भारती
संवेदना चयनात्मक कैसे हो गई? विभाजनकारी शिक्षा व्यवस्था पर प्रकाश डालता भाग-1

प्रसंग- चयनात्मक संवेदना पर विचार-मंथन कर कारणों को चिह्नित करने की तीन लेखों की शृंखला का पहला लेख।

विगत कुछ वर्ष-माह-दिनों से कुछ हत्या और आत्महत्याओं का अवलोकन एवं आकलन करते हुए मेरे चित्त में सहज ही यह विचार (चिंता-चिंतन) आया कि युवा अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या (?) पर बहुत-सी प्रतिक्रियाएँ आईं, कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों के पलायन पर प्रतिक्रियाओं की होड़-सी थी।

ग़रीब तथा ग़रीबों पर लोकमन की संवेदनाओं का ऐसा उभाड़ था कि कई दिनों तक बौद्धिक जगत ही नहीं अपितु हर जगह-नगर-नुक्कड़ पर हाय-तौबा मची हुई थी। स्थिति कुछ ऐसी बन चुकी थी कि ‘जो न थूके वह भी पापी!’

परंतु इसके विपरीत महाराष्ट्र के पालघर में हुई सनातनी संतों की नृशंस एवं पैशाचिक हत्या पर चुनिंदा ही प्रतिक्रियाएँ आई थीं। वहीं तमिलनाडु के तंजावुर में हुई रामलिंगम और पश्‍चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में बंधु प्रकाश पाल की सपरिवार नृशंस एवं बर्बरतापूर्ण हत्या पर इक्का-दुक्का ही प्रतिक्रियाएँ आई थीं। 

प्रतिक्रियाओं के ‘ग्राफ़’ में इस असंगति और असंतुलन को देखकर यह अनुभव हुआ कि ‘सनातनी संतों की हत्या’, ‘रामलिंगम की हत्या’, ‘बंधु प्रकाश पाल की सपरिवार हत्या’ जैसी घटनाएँ प्रायः इस देश के लोकमन को झकझोरने के लिए अर्थशून्य, असंवेद्य, अपर्याप्त एवं अयोग्य प्रतीत होती हैं। इस देश के लोकमन को ऐसी हत्याओं पर न दुख होता है, न आश्‍चर्य ही!

वहीं कुछ हत्या एवं आत्महत्याओं पर इस देश का लोकमन यकायक अतिसंवेदनशील हो उठता है। एक व्यक्ति की हत्या (?) के उपरांत तो इस देश के एक समुदाय विशेष (?) को चुन-चुनकर मारने के जघन्य कांड को प्रखर रूप में कार्यान्वित करने की खुली छूट मिल चुकी थी और उस आततायी हत्याकांड को येनकेनप्रकारेण ‘उचित’ ठहराते हुए ‘संहार’ अथवा ‘दंड’ के रूप में प्रदर्शित-प्रसारित करने का उपक्रम भी पूरे जोश में और भरपूर होश में जोर-शोर से किया गया था।  

कुछ विशिष्ट हत्या-आत्महत्याओं के पश्‍चात् मीडिया और सोशल मीडिया के नानाविध पटलों पर तथा पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं विचारों की भरमार दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है, गोया सभी मनोविज्ञान के विशेषज्ञ हैं और उन्हें विषय-विशेष के अथाह ज्ञान का साक्षात्कार हो चुका है-। वहीं कुछ हत्याएँ न सुर्खियाँ ही बटोर पाती हैं, न कहीं किसी समाचार-पत्र के भीतरी पन्ने पर कोई कोना ही खोज पाती हैं। ऐसी हत्याएँ यों ही गुमनाम तथा अनसुने ही दम तोड़ देती हैं।

