भारती
साहस और संवेदना के अभूतपूर्व संगम सुषमा स्वराज को श्रद्धांजलि “खूब लड़ी मर्दानी”

नरेंद्र मोदी सरकार को कई बिंदुओं पर प्रशस्ति और ताड़ना प्राप्त हुई है। एक विषय है जिसपर एक मत बनता है कि 70 वर्ष के लोकतंत्र में यह पहली सरकार है जिसकी संवेदना के द्वार विकास की अंतिम पंक्ति पर खड़े नागरिक के लिए खुले रहे हैं। सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिकरण के इस प्रयास में श्रीमती सुषमा स्वराज जी सबसे शक्तिशाली स्तंभ रही हैं।

एक अभिजात्य आवश्यकताओं एवं अपेक्षाओं के विभाग, विदेश मंत्रालय को सुषमा जी ने सोशल मीडिया तथा संवेदनशील सोच से जोड़कर सहसा ही इस अभिजात्य मंत्रालय की सुविधाओं को आम जनता के लिए सहसा ही सार्वजनिक, सुलभ, प्रासंगिक और प्राप्य बना दिया। विदेश मंत्रालयों से संबंधित जिन विषयों पर सरकार तक पहुँचना दीवार पर सर मारना होता था, उन विषयों पर उन्हीं दीवारों पर सहसा ही सुषमा जी ने जनसुनवाई की खिड़कियाँ खोल दीं। 

यह आसान नहीं रहा होगा जब अफ़सरशाही, अभिजात्य और आम जनता ही इस मंत्रालय के इस रूप को आरंभ में स्वीकार कर रहा हो। उन्हें वीज़ा माता भी कहा गया, लखनऊ के प्रसंग में स्वयं मैंने उनके विरोध में लिखा। इसपर भी प्रश्न उठे कि जिस वर्ग की सहायता के लिए सुषमा जी अडिग रहीं, उस वर्ग ने कभी उन्हें इस मुक्तहस्त सद्भावना के लिए मन से धन्यवाद भी किया।

किंतु आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि सरकार का उत्तम स्वरूप ही यह है कि वह संवेदना में मनुष्य रहे और कार्यवाही में मशीन रहे। यही स्वरूप सुषमा जी ने अपने मंत्रालय को दिया। जिस मंत्री का हृदय पाकिस्तान में प्रताड़ित भारत से गई मुस्लिम महिला के दुःख को देखकर भर आता था, वही महिला जब संयुक्त राष्ट्र के पटल पर खड़ी हो कर सिंह गर्जना करती थी तो विश्व थर्रा उठता था। सुषमा जी के व्यक्तित्व में साहस और संवेदना का अभूतपूर्व संगम था।

श्री हरदेव शर्मा एवं श्रीमती लक्ष्मी देवी की पुत्री सुषमा का जन्म 14 फरवरी 1952 में अंबाला में हुआ था। राजनीति शास्त्र और संस्कृत में स्नातक सुषमा जी बहुभाषाविद थीं। संभवत: भारतीय राजनीति के उस दौर में जब रोमन में हिंदी पढ़ने वाले राजनैतिक विचार की एक धुरी माने जा रहे हों, सुषमा जी अपनी भाषा की सामर्थ्य पर ही एक अलग स्नेह और सम्मान की पात्र है। संस्कृत और कन्नडा में दिए गए उनके भाषण उन राजनेताओं को उत्तर हैं जो दशकों तक भारत माता का स्नेह प्राप्त करने के बाद भी भारतीय भाषाओं को समझनेबोलने में असमर्थ हैं।  

आपातकाल के तिमिर से निकले राष्ट्र में सुषमा जी पहली बार 1977 में हरियाणा विधान सभा पहुँची। अपने राजनैतिक सफ़र में सुषमा जी तीन दफ़ा विधायक और सात बार सांसद रहीं। अपने तीनों मंत्री काल में सुषमा जी ने दूरगामी निर्णय लिए। वाजपेयी जी के सूचना मंत्री के रूप में उन्होंने फिल्म उद्योग को उद्योग की मान्यता दी और सिनेउद्योग को नई उड़ान प्रदान की।

स्वास्थ्यमंत्री के कार्यकाल में अखिल भारतीय स्वास्थ्य संस्थानों को दिल्ली से बाहर पहुँचाने की पहल की और भोपाल, भुवनेश्वर, जोधपुर, पटना, रायपुर और ऋषिकेश में संस्थानों की स्थापना की। विदेश मंत्री का उनका कार्यकाल भारत की वैश्विक सामर्थ्य की स्थापना के लिए जाना जाएगा, जहाँ यमन जैसे युद्ध क्षेत्रों से भारतीयों को निकालने से लेकर ऐसे परिपक्व संबंधों की नींव डालना है जिसमें अब 370 हटने के बाद जो आवाज़ उठ रही है वह पाकिस्तान का एकाकी प्रलाप बनकर सिमट गया है। 370 का जाना सुषमा जी का स्वप्न था, उनका सौभाग्य कि वे इसे हटते हुए देख गईं, और राष्ट्र का दुर्भाग्य की वे इस नवरोपित वृक्ष को पुष्पाच्छादित हुआ देखने से पूर्व चली गईं।


अनीश्वरवाद को मानने वाले प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके बाद के तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले नेताओं ने जिस कुंठा और शर्म के भाव से हिंदू विचार को बांधा उसने सुषमा जी के संसद में 11 जून 1996 को दिए उस भाषण में संभवतः पहली बार उन्मुक्त होकर पंख फैलाए जब उन्होंने कहा

“हाँ ,मैं सांप्रदायिक हूँ, यदि वन्दे मातरम कहना सांप्रदायिक है तो मैं सांप्रदायिक हूँ। यदि 370 के नियम के उन्मूलन की माँग करना, सांप्रदायिक है, तो मैं सांप्रदायिक हूँ।”
(https://www.youtube.com/watch?v=GcIBGO3HY5o)

इसी भाषण में उन्होंने आगे कहा था-

“एक हिंदू अच्छा हिंदू हो , एक मुसलमान अच्छा मुसलमान हो, एक ईसाई अच्छा ईसाई हो, और एक सिख अच्छा सिख हो और सब अपने अपने पंथों का आदर करते हुए एक दूसरे के धर्मों का आदर करें। यह हमारी धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा है।”

सिद्धांततः सुषमा जी ने इटली मूल की सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री होने की अभिलाषा का गंभीर विरोध किया, सोनिया गांधी के विरोध में बेल्लारी से चुनाव लड़ीं और भले ही मात्र 25 दिनों के प्रचार के बाद वे सोनिया गांधी के 51.7 प्रतिशत वोट शेयर के समक्ष 44.7 प्रतिशत के वोट शेयर से पराजित हुई हों, सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने का विचार त्याग दिया।

आज जब हम सोनिया-राहुल द्वारा नियुक्त कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी को कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता पर पाकिस्तान की बात संसद के पटल पर रखते हुए देखते हैं तो ऋषि गार्गी और देवाहुति की परंपरा की उत्तराधिकारी, प्रखर राष्ट्रवादी और परम विदुषी सुषमा जी की याद में श्रद्धांजलि के साथ यह भी सहसा ही मन से निकलता है- खूब लड़ी मर्दानी!