण उस अपडेट स्थिति के हैं, जब शेख बुरहानुद्दीन अबू बक्र दिल्ली से विदा हुआ होगा। ये उसकी अपनी जानकारियाँ थीं, जो उसने दमिश्क में शिहाबुद्दीन को सुनाईं। मुमकिन है इनमें कुछ बढ़ाचढ़ाकर बताया हो, लेकिन ये ब्यौरे हिंदुस्तान की मालामाल हैसियत का बेहतरीन खुलासा करने वाले हैं।

झील से निकला सोना 200 हाथियों पर लादा

अली बिन मंसूर अल उदैली बहरीन का एक अमीर था। उसके संपर्क में ऐसे लोग थे, जाे हिंदुस्तान से गहरा ताल्लुक रखते थे। उसके पास भी हिंदुस्तान की अकूत दौलत के बारे में कुछ चौंकाने वाली जाानकारियाँ थीं, जो उसने अल उमरी को बताईं। उदैली के हवाले से शिहाबुद्दीन अल उमरी लिख रहा है-

सुलतान मोहम्मद तुगलक ने बड़ी-बड़ी फतहें हासिल की हैं। उसने एक ऐसा शहर फतह किया था, जिसमें एक छोटी-सी झील थी। इस झील के बीचों-बीच एक मंदिर था। लोग अपनी भेंट वहाँ लेकर जाते थे और उस झील में फेंक देते थे। जब उसने शहर को फतह किया तो यह सूचना भी उसे मिली। उसने उस झील से एक नहर निकलवा दी। पानी निकल गया तो झील पूरी तरह सूख गई। तत्पश्चात जो कुछ भी सोना था, वह 200 हाथियों और हजारों बैलों पर लदवाकर ले गया।”

हिंदुस्तान के हिंदू राज्यों पर कब्ज़े या हर साल की चारों तरफ की बेतहाशा लूट की यह दौलत तुगलक किस तरह लुटा रहा था, इसके किस्से भी कमाल हैं। उदैली ने बेहद साधारण हैसियत के जिन दो लोगों से सोने से भरी झील का यह किस्सा सुना, वे खुद दिल्ली में तुगलक के पास पहुँचे थे।

तुगलक ने दोनों अरब मुसलमानों को बहुत इज्ज़त दी। खिलअतें दी गईं और गुजर-बसर के लिए बहुत सारा धन भी दे दिया। सुलतान ने दोनों मेहमानों को दिल्ली में ठहरने या वापस लौटने के दो विकल्प रखे। एक ने ठहरना स्वीकार कर लिया। उससे खुश होकर तुगलक ने उसे एक बहुत बड़ा प्रांत, काफी सारे तोहफे, मवेशी, भेड़ें और गाय दीं।

आज वह एक धनी आदमी है। दूसरे ने घर जाने की इजाज़त माँगी। सुलतान ने उसे 3000 सोने के तनके प्रदान किए। वह तोहफों से लदा हुआ अपने घर लौटा और हिंदुस्तान में मुसलमानों के लिए खुले बेहिसाब अवसरों के बारे में कहानियाँ सुनाईं।

दिल्ली में हर तरफ से आए मुफ्तखोर मुसलमान

मुफ्त माल के लालच में लगातार बाहरी मुसलमान दिल्ली में डेरा डाले रहते थे। उनका अरबी या मिस्त्री परिचय ही काफी था। इनमें से कुछ लोग तारीफों के पुल बांधने में कुशल थे। वे माल की उम्मीद में सुलतान की शान में कसीदे लिखते थे।

ये सब बड़ी तादाद में दिल्ली में डटे रहते थे। ये कोई साधू, इंजीनियर, डॉक्टर या प्रबंधक नहीं थे। ये अरबी, फारसी लिख-बोलने वाले फटेहाल सिर्फ इस जानकारी भर से आला दरजे के इज्ज़तदार हो जाते थे कि वे मक्का होकर आए हैं या बगदाद से आए हैं। ऐसे ही एक वहशी अरब से प्रभावित होकर मोहम्मद तुगलक ने अपनी बहन का निकाह करा दिया था, जो बमुश्किल 20 दिन ही चला।

इन लालची मुफ्तखोरों की सुलतान से एक मामूली मुलाकात उन्हें चार पीढ़ियों के खर्चे के लायक इंतजाम करने के लिए काफी होती थी। अश-शिबली नाम के एक भरोसेमंद यात्री ने शिहाबुद्दीन को तुगलक के मिजाज का ब्यौरा दिया है

“सुलतान का एक दबीर किसी बड़ी घटना या फतह पर कसीदे लिखता है। सुलतान की आदत है कि वह कसीदे के छंदों को गिनवाकर हर छंद के लिए 10,000 तनके देता है। जब सुलतान किसी व्यक्ति की कोई रचना को मंज़ूर कर लेता है या उसे यह पता चल जाए कि उसे कोई नुकसान हुआ है तो वह धन देने के कोई आदेश नहीं देता, वह उस व्यक्ति को खजाने में ही दाखिल कर उसकी मर्जी के मुताबिक धन ले जाने का हुक्म देता है। इतना धन इस हद तक देने के बावजूद वह अपने देश की आमदनी का आधा ही खर्च करता है।”

ऐसे फटेहाल मुसलमान सिर्फ इस नाते तुगलक की नज़र में मालामाल होने के हकदार थे, क्योंकि वे मुसलमान थे और अरब या मिस्त्र में कहीं से आए थे। सिर्फ इसलिए लूट से जमा संसाधनों पर उनका पहला हक स्वयंसिद्ध था।

हिंदुस्तान में जिस समय ये जाहिल विदेशी मुसलमान लाखों की खैरात के मजे लूट रहे थे, ठीक उसी समय हर जगह काफिर हिंदू या तो कत्ल किए जा रहे थे या लूटकर बरबाद किए जा रहे थे। उनके मंदिरों को लूटकर मिट्‌टी में मिलाया जा रहा था। उनकी औरतों और बच्चियों को गुलामों के बाजार में 10-20 तनकों में कनीज या रखैल बनाकर बेचा जा रहा था। उन्हें इज्ज़त से ज़िंदा रहने लायक भी नहीं समझा गया था।

वे अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे थे। वे अपने बचाव के लिए पहाड़ों और जंगलों में बस रहे थे और वहाँ भी उनका मरने-मारने तक पीछा किया जा रहा था। वे काफिर थे। इस्लामी हुकूमत में उनकी यही औकात थी। इज्ज़त से जीने के लिए उन्हें इस्लाम कुबूल करने का लालच था। मजबूर लोग कलमे पढ़ रहे थे। धर्मांतरण तेज़ी से जारी था…

अगली बार चलेंगे हिमाचल के पहाड़ों में जहाँ चीन पर कब्जे के लिए गई तुगलक की फौज का बुरी तरह सफाया पहाड़ी हिंदुओं ने किया है… 

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विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com