जब मैंने इसके पीछे का मनोविज्ञान जानने-समझने का प्रयास किया तो इस ‘चयनात्मकता’ के पीछे छिपे रहस्य (षड्यंत्र-पूर्वाग्रह-दुराग्रह) का प्रकारांतर से उद्घाटन हुआ। कुछ प्रश्‍न मेरे मानस को यों ही झकझोरने लगे कि क्या कुछ ‘सिलेक्टिव’ हत्या और आत्महत्याओं पर ही देशवासियों का लोकमन (संवेदन) ‘सिलेक्टिवली’ जाग्रत हो उठता है? क्या यह सत्य है कि समकालीन समय अनुभूति की अपेक्षा अभिव्यक्ति सापेक्ष है? अभिव्यक्ति, ‘सिलेक्टिव अभिव्यक्ति’?

शेष, करुणा-वेदना-भावना-अनुभूति-संवेदना सबकुछ ढोंग-पाखंड? संस्कृति-ज्ञान-परंपरा की विशाल विरासत वाले इस देश और यहाँ के लोकमन को यह क्या हो गया है? ऐसे ही प्रश्‍नों के आलोक में इस देश के लोकमन को टटोलते-टटोलते मैंने जो कुछ अनुभव किया और अपने अध्ययन-चिंतन में जो जाना-पाया, उसका आलोचनात्मक चिंतन प्रस्तुत करने का प्रयास एवं साहस कर रहा हूँ।

‘मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना’ (वायु पुराण),‘भिन्नरुचिर्हि लोकः।’ (रघुवंशम्) पहले में मस्तिष्क और लोक-विचार संबंध उजागर है तो दूसरे में रुचि और लोक-मन संबंध। यह निर्विवाद सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति की रुचि भिन्न होती है और चूँकि खोपड़ियाँ भिन्न-भिन्न हैं तो विचार भी भिन्न-भिन्न होते हैं। जिसको जो (विचार) सुरुचिपूर्ण लगता है, वही उसके लिए सुंदर होता है और ग्राह्य भी। यह ग्राह्यता व्यक्ति-प्रति व्यक्ति अपेक्षा और क्षमतानुसार अंतर करती है। अर्थात् घटती या बढ़ती है।

चूँकि यह रुचि प्रवृत्ति में मनोहारी होती है, अतः व्यक्ति-विशेष में मनोवांछित प्रसन्नता उत्पन्न करती है। विचार-वैभिन्न्य के साथ-साथ रुचि-वैभिन्न्य, प्रसन्नता और ग्राह्यता के दर्शन को समझने के क्रम में यह सत्य उद्‍घाटित होता है कि हमारी प्रसन्नता का वास्तविक कारण हमारी ‘रुचि’ ही होती है। हम विचार भी अपनी रुचि के अनुसार करते हैं और ग्राह्यता में भी यही रुचि प्रभावकारी होती है।  

मस्तिष्क, विचार, रुचि और प्रसन्नता के इस चिरंतन एवं अकाट्य संबंध के आधार पर सहज ही संवेदना को झकझोरने वाला एक प्रश्‍न उत्पन्न होता है कि क्या किसी ‘व्यक्ति-विशेष’ अथवा ‘विशेष रूप से सामान्य’ की मौत-हत्या-आत्महत्या में भी रुचि और प्रसन्नता उत्पन्न होती है अथवा हो सकती है?

कदाचित उत्तर-प्रत्युत्तर में मिलीजुली प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हो परंतु कुछेक आत्महत्या एवं हत्याकाण्डों की वास्तविकता जानने के उपरांत ऐसा प्रतीत होता है कि समकालीन समय में मृत्यु भी ‘आस्वादनीय’ है और उसकी आस्वाद्यता इसी ‘रुचि–वैभिन्न्य’ के दृष्टार्थानुसार बढ़ती या घटती है।

इस तथ्य को इस तर्क के आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि यदि ऐसा न होता तो हम अत्यंत सहज भाव से किसी भी (अन्यान्य) बात के होते हुए, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु-हत्या-आत्महत्या पर ओह! बेचारा! अच्छा था/ बेचारी! अच्छी थी। यह भी कोई जाने की वय थी?”, कहकर मन ही मन मौन साधना करने लग जाते। व्यक्ति मन ही मन विधना के लेख को निर्णायक मान कर शोक एवं सांत्वना व्यक्त करते और आत्मा की शांति की कामना करते।

परंतु, समकालीन समय में संवेदना के स्तर-प्रस्तर अत्यंत कठिन एवं जटिल हो चुके हैं। अनेकानेक भेदाभेदों के कारण खंड-खंड हो चुके लोकमन की संवेदनाएँ भी प्रखर रूप से खंडित हो चुकी हैं। संवेदनाएँ भी रुचि के अनुरूप प्रभावी होने लगी हैं। अपनी मति और रुचिनुकूल व्यक्ति की हत्या-आत्महत्या हो तो संवेदना का उबाल उठता है और यदि कोई प्रतिकूल व्यक्ति हो तो संवेदना अपनी सुप्तावस्था में अनुकूलता की प्रतीक्षा करती रहती है।

एक समय वह था, जब लोकमन (संवेदन) हृदयालु तो था ही किंतु हृदयवेधी भी हुआ करता था और आज का यह वर्तमान है, जो घनघोर संवेदनहीनता से ग्रस्त है। किसी ‘व्यक्ति-विशेष’ और ‘विशेष रूप से सामान्य’ की मृत्यु-हत्या-आत्महत्या को लेकर लोगों में ‘स्वत्व’ एवं ‘परत्व’ का भाव अनायास ही जाग्रत हो उठता है।

जानना-समझना होगा कि यह खंडित मानसिकता से उपजी विखंडित संवेदना का विस्तार ही नहीं, प्रचार-प्रसार भी है। यह हीन-विचार और विचारहीनता से उपजा संकट है। कहना न होगा कि यह इस सदी का सबसे बड़ा संकट है।

ध्यातव्य है, इस विखंडित संवेदना का मूल आधार और विस्तार इन दिनों अपनी जड़ें और शाखाएँ फैलाता ‘अस्मिता विमर्श’ (खंडित विमर्श!) है। अत्युक्ति नहीं कि इसकी आड़ में भी भारतीय लोकमन का सुनियोजित ‘विभाजन’ हुआ है। स्थितियाँ इतनी विचित्र हैं कि किसी व्यक्ति की मृत्यु-हत्या-आत्महत्या पर खंडित लोकमन सहसा द्रवित नहीं होता अपितु वह विचारणा करने के उपरांत अपनी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया प्रकट करता है।

औपनिवेशिक हस्तांतरण से चली आ रही भारतीय शिक्षा में भारत विभाजन के स्तर-प्रस्तर पूरी योजनाबद्ध पद्धति से रचे-परोसे गए हैं (जा रहे हैं!) और शिक्षा संस्थानों में विभाजनकारी (खंडित) विमर्शों के अध्येता अध्यापकों ने उन्हें अतिरंजित कर अत्यधिक जटिल एवं दुरूह बना दिया है।

चूँकि औपनिवेशिक दासत्व से परिपूरित भारतीय शिक्षा प्रणाली में अध्यापकीय संवेदनाएँ ‘सिलेक्टिव’ रूप से विभाजित हो चुकी हैं, अतः विद्यार्थियों के मानस पर उसका प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। उनकी संवेदनाएँ भी न केवल चयनात्मक रूप से विभाजित हुईं हैं अपितु जटिल एवं दुरूह हुई हैं।

अनेकानेक संदर्भ एवं प्रसंगों में ‘मैत्री की समानुरक्ति’ का भाव लोकमन से लुप्त होता हुआ दिखाई दे जाता है। इधर हत्या-आत्महत्या की सूचनाओं में ‘जाति-धर्मसूचक’ विशेषण महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं (हो गए हैं?)। भारतीय संस्कृति में सबसे बड़ा संस्कार यह रहा है कि शत्रु की मृत्यु पर भी भरी-पूरी संवेदना से शोक एवं सांत्वना व्यक्त की जाती थी। अब ऐसा लगता है मानो वे दिन और ही थे! मानो वह भारत भी और ही था!

ऐसी स्थितियों को देखते-परखते हुए भारत विभाजन की स्मृतियाँ पुरानी पीढ़ी (जिन्होंने परतंत्रता देखी-जी-भोगी) के मानस में किसी न किसी प्रसंग-प्रभाव-प्रवाह में यदा-कदा जीवित हो उठती हैं और शनैः-शनैः प्रभावानुसार धुंधलाती हैं। ऐसे ही सहज-असहज क्षणों में वर्तमान में घटने वाली घटना-दुर्घटना और गतिविधियों पर आश्‍चर्य प्रकट करते हुए उन्हें यों ही सुना जा सकता है कि हमने न सोचा और न कल्पना ही की थी कि हमारे भारत का भविष्य इस प्रकार कठिन, जटिल, असात्म्य और असाध्य होगा।”

संवेदनात्मक ह्रास, उसके कल्पनातीत विभाजन तथा तद्जनित चयनात्मक प्रतिक्रियाओं पर वे रोष से भभक उठते हैं और वृधत्व से उपजी स्वाभाविक तुतलाहट में आयातित विभाजनकारी वैचारिकी के अनुसरणकर्ता-संवाहकों के बौद्धिक चातुर्य एवं स्वहित-कामना से उपजी चाटुकारिता तथा तद्जनित हकलाहट को न केवल रेखांकित करते हैं अपितु राष्ट्रहित में ऐसी घातक एवं विभाजनकारी वैचारिकी तथा उसके अनुसरणकर्ता-संवाहकों पर गंभीर प्रश्‍न भी उठाते हैं। 

स्वतंत्रता आंदोलन और देश विभाजन के दौरान हुए संवेदनात्मक ह्रास और सुविशिष्ट चयनात्मक (सिलेक्टिव) संवेदना पर कटाक्ष करते हुए वे सहज ही कहते हैं कि उन दिनों सत्ता समीकरण रचने वाले धूर्त शठों ने जनमानस की संवेदना को येनकेनप्रकारेण विभक्त कर तार-तार कर दिया था। सत्ता हस्तातंरण के उपरांत उन्होंने भारतीय जनमानस को किसी न किसी रूप में एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देने में सफलता अर्जित की थी। औपनिवेशिक दासत्व की डोर थामे भारतीय शिक्षा-व्यवस्था ने ऐसे ही ‘पाठ’ (नैरेटिव) को आगे बढ़ाया और देखते-न देखते ‘हम सब भारतीय’ हिंदू-मुसलमान से इतर अन्य दो खेमों में बँट गए- ‘शोषक’ और ‘शोषित’।

हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत-पाकिस्तान के विभाजन के अतिरिक्त भारत को खंड-खंड करने वाले विभाजनों में पहला हिंदू-मुस्लिम धर्माधारित एवं मानसिक विभाजन, दूसरा अंग्रेज़ों द्वारा प्रचारित-प्रसारित जातिगत भेदाभेद और तीसरा सर्वाधिक विषैला एवं घातक विभाजन साम्यवाद-समाजवाद जनित-पोषित ‘वर्ग विभाजन’ रहा है। इसने वैचारिकी के आधार पर जो विभाजन किये हैं, राष्ट्र उसका दंड एवं अभिशाप आज भी भारत तेरे टुकड़े होंगे के रूप में झेल रहा है। ध्यातव्य है कि इस विभाजन की अगली कड़ी ‘अस्मिता विमर्श’ के रूप में उजागर हुई है।

राष्ट्रैक्य का स्वप्न लिये जीने वाली पुरानी पीढ़ी जान-समझ रही है– आज परिस्थिति इतनी प्रतिकूल है कि किसी की मौत पर रोने, शोक और सांत्वना व्यक्त करने से पहले खोज लिया जाता है कि मृतक ‘कौन’ (?) था। वे कहते हैं कि देश विभाजन के दौरान मृतकों के ढेर में तब भी संवेदनाओं ने दम तोड़ दिया था और आज पुनः संवेदनाएँ चयनात्मक होने लगी हैं।

वे इस चयनात्मकता को देखते हुए चेताने का प्रयास करते हैं कि भारत के टुकड़े करने हेतु ब्रिटिशों द्वारा अपनाई गई विभाजनकारी नीति को आयातित विचारधारा के समर्थक-संवाहक उन्हीं के पदचिह्नों पर चलकर पुनः भारत को खंड-खंड करने की दुरभिसंधियाँ रच रहे हैं।

चयनात्मकता को दृष्टिगत रखकर उपजी उनकी चेतना हमें चेताने का उपक्रम करती है कि इस राष्ट्र के और अधिक विभाजन होने से बचाने के लिए सभी में ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ (राष्ट्रवाद) का अलख जगाने की आवश्यकता है। बशर्ते कि हमारा राष्ट्रवाद सुचिंतित-सुविचारित-समन्वित हो और हमारी ज्ञान-परंपरा एवं तत्त्व-चिंतन की परंपरा से जन्मा हो।

हमारा बौद्धिक चिंतन, भाव-बोध धारा उसे उग्र एवं चयनात्मक होने से बचाने में पूरी तरह सक्षम है। हमें जानना-समझना होगा कि नैरेटिव रचन-गढ़ने वालों ने सबके मन-मस्तिष्क में राष्ट्रवाद को लेकर भ्रामक अवधारणाएँ ठूँस दी हैं। आयातित वैचारिकी की संवाहक पत्र-पत्रिकाओं ने तो राष्ट्रवाद को घातक बताकर भारतीय लोकमन को विभाजित करने-रखने का उपक्रम सतत किया है। भारत विभाजनकारी तत्वों ने अत्यंत चतुराई से राष्ट्रवाद बनाम देशभक्ति’ का खेल खड़ा कर दिया है।

बौद्धिक चातुर्य के बल पर आयातित वैचारिकी के संवाहकों ने जिस धृष्टता, दुष्टता और धूर्तता से समाज में विष घोल दिया है, उसने कम से कम चार-पाँच पीढ़ियों के मानस को दूषित-कलुषित कर दिया है। इस सत्य से परिचित होना होगा कि इन बौद्धिक चाटुकारों की रोज़ी-रोटी इसी विषैले वटवृक्ष से प्राप्त होती है।

वे भारत को खंड-खंड करने में कोई क़सर छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। ‘वर्ग–संघर्ष’ के फॉर्मूले पर उन्होंने एक को दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। ‘अस्मिता विमर्श’ के नाम पर अनेकानेक विभाजन (मन-भेद) कर दिए हैं। अब इन सबकी दुकानें चल पड़ी हैं और सभा-गोष्ठियों में हाय-हाय के अतिरिक्त कुछ ठोस दिखाई-सुनाई नहीं देता है। ऐसी स्थिति में भारतेंदु हरिश्‍चंद्र की पंक्तियाँ– “रोवहु सब मिलि कै आवहु भारत भाई। हा हा! भारतदुर्दशा न देखी जाई।”, सहज स्मरण आती हैं।

अस्तु, ऐसे विभाजनों (विखंडन) से भारतीय जनमानस का सद्विवेक, साहजिक साहचर्य, सहअस्तित्व, सहजीवन, संतुलित-संघनित संबंध एवं सद्भावजनित संगमन, सत्संकल्पित सामंजस्य, समन्वयवाद, सद्व्यवहारिता, संवेदना, परोपकारी भावोत्पन्न सत्कृत्य-सत्कार्यता, सत्, सत्व, स्वत्वगुणी समवायिता से जन्मी सदाशयता, समर्पण, सौहार्द, सहृदयता, सनाभि भातृत्व भाव से उपजी संतुष्टि, संकीर्तन (परस्पर यशगान), सन्निबद्धता, समुत्थान, समाश्रितता, समीकृत समेकन, सन्निविष्टता, समायोजन, संयोज्यता, संलग्नता, संश्लेषण, संसाध्यता, संश्रयता, सर्वोदय और सर्वास्तिवादिता, समानुभूति, सहानुसरण, साझेदारी, संस्पर्श, साख्यभाव, संहति भाव, भक्ति-शक्ति-आधार से समृद्धि तक का मार्ग निर्धारित करने वाली संस्कारिता, समरसता, संमंत्रणा-संवाद और सहधर्मिता से उपजने वाली सकारात्मक भावना और संपूर्ण जीवन के लक्ष्य से पुनर्जीवन अंकुरित करने वाले संसक्तिजन्य संस्कार ध्वस्त हुए हैं।

ऐसे प्रसंग में धर्मपाल का यह कथन उचित जान पड़ता है– “विविध परंपरागत समूहों के मध्य बहुत हीनता आ गई है। उनका आपसी संबंध बिगड़ा है। विदेशी विद्वानों की व्याख्याएँ ही हमारे शिक्षातंत्र में आप्तवचन मानी जाती हैं जिससे जाति तथा अन्य समुदायों के प्रति बोध विकृत हुआ है। आधुनिक दास्य-भाव वाली मान्यताओं के प्रचार से सामाजिक कलह तीव्रतर होता जाता है। वास्तविक विद्या और ऐतिहासिक तथ्यों का ज्ञान विस्तार ही इन समस्याओं का समाधान है। जातियों के मध्य आपसी कटुता, इतिहास के अज्ञान का फल है। जातियाँ समाज की स्वाभाविक इकाई रही हैं।” (भारत का स्वधर्म, वाग्वेदी प्रकाशन 2019, पृ 103)

और उनका यह मानना स्वीकार्य होगा कि “यदि अब उस इकाई (जाति) का स्वरूप भिन्न होता है तो उसका विचार-विमर्श और निर्णय सामाजिक बुद्धि, सामाजिक विमर्श एवं सामाजिक संवाद से ही हो सकता है।” (वही, 103) और वे यह कहने से नहीं चूकते कि “नवप्रबुद्ध वर्ग के अज्ञान को वृहद समाज दिव्य ज्ञान के रूप में ग्रहण कर ले और अपनी बुद्धि तथा विवेक को तज दे, यह संभव नहीं है।” (वही, 103) उपरोक्त कथनों में प्रयुक्त ‘सामाजिक बुद्धि’, ‘सामाजिक विमर्श’ एवं ‘सामाजिक संवाद’ किसी भी देश के विकास का पैमाना निर्धारित करते हैं। 

उल्लेखनीय है कि पारस्परिक स्वीकार्यता और सकारात्मकता ही जीवन के आधार हो सकते हैं। जिस देश का ‘सामाजिक’ दिग्भ्रमित और विचारहीन हो जाता है, उस देश का पतन के गर्त में चले जाना निश्‍चित है। इस संदर्भ में आचार्य चाणक्य की शिक्षा स्मरणीय है

“अपने विचारों को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारी वाणी बनेंगे। अपनी वाणी को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारा कर्म बनेगी। अपने कर्मों को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारी आदत बनेंगे। अपनी आदतों को वश में रखो क्योंकि यही तुम्हारा चरित्र बनेंगी। और अपने चरित्र को वश में रखो क्योंकि इसी से तुम्हारा भाग्य बनेगा।”

विचार-वाणी-कर्म-आदत-चरित्र-भाग्य का यह अंतर्गुंफन विचारणीय है। क्या यह सच नहीं कि इन मूल्यों का अनुसरण और इन पर हमारा नियंत्रण शिथिल हो चुका है?

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।